UP Politics: यूपी में दोहराई जा रही बिहार की 90 के दशक वाली कहानी!

लखनऊ: भारतीय राजनीति में उत्तर प्रदेश और बिहार की सियासत का ताना-बाना हमेशा से दिलचस्प रहा है। इन दिनों यूपी की राजनीति में जो हलचल दिखाई दे रही है, उसकी पटकथा असल में दशकों पहले बिहार में लिखी जा चुकी है। योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री और सुभासपा (SBSP) प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने जिस तरह से समाजवादी पार्टी और विशेष रूप से यादव समाज के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, वह कोई तात्कालिक गुस्सा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी ‘गैर-यादव ओबीसी’ (Non-Yadav OBC) सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा है।

1990 के दशक में बिहार के भीतर लालू प्रसाद यादव की राजनीति ‘माई’ (MY – मुस्लिम और यादव) समीकरण पर टिकी थी। तब समता पार्टी (अब जेडीयू) और नीतीश कुमार ने सत्ता में केवल एक जाति के कथित वर्चस्व को मुद्दा बनाकर कुर्मी, कुशवाहा, निषाद, नोनिया, तेली और मल्लाह जैसी अन्य पिछड़ी जातियों को एकजुट किया था। इसी ‘गैर-यादव पिछड़ा’ कार्ड ने लालू के किले को ढहा दिया था।

अब ठीक वही कहानी यूपी में दोहराई जा रही है। अंतर बस इतना है कि यहाँ इस आक्रामक अभियान का मोर्चा खुद बीजेपी के बजाय उनके सहयोगी ओम प्रकाश राजभर संभाल रहे हैं। राजभर लगातार सोशल मीडिया और बयानों के जरिए यादव समाज के आपराधिक रिकॉर्ड और कथित गैरकानूनी कार्यों को उजागर कर अन्य पिछड़ी जातियों को लामबंद करने में जुटे हैं।

उत्तर प्रदेश की सियासत का यह कटु सत्य है कि यादव मतदाता समाजवादी पार्टी का सबसे कोर और अटूट वोट बैंक माना जाता है। बीजेपी और उसके सहयोगी यह भली-भांति जानते हैं कि इस वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाना लगभग नामुमकिन है। इसलिए रणनीति को बदला गया है:

  • वोट काटने के बजाय एकजुटता: यादवों को टारगेट करके राजभर का लक्ष्य यादव वोट हासिल करना नहीं, बल्कि अन्य पिछड़ी जातियों (जैसे राजभर, चौहान, मौर्य, सैनी, बिंद आदि) के मन में यह धारणा मजबूत करना है कि सपा के आने से सिर्फ एक जाति का दबदबा बढ़ता है।
  • अखिलेश के ‘PDA’ को चुनौती: अखिलेश यादव जहाँ पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) के नारे के साथ सबको साथ लाने का दावा कर रहे हैं, वहीं राजभर हाल ही में लगे उन पोस्टरों को हवा दे रहे हैं जिनमें सपा पर ‘यादववाद’ करने के आरोप लगे थे।

साल 2014 के बाद से उत्तर प्रदेश में बीजेपी की अभूतपूर्व चुनावी सफलताओं की सबसे बड़ी रीढ़ ‘गैर-यादव ओबीसी’ और ‘गैर-जाटव दलित’ वोट बैंक रहा है।

बीजेपी सीधे तौर पर किसी एक जाति के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोलने से बचती है, ताकि मुख्यधारा की राजनीति में संतुलन बना रहे। ऐसे में ओम प्रकाश राजभर जैसे आक्रामक सहयोगी दल बीजेपी के उसी नैरेटिव (Narrative) को जमीन पर धार दे रहे हैं, जिसे बीजेपी खुद कहने से बचती है। इस रणनीति का सीधा फायदा आगामी चुनावों में गैर-यादव पिछड़ी जातियों को सपा से दूर रखकर बीजेपी के पाले में बनाए रखने में मिलेगा।

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