भारत: होर्मुज़ संकट से रुपये पर दबाव, आयात बिल में उछाल- साथ ही मानसून की तबाही

ओम दत्त

होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जारी युद्ध ने भारत के तेल आयात बिल, रुपये की कीमत और शेयर बाज़ार में विदेशी निवेश पर सीधा असर डाला है, जबकि देश के कई राज्य मानसून की भीषण बाढ़ से जूझ रहे हैं।
जुलाई के मध्य में हुई ताज़ा हलचल के बाद ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को व्यावसायिक जहाज़ों के लिए बंद कर दिया, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमत 85-90 डॉलर प्रति बैरल के दायरे तक पहुंच गई।
इसका सीधा असर भारतीय रुपये पर पड़ा, जो 96.40 से 96.96 प्रति डॉलर के आसपास-मई 2026 में बने अपने सर्वकालिक निचले स्तर (96.96) के करीब कारोबार करता देखा गया, यानी एक महीने में करीब 1.7% की गिरावट। विदेशी निवेशकों ने 2026 की पहली चार महीनों में ही भारतीय शेयर बाज़ार से 2000 करोड़ डॉलर से ज़्यादा की निकासी की, जो पिछले पूरे साल के रिकॉर्ड को भी पार कर चुकी है।
रिपोर्टों के अनुसार भारत का कच्चे तेल का आयात बिल वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में करीब 60% बढ़ा है। हालांकि घरेलू स्तर पर 1 जुलाई को तेल विपणन कंपनियों ने मासिक समीक्षा के तहत व्यावसायिक (19 किलो) रसोई गैस सिलेंडर की कीमत में करीब 183.50 रुपये की कटौती की, और पश्चिम एशिया में तनाव अस्थायी रूप से कम होने के बाद व्यावसायिक सिलेंडर पर लगी पाबंदियां भी हटा ली गईं।
लेकिन भारत के करीब 90% LPG आयात होर्मुज़ के रास्ते से गुज़रते हैं, इसलिए यह राहत नाज़ुक और उलटी जा सकने वाली है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से 2026 भर अपनी मुख्य रेपो दर 5.25% पर बनाए रखने की उम्मीद है, और वह रुपये की गिरावट थामने के लिए मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप जारी रखे हुए है।
इसी बीच, 18-20 जुलाई के बीच मानसून की भारी बारिश से जम्मू-कश्मीर, नागालैंड और असम में कम से कम 25 लोगों की मौत हो चुकी है, जिससे राज्य आपदा प्रतिक्रिया तंत्र पर दबाव बढ़ गया है।
भारत अपनी करीब 85-90% कच्चे तेल की ज़रूरत और लगभग 90% LPG आयात खाड़ी/होर्मुज़ मार्गों से पूरा करता है, जिससे यह भू-राजनीतिक झटके के प्रति बेहद संवेदनशील है, इसका सीधा असर महंगाई, राजकोषीय घाटे, मुद्रा स्थिरता और विदेशी निवेश धारणा पर पड़ता है। यह सब तब हो रहा है जब देश एक साथ घातक घरेलू बाढ़ आपदा से भी जूझ रहा है, जिससे नीति-निर्माताओं के सामने एक साथ कई मोर्चों पर चुनौती है।
रुपये में गिरावट से आयातित सामान ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाद्य तेल महंगे हो सकते हैं। 1 जुलाई की कटौती के बावजूद, अगर होर्मुज़ की नाकाबंदी लंबी खिंचती है तो पेट्रोल-डीज़ल और रसोई गैस की कीमतें फिर बढ़ने का जोखिम बना हुआ है।
शेयर बाज़ार से विदेशी पूंजी की निकासी आम खुदरा निवेशकों और पेंशन-जुड़े फंडों को भी प्रभावित करती है। बाढ़-प्रभावित जम्मू-कश्मीर, असम और नागालैंड के लोग विस्थापन, जान-माल के नुकसान और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान का सामना कर रहे हैं।
RBI का रुख फिलहाल यह है कि महंगाई की उम्मीदों में कोई बड़ी बिगड़ती स्थिति नहीं दिख रही, भले ही तेल का झटका लगा हो, हालांकि केंद्रीय बैंक मुद्रा बाज़ार में सक्रिय हस्तक्षेप जारी रखे हुए है। ऊर्जा विश्लेषकों (जैसे IEEFA) का कहना है कि भारत की खाड़ी-निर्भरता उसे इस तरह के झटकों के प्रति संरचनात्मक रूप से संवेदनशील बनाती है।
अगर होर्मुज़ की नाकाबंदी लंबी खिंचती है, तो कच्चे तेल की कीमतों में और उछाल और रसोई गैस सिलेंडर पर दोबारा पाबंदियां लग सकती हैं। अगर स्थिति शांत होती है (जैसा 17 जुलाई के आसपास संक्षिप्त रूप से देखा गया), तो राहत मिल सकती है। RBI का मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप जारी रहने की उम्मीद है, और 21 जुलाई के बाद भी मानसून की बारिश जारी रहने से बाढ़ राहत और बुनियादी ढांचे के नुकसान का आकलन एक सतत घरेलू मुद्दा बना रहेगा।



