बीजेपी से समर्थन की नयी शर्ते लिखवाना चाहता है यूपी का ब्राह्मण वोटर ?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय की भूमिका हमेशा से निर्णायक रही है। अनुमानतः 10–12 प्रतिशत आबादी वाला यह वर्ग केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक, बौद्धिक और प्रतीकात्मक प्रभाव के कारण भी सत्ता-संतुलन पर असर डालता है।

आजकल सियासी हलकों में यहाँ सवाल बहुत चर्चा में है  कि क्या ब्राह्मण वास्तव में भाजपा से दूर जा रहा है, या वह केवल अपनी “राजनीतिक नाराजगी” को सौदेबाजी की भाषा में व्यक्त कर रहा है? और क्या यह नाराजगी भाजपा से ज्यादा योगी आदित्यनाथ के मॉडल से है?

2017–2024: ब्राह्मण और भाजपा का सुनहरा गठजोड़

2017 में जब भाजपा ने उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत हासिल किया, तो उसके सामाजिक गठबंधन की सबसे मजबूत दीवारों में से एक ब्राह्मण समाज था। राम मंदिर, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और मजबूत नेतृत्व की छवि ने ब्राह्मणों को भाजपा के साथ खड़ा कर दिया। ब्राह्मणों ने लंबे समय तक खुद को भाजपा की “नेचुरल कंस्टीट्यूएंसी” माना। लेकिन जैसे-जैसे सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा और चेहरों की राजनीति व्यक्तिवादी होती गई, ब्राह्मणों को लगा कि वे केवल वोट-बैंक बनकर रह गए हैं, नीति और नेतृत्व में उनकी हिस्सेदारी घटती जा रही है।

ब्राह्मणों की नाराजगी को केवल टिकट, पद या कोटे से समझना राजनीतिक सरलीकरण होगा। असल मुद्दा है –सरकार और संगठन में प्रतीकात्मक नहीं, वास्तविक हिस्सेदारी की मांग, प्रशासनिक स्तर पर थाने, तहसील, नौकरशाही और कानून-व्यवस्था में खुद को सम्मानित महसूस करना और मॉब-पॉलिटिक्स, फर्जी मुकदमों, एनकाउंटर रजनीति और जातिगत ध्रुवीकरण के बीच अपनी सामाजिक सुरक्षा का भरोसा।

जब किसी समाज को यह महसूस होने लगता है कि “हमने सत्ता दिलाई, पर सत्ता में हमारी आवाज कमजोर हो गई”, तब नाराजगी स्वतः राजनीतिक भाषा में बदलती है।

योगी बनाम भाजपा: गुस्सा व्यक्ति पर, ब्रेक पार्टी पर

यहाँ एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण फर्क है – ब्राह्मण वोटर का गुस्सा अभी पूरी तरह भाजपा नामक पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि योगी मॉडल के कुछ तत्वों के खिलाफ ज्यादा दिखता है। मुख्यमंत्री योगी की छवि मजबूत, निर्णायक और बहुमतवादी नेतृत्व की है तो यह मॉडल “कानून-व्यवस्था” और “हिंदुत्व” पर तो ब्राह्मणों को आकर्षित करता है, लेकिन “पावर शेयरिंग” और “सामाजिक संतुलन” पर सवाल भी खड़ा करता है।

ब्राह्मण महसूस करता है कि भाजपा की “संगठनात्मक राजनीति” में उसके पास अभी भी स्पेस है, पर योगी की “शासकीय राजनीति” में उसका स्पेस सीमित हो गया है। यही कारण है कि आज ब्राह्मण का बड़ा हिस्सा “भाजपा छोड़ने” के मूड में नहीं, बल्कि “योगी को संदेश देने” की मुद्रा में है।

विपक्ष की उलझन: ब्राह्मण को साधे या अपने कोर वोट को बचाए?

यहाँ पर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की रणनीतिक उलझन समझना जरूरी है। सपा का पारंपरिक सामाजिक आधार यादव, पिछड़ा और मुस्लिम समुदाय रहा है। नई राजनीति में वह PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) का नैरेटिव भी गढ़ रही है।

अब सवाल यह है कि अगर सपा खुलकर ब्राह्मण राजनीति करती है, तो क्या उसका पिछड़ा और दलित वोटर यह नहीं मानेगा कि सपा फिर से “सवर्ण झुकाव” वाली पार्टी बन रही है? और क्या भाजपा तुरंत यह प्रचार नहीं करेगी कि “अखिलेश मंडल बनाम ब्राह्मण का नया संघर्ष खड़ा कर रहे हैं”?

