शादी से पहले जीवनसाथी चुनने की अनोखी परंपरा, 7 दिन साथ बिताकर लेते हैं फैसला

रायपुर: भारत की सांस्कृतिक विविधता में जनजातीय समाज की परंपराएं हमेशा से आकर्षण का केंद्र रही हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में रहने वाली मुरिया और माड़िया जनजातियों के बीच आज भी एक ऐसी परंपरा जीवित है, जहां युवक-युवतियों को शादी से पहले एक-दूसरे को समझने और अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने की पूरी स्वतंत्रता दी जाती है। इस परंपरा को ‘घोटुल’ के नाम से जाना जाता है।

बस्तर के आदिवासी समाज में घोटुल केवल एक भवन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। गांव के बाहरी हिस्से में मिट्टी और लकड़ी से बने इस पारंपरिक युवा गृह में अविवाहित लड़के-लड़कियां एकत्रित होते हैं और आपसी संवाद के जरिए एक-दूसरे को जानने का अवसर पाते हैं।

घोटुल में शामिल होने वाली अविवाहित लड़कियों को ‘मोतियारी’ और लड़कों को ‘छेलिक’ कहा जाता है। यहां युवाओं का अपना संगठन भी होता है। लड़कियों की प्रमुख को ‘बेलोसा’ और लड़कों के मुखिया को ‘सरदार’ कहा जाता है, जो पूरे समूह में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाते हैं।

घोटुल को आदिवासी समाज का सांस्कृतिक विद्यालय भी माना जाता है। यहां युवाओं को लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक कला, धार्मिक मान्यताओं और पूर्वजों की कहानियों की जानकारी दी जाती है। इस दौरान समुदाय के बुजुर्ग भी मौजूद रहते हैं और युवाओं का मार्गदर्शन करते हैं।

शाम ढलते ही युवा समूहों में लोकगीत गाते हुए घोटुल पहुंचते हैं। ढोल की थाप पर नृत्य और सामूहिक कार्यक्रमों के बाद युवक-युवतियां आपस में बातचीत करते हैं। इसी दौरान उन्हें एक-दूसरे के स्वभाव, सोच और व्यवहार को समझने का मौका मिलता है।

घोटुल की सबसे खास परंपरा रिश्ते की स्वीकृति से जुड़ी है। यदि कोई युवक किसी युवती को पसंद करता है और युवती भी सहमति देती है, तो युवक उसके बालों में फूल लगाता है। इसे दोनों के रिश्ते की सार्वजनिक स्वीकृति माना जाता है।

इस परंपरा में शामिल होने के लिए लड़कों की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष और लड़कियों की 18 वर्ष निर्धारित है। नए सदस्य शुरुआत में झिझक महसूस न करें, इसके लिए उन्हें सात दिनों का समय दिया जाता है। इस दौरान वे अलग-अलग लोगों से बातचीत कर अपनी पसंद का साथी चुन सकते हैं।

बदलते दौर और आधुनिक जीवनशैली के बावजूद बस्तर के कई इलाकों में घोटुल की परंपरा आज भी सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई है। जनजातीय समाज इसे केवल विवाह से पहले मेल-मिलाप का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण और सामुदायिक एकता की मजबूत कड़ी मानता है।

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