शिक्षा: दुनिया भर में स्कूल छोड़ने वालों की संख्या लगातार सातवें साल बढ़ी, भारत में सीखने का संकट गहराया

UNESCO की नई रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में स्कूल पूरा करने की दर तो बढ़ रही है, लेकिन स्कूल से बाहर बच्चों की संख्या लगातार सातवें साल बढ़कर 27.3 करोड़ हो गई है – जो दिखाता है कि “दाखिले” और “असल सीखने” के बीच खाई चौड़ी होती जा रही है।

जुलाई 2026 की शुरुआत में UNESCO इंस्टीट्यूट फॉर स्टैटिस्टिक्स और ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (GEM) टीम ने संयुक्त रूप से “2026 SDG 4 स्कोरकार्ड” जारी किया, जो 170 देशों में स्कूल पूरा करने की दर को ट्रैक करता है।

मुख्य निष्कर्ष यह है कि उच्च माध्यमिक स्तर पर स्कूल पूरा करने की दर बढ़ रही है, लेकिन यह सुधार असल में नए दाखिलों में वृद्धि से नहीं बल्कि “कक्षा दोहराने” की दर घटने से आ रहा है- यानी बच्चे कक्षा में आगे तो बढ़ रहे हैं, पर ज़रूरी नहीं कि सीख भी रहे हों। मार्च 2026 में शुरू हुई व्यापक GEM रिपोर्ट “काउंटडाउन टू 2030: एक्सेस एंड इक्विटी” के अनुसार दुनिया भर में 27.3 करोड़ बच्चे और युवा स्कूल से बाहर हैं- यह लगातार सातवां साल है जब यह आंकड़ा बढ़ा है।

दुनिया भर में हर छठा स्कूली उम्र का बच्चा शिक्षा से वंचित है, और सिर्फ तीन में से दो छात्र ही माध्यमिक शिक्षा पूरी कर पाते हैं। भारत के लिए एक चिंताजनक आंकड़ा सामने आया है – प्राथमिक स्तर पर लगभग 98% दाखिला दर होने के बावजूद, 14 से 18 साल के करीब 25% ग्रामीण युवा कक्षा 2 के स्तर का पाठ भी धाराप्रवाह नहीं पढ़ पाते।

यह आंकड़ा शिक्षा नीति की एक बुनियादी बहस को उजागर करता है -क्या हमें दाखिला दर पर गर्व करना चाहिए या असल सीखने के नतीजों पर ध्यान देना चाहिए? भारत में “निपुण भारत” जैसे बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता मिशनों की सफलता इसी सवाल पर टिकी है। अगर करोड़ों बच्चे “दाखिल” तो हैं पर बुनियादी पढ़ना-लिखना नहीं जानते, तो आने वाले दशकों में यह कार्यबल की उत्पादकता, रोज़गार क्षमता और आर्थिक विकास पर सीधा असर डालेगा।

जो बच्चे कागज़ पर “स्कूल में” गिने जाते हैं पर असल में बुनियादी पढ़ाई नहीं कर पाते, वे बड़े होकर रोज़गार बाज़ार में पिछड़ सकते हैं। यह असर ग्रामीण और कम आय वाले परिवारों पर सबसे ज़्यादा पड़ता है, जिससे सामाजिक-आर्थिक असमानता और गहरी हो सकती है। अभिभावकों के लिए यह एक चेतावनी है कि सिर्फ स्कूल में दाखिला काफी नहीं -बच्चे की असल सीखने की प्रगति पर नज़र रखना ज़रूरी है।

UNESCO का कहना है कि आने वाले वर्षों में मापने के तरीके में बदलाव ज़रूरी है — दाखिला अनुपात की जगह असल सीखने के नतीजों को प्राथमिकता देनी होगी। GEM रिपोर्ट श्रृंखला अगले साल “गुणवत्ता और सीखने” पर और उसके बाद “प्रासंगिकता” पर केंद्रित होगी, जो दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर दबाव आने वाले वर्षों तक बना रहेगा।

भारत में NEP (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) के क्रियान्वयन पर इस रिपोर्ट का असर पड़ सकता है, खासकर बुनियादी साक्षरता मिशनों को और मज़बूत करने की दिशा में। वैश्विक स्तर पर 2030 के सतत विकास लक्ष्यों (SDG 4) को पूरा करने की समय-सीमा नज़दीक आते ही यह दबाव और बढ़ेगा कि देश दाखिले के आंकड़ों से आगे बढ़कर सीखने की गुणवत्ता पर ध्यान दें।

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