इसलिए अखिलेश की रणनीति है –ब्राह्मणों के मुद्दे उठाओ (उत्पीड़न, फर्जी मुकदमे, पुलिस कार्रवाई, सम्मान की बात), भाजपा के अंदर “ठाकुर बनाम ब्राह्मण” नैरेटिव को हवा दो लेकिन खुद को “खुली ब्राह्मण पार्टी” की तरह प्रस्तुत मत करो, ताकि आपका PDA नैरेटिव न टूटे।

यानी अखिलेश ब्राह्मण के पक्ष में बोलते हैं, पर इतना ही बोलते हैं कि संदेश भी जाए और उनके मूल आधार को झटका भी न लगे।

ब्राह्मण–भाजपा समीकरण: टूटन नहीं, ‘रीनेगोशिएशन’

आज की स्थिति को अगर एक वाक्य में समझाया जाए, तो कहा जा सकता है – ब्राह्मण भाजपा से नाता तोड़ नहीं रहा, बल्कि शर्तें नए सिरे से लिखवाना चाहता है। वह चाहता है कि पार्टी में ब्राह्मण नेतृत्व को रिस्क्यू किया जाए, उन्हें केवल “प्रचारक” नहीं, “निर्णायक” भूमिका मिले। पुलिस, प्रशासन, नौकरशाही और न्याय प्रणाली में उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार और न्यायसंगत हिस्सेदारी दिखे और टिकट बंटवारे में महज प्रतीक नहीं, वास्तविक राजनीतिक स्पेस मिले।

अगर भाजपा यह संदेश दे पाती है कि “ब्राह्मण हमारी विचारधारा का केंद्र है, केवल वोटर नहीं”, तो नाराजगी काफी हद तक ठंडी पड़ सकती है। अगर यह संदेश नहीं गया, तो धीरे-धीरे यह नाराजगी “टैक्टिकल वोटिंग” में बदल सकती है – यानी लोकसभा में भाजपा, विधानसभा में दूसरा विकल्प, या उम्मीदवार-आधारित वोटिंग।

सपा और कांग्रेस की सीमा: भरोसे की कमी

भले ही भाजपा से नाराजगी हो, पर ब्राह्मणों का एक बड़ा वर्ग सपा और कांग्रेस को अभी भी “विश्वसनीय स्थायी विकल्प” की तरह नहीं देखता।पिछड़ी जाति व मुस्लिम-प्रभावित सत्ता संरचना को लेकर सपा पर ब्राह्मणों का ऐतिहासिक अविश्वास है । दूसरी तरफ कांग्रेस यूपी में संगठन और नेतृत्व के संकट से जूझती रही है, ब्राह्मणों के लिए कोई ठोस, जमीन से जुड़ा बड़ा चेहरा नहीं उभर पा रहा।

ऐसी स्थिति में ब्राह्मणों का व्यवहार यह हो सकता है –भाजपा को पूरी तरह छोड़े बिना, कुछ सीटों पर सत्ता को “सिग्नल” देना, टिकट, स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार का आचरण देखकर “केस टू केस” वोटिंग, और क्षेत्रीय स्तर पर छोटे दलों, गठबंधनों या निर्दलीय विकल्पों को भी सीमित स्तर पर आजमाना।

2027 की ओर: ब्राह्मण यदि निर्णायक मोड़ पर गया

अगर भाजपा अपने अंदरूनी समीकरण ठीक नहीं करती और योगी मॉडल में ब्राह्मणों को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस नहीं मिलता, तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण वोट में टैक्टिकल शिफ्ट दिख सकता है हलाकि यह शिफ्ट 100% पलटी नहीं होगा, बल्कि 10–20% का भी बदलाव कई सीटों के नतीजे बदल सकता है। विपक्ष, खासकर सपा, इस समय “ब्राह्मण असंतोष” को भाजपा के खिलाफ राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है, लेकिन खुद को ब्राह्मणों का स्थायी घर बनाने की क्षमता अभी तक साबित नहीं कर पाई है।

यानी 2027 की लड़ाई केवल “हिंदुत्व बनाम सेक्युलर” नहीं, बल्कि “सवर्णों के भीतर शक्ति-संतुलन” की भी लड़ाई होगी।

गुस्सा है, पर पूरी तरह विरोध नहीं

आज उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण न तो पूरी तरह भाजपा छोड़ चुका है, न पूरी मजबूती से विपक्ष के साथ खड़ा हुआ है। वह एक असहज, मगर बेहद महत्वपूर्ण स्थिति में है – वह सत्ता से नाराज भी है, सत्ता से अलग भी नहीं है साथ ही भाजपा पर दबाव भी बना रहा है, भाजपा को पूरी तरह काट भी नहीं रहा। वह विपक्ष की ओर देख भी रहा है, पर पुराना भरोसा अभी बना नहीं है।

राजनीतिक दृष्टि से यह वह क्षण है, जब ब्राह्मण समाज अपनी राजनीतिक ‘बॉडी लैंग्वेज’ से संदेश दे रहा है – “हम आपके हैं, पर हमेशा के लिए नहीं; हमें सम्मान, हिस्सेदारी और सुरक्षा चाहिए, वरना हम चुप रहेंगे, पर आपका गणित बिगाड़ देंगे।”

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