डंके की चोट पर : वक्त के गाल पर हमेशा के लिए रुका एक आंसू है ताजमहल

शबाहत हुसैन विजेता

अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ताजमहल के सामने आकर खड़े हुए तो बस खड़े ही रह गए. एक दम विस्मित, आश्चर्यचकित. मुंह से शब्द निकलना मुश्किल हो गया. जब सामान्य हुए तो बोले कि इस दुनिया में दो तरह के लोग हैं. एक वह जिन्होंने ताजमहल देखा है और दूसरे वह जिन्होंने ताजमहल नहीं देखा है.

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने ताजमहल को वक्त के गाल पर हमेशा के लिए रुक जाने वाला आंसू करार दिया. रवीन्द्र नाथ टैगोर ने ताजमहल की ख़ूबसूरती को परखा तो इसे बनाने वाले शाहजहाँ के दिल में भी झांककर देखा. बादशाह जानता था कि वक्त के थपेड़ों में उसकी बादशाहत, उसकी बेशुमार दौलत और ताकत सब कुछ खत्म हो जायेगी. वक्त की आंधी तो उसकी यादों को भी उड़ा ले जायेगी, लेकिन जिस मुमताज़ को ज़िन्दगी से भी ज्यादा चाहा उसके लिए बादशाह ने कुछ ऐसा करने का फैसला किया कि सब कुछ खत्म हो जाए मगर मोहब्बत की तासीर कभी खत्म न होने पाए. बीवी की मोहब्बत में 22 साल तक यमुना के किनारे खड़े होकर उसके मकबरे की तामीर को बेहतर और भी बेहतर बनाने में जुटा रहा.

ताजमहल बनाते वक्त शाहजहाँ जिस मनोदशा से गुज़र रहा था शायद उसी को पढ़कर टैगोर ने कहा होगा कि ताजमहल वक्त के गाल पर हमेशा के लिए रुक जाने वाला आंसू है.

मुग़ल बादशाहों पर लगने वाले इल्जामों की बहुत लम्बी फेहरिस्त है. यही वजह है कि इल्जामों के छींटे ताजमहल पर पड़ना भी लाज़मी हैं. ताजमहल को विवादों के घेरे में लाने की तैयारी एक दो साल से नहीं बल्कि एक सदी से चल रही है. ताजमहल को हिन्दू-मुस्लिम बवाल का मुद्दा बनाया जा रहा है. बीजेपी के फायर ब्रांड नेता संगीत सोम ताजमहल को आक्रमणकारियों की निशानी बता चुके हैं. जब संगीत सोम ने ज़हर उगला था तब उन्हें तेजो महालय का ज्ञान नहीं था. 2017 में संगीत सोम ने ताजमहल को भारतीय संस्कृति के लिए काला धब्बा बताया था.

नये-नये इतिहासकार ताजमहल के तहखाने में बने 22 कमरों को खुलवाना चाहते हैं. ज्ञानवापी की तरह उसका वीडियोग्राफी सर्वे करवाना चाहते हैं. वह उन 22 कमरों में शिव मन्दिर से जुड़े सबूत ढूंढना चाहते हैं मगर न उनके साथ अदालत है न सरकार क्योंकि ताजमहल तो कमाऊ पूत है. देश के विभिन्न स्मारकों के पर्यटन से होने वाली कमाई का 19 फीसदी हिस्सा अकेले ताजमहल ही देता है. हर साल दो लाख विदेशी पर्यटक ताजमहल देखने आते हैं. हर विदेशी पर्यटक ग्यारह सौ रुपये का टिकट खरीदकर ताजमहल में घुसता है.

इस बार जब 22 कमरों का मामला उठा तो डॉ. रजनीश कुमार इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुँच गए. कमरों को खुलवाकर जांच की मांग करने लगे. अदालत ने न सिर्फ उनकी याचिका खारिज की बल्कि उन्हें ताजमहल पर पढ़ने और रिसर्च करने की राय भी दे डाली. इसी बीच राजस्थान से बीजेपी सांसद दिया कुमारी की भी इंट्री इस विवाद में हो गई. उन्होंने दावा किया कि ताजमहल की ज़मीन उनके राजघराने की है. ताजमहल के कमरों में राजघराने से सम्बंधित कुछ अंश आज भी मौजूद हैं.

