साबुन से लेकर चिप्स-बिस्किट तक महंगे होने का खतरा, भारत पर पाम ऑयल संकट की मार

जुबिली न्यूज डेस्क

नई दिल्ली: ईरान में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz में संभावित नाकेबंदी के चलते भारत की ऊर्जा सुरक्षा पहले ही दबाव में है। अब देश के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है—पाम ऑयल की आपूर्ति में संभावित कमी।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयातक है। देश हर साल करीब 9.5 मिलियन टन पाम ऑयल की खपत करता है, जबकि घरेलू उत्पादन 4 लाख टन से भी कम है। यानी जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है।

पाम ऑयल ताड़ के पेड़ों से तैयार किया जाता है, जिनकी खेती के लिए भारी बारिश और अधिक पानी की जरूरत होती है। यही वजह है कि इसका उत्पादन मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों—खासकर
Indonesia और
Malaysia
में होता है।

भारत अपने कुल पाम ऑयल आयात का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से मंगाता है, जिसमें अकेले इंडोनेशिया की हिस्सेदारी लगभग 50% है।

अब Indonesia ने एक बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। वह पाम ऑयल को निर्यात करने के बजाय घरेलू स्तर पर बायोडीजल (B50) उत्पादन में इस्तेमाल कर रहा है।

  • इससे वैश्विक बाजार में सप्लाई घट सकती है
  • अनुमान है कि सालाना 15–20 लाख टन पाम ऑयल की कमी हो सकती है
  • इसका सीधा असर भारत जैसे बड़े आयातकों पर पड़ेगा

विशेषज्ञों के मुताबिक:

  • खाने के तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है
  • महंगाई पर दबाव बढ़ेगा
  • सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है

पहले से कच्चे तेल की आपूर्ति में अनिश्चितता और अब पाम ऑयल संकट—दोनों मिलकर भारत की आर्थिक चुनौतियों को और जटिल बना सकते हैं।

ईरान संकट और होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति के बीच पाम ऑयल सप्लाई में संभावित कमी भारत के लिए एक नई चिंता बनकर उभरी है। अगर वैश्विक सप्लाई जल्द स्थिर नहीं हुई, तो इसका असर आम लोगों की रसोई से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक देखने को मिल सकता है।


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