कूटनीतिक सरेंडर या मजबूरी का सौदा? ईरान के ‘चक्रव्यूह’ में फंसे ट्रंप

वॉशिंगटन/तेहरान। इसे ट्रंप की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति का सबसे बड़ा यू-टर्न कहें या ईरान की कूटनीतिक बिसात का मास्टरस्ट्रोक—G-7 शिखर सम्मेलन में हस्ताक्षरित अमेरिका-ईरान समझौता इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट की तरह दर्ज होने जा रहा है। ट्रंप प्रशासन जिस ईरान को घुटनों पर लाने का दावा कर रहा था, उसी ईरान ने 40 दिनों की भीषण जंग के बाद अमेरिका को एक ऐसी डील पर दस्तखत करने के लिए मजबूर कर दिया, जो वॉशिंगटन के लिए किसी ‘सफेद झंडे’ से कम नहीं है।

डोनाल्ड ट्रंप भले ही इसे “परमाणु बम रोकने की बड़ी जीत” बताकर अपनी पीठ थपथपा रहे हों, लेकिन समझौते के बारीक अक्षरों (Fine Print) को पढ़ें तो कहानी पूरी तरह उलट नजर आती है। यह डील चीख-चीखकर कह रही है कि ईरान ने बातचीत की टेबल पर अमेरिका को चारों खाने चित कर दिया है।

यह डील ट्रंप के उस पुराने बयान की याद दिलाती है जो उन्होंने 2020 में दिया था: “ईरान ने कभी कोई जंग नहीं जीती, लेकिन बातचीत की टेबल पर वो कभी नहीं हारा।” आज वही बात ट्रंप के गले की फांस बन गई है। ईरान के रणनीतिकार मुज्तबा की चालों के सामने अमेरिका को न सिर्फ अपनी पुरानी नीतियां बदलनी पड़ीं, बल्कि कई ऐसे ‘सेल्फ गोल’ करने पड़े जिसने सुपरपावर की साख को हिलाकर रख दिया है।

ट्रंप ने युद्ध विराम का फैसला किसी कूटनीतिक बड़प्पन में नहीं, बल्कि अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को वेंटिलेटर पर जाने से बचाने के लिए लिया। युद्ध के 40 दिनों ने अमेरिकी इकॉनमी की कमर तोड़ दी थी…

नुकसान का मोर्चाअमेरिकी नुकसान का लाइव स्कोर
दैनिक युद्ध खर्च~ $1 बिलियन प्रति दिन
सैन्य उपकरण (विमान/ड्रोन)39 तबाह (लागत $2 बिलियन से अधिक)
अम्युनिशन रिजर्वकरीब 30% अमेरिकी हथियार भंडार खाली
शेयर बाजार (S&P 500)मार्च से अब तक 7.8% की भारी गिरावट
घरेलू महंगाई0.6% का अचानक उछाल

ट्रंप को बखूबी अंदाजा हो गया था कि अगर यह युद्ध 4 हफ्ते और खिंच जाता, तो दुनिया का ऑयल रिजर्व खत्म हो जाता और अमेरिका खुद भीषण मंदी की चपेट में आ जाता।

समझौते की शर्तें साफ करती हैं कि ईरान ने अपनी संप्रभुता से रत्ती भर भी समझौता नहीं किया, जबकि अमेरिका को अपने पैर पीछे खींचने पड़े:

  • सत्ता परिवर्तन का ख्वाब खत्म: दोनों देश एक-दूसरे के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देंगे। यानी ईरान से इस्लामिक सत्ता को उखाड़ फेंकने का अमेरिकी एजेंडा हमेशा के लिए दफन हो गया।
  • $300 अरब का ‘हर्जाना’: ईरान को 300 अरब डॉलर की मदद और उसकी फ्रीज संपत्तियां वापस मिलेंगी। तेहरान इसे युद्ध के हर्जाने और अपनी जीत के रूप में देख रहा है।
  • रणनीतिक चोक-प्वाइंट (होर्मुज): 60 दिनों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य तो खुल जाएगा, लेकिन ईरान को एक ऐसा ट्रिगर मिल गया है जिसे वह जब चाहे अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए दबा सकता है।
  • संवर्धित यूरेनियम और मिसाइल पर छूट: ईरान ने परमाणु बम न बनाने का वादा तो किया, लेकिन न तो वह अपना संवर्धित यूरेनियम सरेंडर कर रहा है और न ही अपने मिसाइल प्रोग्राम पर कोई बात करने को राजी है। ईरानी विदेश मंत्रालय ने साफ कहा—“मिसाइलें बात करने के लिए नहीं, हमला करने के लिए होती हैं।”

ईरान इस समझौते के बाद जश्न के मूड में है। ईरानी संसद के स्पीकर कालीबाफ ने दहाड़ते हुए कहा कि ईरान ने चार मोर्चों पर दुश्मनों का मुकाबला किया और अमेरिका अपना एक भी मकसद पूरा नहीं कर पाया।

बड़ा टेकअवे: यह डील बताती है कि आधुनिक दौर की जंग सिर्फ मिसाइलों से नहीं, बल्कि आर्थिक सहनशक्ति से जीती जाती है। ईरान ने अमेरिका को आर्थिक मोर्चे पर इतना थका दिया कि ट्रंप को अपनी जिद छोड़कर ईरान की शर्तों पर ‘शांति’ खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा।

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