दिया कुमारी ने अपने दावे से पहले अगर इतिहास को भी पढ़ा होता तो शायद उन्होंने ऐसा कोई दावा नहीं किया होता क्योंकि इतिहास यह बताता है कि ताजमहल से पहले यमुना के किनारे जयपुर के महाराजा जयसिंह का आलीशान महल हुआ करता था. ताजमहल बनाने के लिए जब जगह की तलाश शुरू हुई तो शाहजहाँ को वही जगह पसंद आई जहाँ पर महाराजा जयसिंह का महल था.

महाराजा जयसिंह कोई साधारण आदमी नहीं थे जो उनके महल को शाहजहाँ ने यूं ही हड़प लिया होगा. जयपुर राजघराने से इस मुद्दे पर बात की गई. आपसी सहमति के बाद इस महल के बदले आगरा शहर के बीचोबीच महाराजा जयसिंह को एक विशाल महल दिया गया. इसके बाद उस महल को ध्वस्त किया गया तो इतना मलबा निकला कि उसे हटाने में ही कई साल लग जाने का अंदेशा हो गया. ऐसे में बादशाह ने एलान किया आगरा और आसपास के किसान जितनी चाहें उतनी ईंटें उठा ले जाएं. इसके बाद तो लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. देखते ही देखते पूरा मलबा लोग उठा ले गए.

शाहजहाँ आगरा में मोहब्बत का स्मारक बना रहा था. शाहजहाँ जानता था कि हमेशा के लिए कोई नहीं आया. जो पैदा हुआ है उसे एक दिन मर ही जाना है. इस वजह से वह मुमताज़ की याद में बन रहे स्मारक में कोई भी विवाद छोड़कर नहीं जाना चाहते थे तो फिर राजपूताना विरासत की चीज़ों को वह ताजमहल के तहखाने में क्यों सुरक्षित रखवाने का काम करते. उन्होंने तो महल के बदले महल दे दिया ताकि आने वाले दिनों में विवाद की कोई गुंजाइश ही न रह जाए.

शाहजहाँ ने यमुना नदी के किनारे पर ताजमहल को बनाया था तो इसका आर्किटेक्चर इस तरह से तैयार किया गया था कि इमारत की नींव को पानी की नमी हमेशा मिलती रहे. ताजमहल समेत मुग़ल बादशाहों की तमाम इमारतें नदियों के किनारों पर ही बनाई गईं ताकि नदी के पानी की नमी से इमारत को मजबूती मिलती रहे. नींव में लकड़ी की शहतीरें लगाईं गईं क्योंकि लकड़ी पानी पी लेती है और देर तक नम बनी रहती है.

ताजमहल बनाने से पहले उसकी नींव की जगह पर 50 कुएं बनाए गए. उन कुओं तक यमुना का पानी लगातार पहुँचता रहे इसका इंतजाम किया गया. यह कुएं 80 मीटर तक गहरे हैं. इन कुओं में चिकनी मिट्टी और ऐसी सामग्री भरी गई है जो कुओं को कभी भी सूखने न दें.

ताजमहल के नीचे शाहजहाँ ने वह 22 कमरे भी बनाये जिन्हें लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं. अब सुनिये इन 22 कमरों की दास्तान. यूनीवर्सिटी ऑफ़ वियना में एशियन आर्ट की प्रोफ़ेसर एमा कोच ने लिखा है कि बादशाह ने यह सुन्दर और हवादार जगह इसलिए बनाई होगी ताकि शहंशाह जब मकबरे में अपने घर की महिलाओं के साथ आयें तो इस जगह पर न सिर्फ उन्हें ठंडक मुहैया हो बल्कि वहां तक प्रकृति की रौशनी भी पहुँचती हो. एमा कोच के मुताबिक़ ऐसे तहखाने मुग़ल स्थापत्य कला का हिस्सा रहे हैं. पाकिस्तान के लाहौर में मुग़ल किले में नदी की तरफ खुलने वाले ऐसे कमरों को पूरी श्रंखला है. उनके अनुसार शाहजहाँ ताजमहल में आमतौर पर नदी के रास्ते आते थे. वह नाव से घाट पर बनी सीढ़ियों पर उतरते थे और मकबरे में दाखिल होते थे.

बादशाह ने ताजमहल के तहखाने में यह कमरे गर्मियों में इस्तेमाल के लिए बनवाये थे. इन 22 कमरों में 15 कमरे नदी की साइड में बने हैं. इनके अलावा सात और कमरे हैं जो काफी बड़े हैं. दो कमरे अष्टकोणीय कमरे हैं जो खूबसूरत मेहराबों, रंगीन नक्काशी और जालीदार पैटर्न की वजह से किसी को भी अपनी तरफ खींच सकते हैं.

