खामेनेई की अंतिम यात्रा: मशहद की ऐतिहासिक ‘इमाम रज़ा दरगाह’ में क्यों होंगे सुपुर्द-ए-खाक? जानें शिया आस्था के इस सर्वोच्च केंद्र की पूरी कहानी

Tehran-Mashhad News: अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले में मारे गए ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में लगभग चार महीने बाद, 4 जुलाई से शुरू हो चुकी हैं। पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त ईरान के पवित्र शहर मशहद (Mashhad) पर टिकी हैं, जहां आगामी 9 जुलाई को खामेनेई को शिया इस्लाम के 8वें इमाम, इमाम अली रज़ा की पवित्र दरगाह परिसर में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
खामेनेई को दफनाने के लिए इस जगह का चुना जाना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि शिया समुदाय की सर्वोच्च आध्यात्मिक आस्था और खुद खामेनेई के राजनीतिक-धार्मिक सफर की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
अंतिम संस्कार में उमड़ी दुनिया: भारत से पहुंचा उच्च स्तरीय दल
इस ऐतिहासिक और भावुक क्षण का गवाह बनने के लिए दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्ष और राजनीतिक हस्तियां ईरान पहुंच रही हैं। भारत सरकार ने भी इस मौके पर एक बेहद महत्वपूर्ण और सर्वदलीय उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ईरान भेजा है:
- नेतृत्व: केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री पवित्रा मार्गेरित और बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन इस दल का नेतृत्व कर रहे हैं।
- प्रतिनिधिमंडल में शामिल अन्य नेता: वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी इस दल का हिस्सा हैं।
कौन थे इमाम रज़ा, जिनके आगोश में आराम करेंगे खामेनेई?
इमाम अली इब्न मूसा अल-रज़ा (जन्म 766 ईस्वी) पैगंबर मोहम्मद साहब के सीधे वंशज और शिया मुसलमानों के आठवें इमाम थे।
- ज्ञान और सहिष्णुता के प्रतीक: इमाम रज़ा को उनके अद्वितीय धार्मिक ज्ञान, सादगी और न्यायप्रियता के लिए जाना जाता है। वे अपने दौर के सबसे बड़े वक्ता और उस्ताद थे।
- ‘मशहद’ नाम की कहानी: अरबी और फारसी में ‘मशहद’ का मतलब होता है—”शहादत का स्थान”। इमाम रज़ा की शहादत के बाद ही इस पूरे शहर का नाम मशहद पड़ा, जो आज दुनिया भर के करोड़ों शिया मुस्लिमों के लिए मक्का और मदीना के बाद सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है।
स्थापत्य कला का अजूबा: क्यों खास है यह दरगाह?
इमाम रज़ा का मकबरा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि इस्लामी स्थापत्य और फारसी शिल्पकला का एक बेजोड़ और जीवंत संग्रहालय है।
- स्वर्ण मंडप और विशाल प्रांगण: इस परिसर में सोने के विशाल गुंबद, अलंकृत मीनारें और विशाल आंगन हैं।
- कांच और मीनाकारी का काम: दरगाह के भीतर बारीक जालीदार नक्काशी, कीमती धातुओं का काम और उत्कृष्ट शीशामहल (Mirror-work) जैसा काम किया गया है।
- सांस्कृतिक और शैक्षिक हब: इस परिसर में एक बेहद समृद्ध पुस्तकालय और मदरसा भी है, जहां सदियों पुराने दुर्लभ ऐतिहासिक ग्रंथ मौजूद हैं। दुनिया भर के शोधकर्ता और छात्र यहाँ अध्ययन के लिए आते हैं।
‘अंतिम विश्राम’ के लिए मशहद ही क्यों?
अयातुल्लाह अली खामेनेई को इस दरगाह में दफनाए जाने के पीछे गहरा धार्मिक और राजनीतिक संदेश है। शिया मान्यता में इमाम रज़ा की दरगाह के करीब दफन होना सर्वोच्च आध्यात्मिक सम्मान माना जाता है। ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में खामेनेई ने हमेशा खुद को इमामों के सिद्धांतों का संरक्षक माना। उनकी अंतिम यात्रा को इस पवित्र स्थल पर समाप्त कर ईरान दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि संकट और युद्ध के इस दौर में भी देश अपनी आध्यात्मिक जड़ों और इस्लामी पहचान के साथ मजबूती से खड़ा है।



