सतलुज’ हटते ही उठा सवाल—’कश्मीर फ़ाइल्स’ और ‘केरला स्टोरी’ के लिए आज़ादी, इस फ़िल्म पर रोक क्यों?

मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित अभिनेता-गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को रिलीज़ के महज दो दिन बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 से हटाए जाने के बाद देशभर में नई बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर इस फैसले को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताते हुए कई फिल्मकारों, नेताओं और कलाकारों ने सवाल उठाए हैं। वहीं कुछ लोग फिल्म पर खालिस्तान समर्थक नैरेटिव पेश करने का आरोप लगाते हुए इसे हटाने के फैसले का समर्थन भी कर रहे हैं।
दो दिन बाद ही हटाई गई फिल्म
दिलजीत दोसांझ अभिनीत यह फिल्म 3 जुलाई को ‘सतलुज’ नाम से ZEE5 पर रिलीज हुई थी। इससे पहले इसका नाम ‘पंजाब 95’ था, लेकिन लंबे समय तक रिलीज़ अटकने और सेंसर बोर्ड की आपत्तियों के बाद इसका नाम बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया।
रिलीज़ के सिर्फ दो दिन बाद, 5 जुलाई की शाम ZEE5 ने फिल्म को भारत में अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। प्लेटफॉर्म ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि फिल्म को दर्शकों का भरपूर प्यार मिला है, लेकिन “अगले आदेश तक” इसे भारत में उपलब्ध नहीं कराया जाएगा। साथ ही यह भी कहा गया कि फिल्म को जल्द दोबारा उपलब्ध कराने के विकल्पों पर काम किया जा रहा है।
कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा?
फिल्म की कहानी मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद विरोधी अभियान के दौरान कथित फर्जी मुठभेड़ों और लापता लोगों के मामलों को उजागर करने वाले खालड़ा ने हजारों अज्ञात अंतिम संस्कारों और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के दस्तावेज सामने रखे थे।
सीबीआई की जांच के अनुसार, 6 सितंबर 1995 को पंजाब पुलिस के कुछ अधिकारियों ने उन्हें उनके घर से कथित तौर पर अगवा कर लिया था। बाद में उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले में कई पुलिस अधिकारियों को दोषी ठहराया गया था।
सेंसर बोर्ड के कट्स पहले भी बने थे विवाद
फिल्म पहले ‘पंजाब 95’ नाम से रिलीज़ होनी थी, लेकिन केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने इसमें 120 से अधिक कट लगाने की सिफारिश की थी। इसके बाद फिल्म की रिलीज़ कई बार टली और आखिरकार नया नाम देकर इसे ओटीटी पर रिलीज किया गया।
दिलजीत दोसांझ बोले- ‘हद हो गई’
फिल्म हटाए जाने पर दिलजीत दोसांझ ने इंस्टाग्राम लाइव के जरिए नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें पहले से अंदेशा था कि ऐसा हो सकता है।
दिलजीत ने कहा कि जिस व्यक्ति की आवाज़ 1995 में दबा दी गई थी, उसकी कहानी 2026 में भी लोगों तक नहीं पहुंचने दी जा रही है। उन्होंने कहा कि फिल्म में कोई नई बात नहीं कही गई है, बल्कि अदालतों में दर्ज तथ्यों को ही दिखाया गया है। उनके मुताबिक, “हम आज भी सच पर बात नहीं कर सकते, यह मेरी समझ से बाहर है।”
कुणाल कामरा ने उठाए सवाल
कॉमेडियन कुणाल कामरा ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लंबी पोस्ट लिखकर फिल्म हटाने का विरोध किया। उन्होंने सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और प्रसार भारती के चेयरमैन प्रसून जोशी को टैग करते हुए पूछा कि आखिर ‘पंजाब 95’ में 127 कट लगाने की जरूरत क्यों पड़ी।
उन्होंने लिखा कि अगर दस्तावेजी तथ्यों पर आधारित एक फिल्म भी भारतीय दर्शक नहीं देख सकते, तो जनता यह जानने की हकदार है कि इसकी वजह क्या है।
कामरा ने तंज कसते हुए लिखा कि ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरला स्टोरी’ और अन्य फिल्मों के लिए रेड कार्पेट बिछाया जाता है, लेकिन ‘सतलुज’ को दो दिन में हटा दिया जाता है। उन्होंने यहां तक लिखा कि “जसवंत सिंह खालड़ा का एक बार फिर अपहरण कर लिया गया है।”
रामगोपाल वर्मा की अपील
फिल्म निर्माता रामगोपाल वर्मा ने भी फिल्म के समर्थन में पोस्ट लिखी। उन्होंने कहा कि ‘सतलुज’ ऐसी फिल्म है जिसे देखा जाना चाहिए, उस पर बहस होनी चाहिए और चर्चा होनी चाहिए।
उन्होंने सत्ता से अपील करते हुए लिखा कि फिल्म का भी “एनकाउंटर” न किया जाए और उसके साथ वही व्यवहार न हो जो जसवंत सिंह खालड़ा के साथ हुआ था।
राजनीतिक दल भी आमने-सामने
शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने फिल्म हटाने को पंजाब के इतिहास और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा के बलिदान को इस तरह खामोश नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस सांसद धरमवीर गांधी ने भी इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि पंजाब के लोगों को इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
तृणमूल कांग्रेस के नेता साकेत गोखले ने इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी बताते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री को पत्र लिखने की जानकारी दी।
वहीं आम आदमी पार्टी के नेता कुलदीप धालीवाल ने कहा कि फिल्म पर लगा प्रतिबंध हटाया जाना चाहिए और इसे सिनेमाघरों में भी रिलीज किया जाना चाहिए ताकि लोग पंजाब के उस दौर को समझ सकें।
सोशल मीडिया पर दो धड़े
फिल्म हटने के बाद सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंटा नजर आया। एक वर्ग का कहना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित फिल्मों को रोका नहीं जाना चाहिए।
दूसरी ओर कुछ यूजर्स का आरोप है कि फिल्म पंजाब के उग्रवाद और खालिस्तान से जुड़े मुद्दों को एकतरफा ढंग से पेश करती है और इससे गलत संदेश जा सकता है।
अभी भी स्पष्ट नहीं हटाने की वजह
फिलहाल ZEE5 ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि फिल्म को किस कारण हटाया गया। प्लेटफॉर्म ने केवल इतना कहा है कि अगले आदेश तक फिल्म भारत में उपलब्ध नहीं होगी और इसे दोबारा स्ट्रीम करने के लिए सभी संभावित विकल्पों पर काम किया जा रहा है।
ऐसे में फिल्म को हटाने के पीछे कानूनी, नियामकीय या अन्य कारण क्या हैं, इस पर अभी आधिकारिक स्थिति सामने आना बाकी है। वहीं ‘सतलुज’ को लेकर शुरू हुई बहस ने एक बार फिर भारत में सेंसरशिप, अभिव्यक्ति की आजादी और ऐतिहासिक विषयों पर बनने वाली फिल्मों के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।