दिल्ली की इतिहासकार राणा सफवी आगरा में ही पली बढ़ी हैं. उनका कहना है कि यह कमरे तो 1978 तक पर्यटकों के लिए खुलते रहे हैं. 1978 में आगरा में ज़बरदस्त बाढ़ आई थी तो इन कमरों में पानी भर गया था. पानी उतरा तो कमरों में रेत भर गई थी. इसके बाद आगरा के जिला प्रशासन ने इन कमरों को पर्यटकों के लिए बंद करने का फैसला किया. वास्तव में इन कमरों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी से कुछ छुपाने वाला हो. इन कमरों को भारतीय पुरातत्व विभाग अब भी खुलवाकर उनकी साफ़-सफाई और मरम्मत इत्यादि करवाता रहता है.

1978 में आगरा के प्रशासन संभालने वाले अधिकारी तो अभी भी होंगे. उनसे बातचीत कर पूरे मामले को सार्वजानिक किया जाना चाहिए था ताकि अगर कोई ग़लतफ़हमी फैलाने का काम कर रहा है तो उसे हमेशा के लिए जवाब मिल जाए.

मोहब्बत की निशानी ताजमहल को बनाने में शाहजहाँ ने 22 साल का वक्त लगाया. उसने इस इमारत के हर पहलू पर खूब रिसर्च की. इमारत में लगने वाले पत्थरों तक को हीरे की तरह से परखा. संगमरमर पर कुरान की आयतें लिखने के लिए सऊदी अरब से कारीगर बुलवाए गए. पत्थरों को ख़ूबसूरती से तराशने के लिए बलूचिस्तान से कारीगर आगरा पहुंचे. संगमरमर पर नक्काशी की तकनीक सीखने के लिए कुछ कारीगरों को इटली भेजा गया. उज्बेकिस्तान के बुखारा से भी कारीगरों को बुलाया गया. ताजमहल को इस शानदार तरीके से तैयार करने के लिए शाहजहाँ ने जो जतन किये वह सब इतिहास की किताबों में दर्ज है.

इतिहास की समझ रखने वाले यह बात जानते हैं कि दुनिया भर से कलाकारों को बुलाकर आगरा में यमुना के किनारे शाहजहाँ ने मुमताज़ की मोहब्बत की जो दास्तान पत्थरों पर उकेरी उसे संगीतकार संगीत में नहीं ढाल सकता. कलाकार उसे कैनवस पर नहीं उकेर सकता, मोहब्बत करने वाला ऐसी ही कोई दूसरी दास्तान नहीं लिख सकता.

ताजमहल के खिलाफ जो ज़हर उगला जा रहा है वो कोई नया थोड़े ही है. शाहजहाँ ने खुद ताजमहल बनाने के बाद नफरत के कई पत्थर अपने सर पर खाए हैं. उसी के अपने बेटे औरंगजेब ने उसे लालकिले में कैद कर दिया था. लालकिले में बने एक सूराख से जिंदगी की आख़री सांस तक ताजमहल को निहारते रहने वाला शाहजहाँ मरने के बाद मुमताज़ की बगल में दफ्न कर दिया गया. शायद लालकिले के सूराख के पास बैठे शाहजहाँ की आँखों से आंसू बनकर जो मोहब्बत बहती रही होगी उसी को रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इतनी शिद्दत से महसूस किया होगा.

ताजमहल ने साल 2018 में सरकार को 145 करोड़ रुपये कमाकर दिए. हर साल यह इमारत करोड़ों कमाकर देती है. लोग खुशी-खुशी महंगा टिकट खरीदकर ताज के दीदार के लिए दौड़े चले आते हैं. दुनिया भर के टूरिस्ट ताज की ख़ूबसूरती को अपनी आँखों में बसाकर साथ ले जाना चाहते हैं.

ताजमहल मुसलमान ने बनाया यह महज़ एक इत्तेफाक है. यह तो बेपनाह मोहब्बत की निशानी है. मोहब्बत किसी मज़हब का नाम थोड़े ही है. मोहब्बत क्या होती है यह तो हज़रत अमीर खुसरो ही बता पाएंगे. छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाई के. या फिर मोहब्बत को समझ पाए गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर जिन्होंने इतनी विशाल इमारत को गाल पर रुके आंसू की बूँद में देख लिया. बिल क्लिंटन की बात को सोचता हूँ तो लगता है कि इस दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग हैं एक वो जो मोहब्बत को समझ पाए और दूसरे वो जो मोहब्बत को नहीं समझ पाए.

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