हलाला की आड़ में अपराध नहीं चलेगा! इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा संदेश

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अमरोहा में दर्ज हलाला से जुड़े एक चर्चित मामले में एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया है कि पर्सनल लॉ की आड़ में किसी भी आपराधिक कृत्य को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता नाबालिग है, तो उसके साथ यौन संबंध बनाना, चाहे वह किसी धार्मिक परंपरा के नाम पर ही क्यों न हो, भारतीय कानून के तहत अपराध है।

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि संविधान और आपराधिक कानून किसी भी धार्मिक प्रथा से ऊपर हैं, जब मामला किसी व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और शारीरिक सुरक्षा से जुड़ा हो।

प्राथमिकी के अनुसार, पीड़िता का निकाह महज 15 वर्ष की आयु में करा दिया गया था। विवाह के बाद उसके साथ मारपीट की गई और कुछ समय बाद उसे तीन तलाक दे दिया गया। बाद में पति ने दोबारा विवाह की इच्छा जताई, जिसके लिए कथित तौर पर निकाह हलाला की प्रक्रिया अपनाने को कहा गया।

आरोप है कि हलाला के नाम पर एक मौलाना ने नाबालिग पीड़िता के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। इसके बाद दोबारा तलाक होने पर फरवरी 2025 में कथित रूप से दो अन्य व्यक्तियों ने भी हलाला के नाम पर उसके साथ यौन संबंध बनाए। अदालत ने इन आरोपों को गंभीर मानते हुए एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया।

अदालत ने कहा कि पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे के साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध अपराध है, चाहे सहमति का दावा किया जाए या किसी धार्मिक परंपरा का हवाला दिया जाए। कोर्ट ने यह भी माना कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला सामूहिक दुष्कर्म और पॉक्सो कानून के तहत गंभीर अपराध की श्रेणी में आएगा।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाएगा, लेकिन किसी भी परंपरा के नाम पर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह फैसला निकाह हलाला और मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर चल रही कानूनी बहस के बीच आया है। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने शायरा बानो मामले में तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया था। वहीं निकाह हलाला और बहुविवाह की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश स्पष्ट करता है कि किसी भी धार्मिक प्रथा का दुरुपयोग कर महिलाओं या नाबालिगों के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। अदालत ने प्रथा की धार्मिक वैधता पर टिप्पणी किए बिना यह स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि किसी परंपरा के नाम पर अपराध होता है, तो उस पर भारतीय दंड कानून और पॉक्सो अधिनियम समान रूप से लागू होंगे।

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