पाठको के बीच भोजपुरी साहित्य को वापस लाने में जुटा है सर्व भाषा ट्रस्ट

डा. उत्कर्ष सिन्हा
भोजपुरी भाषा, जिसके बोलने वाले करोड़ों में हैं, सदियों से एक समृद्ध साहित्यिक परंपरा रखती है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर यह भाषा और उसका साहित्य वर्षों से हाशिये पर पड़ा रहा है। ऐसे में जब लगे कि भोजपुरी साहित्य हमेशा के लिए पीछे छूट जाएगा, तब सर्व भाषा ट्रस्ट के मुखिया केशव मोहन पांडेय ने इस भाषा के साहित्य को जनता के बीच वापस लाने का बीड़ा उठाया है । केशव पांडेय अपनी दूरदर्शिता, अथक परिश्रम और साहित्य के प्रति गहरी समर्पण भावना के कारण भोजपुरी साहित्य जगत और विभिन्न भाषाओँ में पुस्तकों के प्रकाशन के क्षेत्र में एक अलग पहचान बना चुके हैं। उनकी इस पहल ने न केवल भोजपुरी साहित्य को नई जान दी है, बल्कि करोड़ों भोजपुरी भाषी लोगों को उनके साहित्यिक विरासत से फिर से जोड़ा है।
सर्व भाषा ट्रस्ट पिछले दो वर्षों से प्रकाशन की दिशा में सक्रिय है और इस छोटे काल खंड में अब तक लगभग 500 पुस्तकों का प्रकाशन कर चुका है। इसमें भोजपुरी भाषा की पुस्तकों को विशेष प्राथमिकता दी गई है। केशव पांडेय के नेतृत्व में ट्रस्ट द्वारा भोजपुरी भाषा में कई मूल्यवान पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। इनमें सबसे उल्लेखनीय है “भोजपुरी शब्दानुशासन” नामक पुस्तक, जिसका मूल प्रकाशन 1975 में हुआ था। यह पुस्तक भोजपुरी भाषा की एक बहुमूल्य थाती है, जिसे सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा फिर से प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक के प्रकाशन में ‘निर्भीक’ जी के पुत्र और उनकी साहित्यिक वारिसों की अनुमति महत्वपूर्ण रही है।
सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण भोजपुरी पुस्तक में “प्रतिनिधि कविता: भोजपुरी” भी शामिल है, जिसका संपादन अरुणेश नीरंजन और डॉ. बलभद्र द्वारा किया गया है। इस पुस्तक के प्रकाशन से भोजपुरी कविता के प्रतिनिधि नमूने पाठकों तक पहुंचे हैं। इसके अलावा, ट्रस्ट द्वारा “मुंबई नाइट्स” नामक क्राइम फिक्शन का भोजर्फी अनुवाद भी छपने वाला है, जो भोजपुरी भाषा में आधुनिक साहित्य की विधाओं को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
इसके अलावा, नरेंद्र शास्त्री की पुस्तकों को भी सर्व भाषा ट्रस्ट ने प्रकाशित किया है। नरेंद्र शास्त्री भारतीय साहित्य के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं, और उनकी पुस्तकों का भोजपुरी और अन्य भाषाओं में प्रकाशन केशव पांडेय की बहुभाषी दृष्टि का प्रमाण है। ट्रस्ट के तहत नरेंद्र शास्त्री की विभिन्न रचनाओं को प्रकाशित करके केशव पांडेय ने यह साबित किया है कि वे केवल भोजपुरी साहित्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय साहित्य की समग्र समृद्धि के लिए कार्य कर रहे हैं।
आम पाठको के बीच भोजपुरी को प्रोत्साहित करने के लिए केशव पांडेय की एक अनोखी योजना है, जो पाठकों को साहित्य तक पहुंचने में सक्षम बनाती है। उनकी योजना के अनुसार, पाठकों को केवल 500 रुपए में हिंदी के मशहूर लेखकों की 3 पुस्तकें और 1,000 रुपए में 5 पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके अलावा, 10,000 रुपए में किसी भी भाषा के अलग-अलग विधाओं की 100 पुस्तकें खरीदी जा सकती हैं। बच्चों और युवा लोगों के लिए इस योजना में विशेष छूट दी जाएगी, जिससे भविष्य की पीढ़ियां साहित्य से जुड़ सकें।
यह योजना साहित्य के लोकतंत्रीकरण की एक बेहतरीन मिसाल है, जहां केशव पांडेय ने साहित्य को केवल धनी वर्ग तक सीमित न रहने देकर आम जनता के लिए सुलभ बनाया है।
केशव पांडेय की यह पहल इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि वे न केवल एक प्रकाशक हैं, बल्कि एक साहित्य सेवक हैं जो भाषा और साहित्य के प्रति गहरी समर्पण भावना रखते हैं। उनकी दूरदर्शिता इस बात में दिखती है कि वे भोजपुरी जैसी हाशिए पर पड़ी भाषा के साहित्य को बचाने के लिए आगे आए। उनकी अथक परिश्रमशीलता इस बात में स्पष्ट है कि दो वर्षों में ही ट्रस्ट ने 500 पुस्तकों का प्रकाशन किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केशव पांडेय में वह मानवता और संवेदनशीलता है जो एक सच्चे साहित्य सेवक में होनी चाहिए। वे केवल व्यापार नहीं करते, बल्कि साहित्य के माध्यम से समाज सेवा कर रहे हैं।
भोजपुरी साहित्य को वापस लाने के इस संघर्ष में केशव पांडेय ने साबित कर दिया है कि जब एक व्यक्ति साहित्य के प्रति सच्ची समर्पण भावना रखता है, तो वह एक पूरे भाषागत समुदाय के साहित्य को बचा सकता है। उनकी यह पहल न केवल भोजपुरी भाषी लोगों के लिए गर्व की बात है, बल्कि पूरे भारतीय साहित्य जगत के लिए प्रेरणा का स्रोत है।



