Saturday - 3 December 2022 - 8:59 PM

डंके की चोट पर : सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं बिकने दूंगा

शबाहत हुसैन विजेता

मेरे पसंदीदा शायर बशीर बद्र ने लिखा था, “उम्र बीत जाती है एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में” यह शेर हालांकि उनका खुद का दर्द था. यह शेर मेरठ में हुए दंगे से निकला था. मगर हकीकत की ज़िन्दगी में खुद को सामने रखकर इस शेर को परखा जाए तो इसमें सिवाय हकीकत के कुछ भी नहीं है. सिर्फ एक अच्छा घर तैयार करने में उम्र का बड़ा हिस्सा निकल जाता है. इस तैयारी में अपने कितने शौक छोड़ने पड़ते हैं. कितनी बार अपने मन को मारना पड़ता है. कितनी बार चाहकर भी वह कपड़ा नहीं खरीदते जो पसंद आ गया था क्योंकि बच्चो की स्कूल ड्रेस ज्यादा ज़रूरी थी.

एक घर को सजाने में पूरी उम्र चली जाती है. ज़्यादातर लोगों के पास सिर्फ एक घर सजाने की ज़िम्मेदारी होती है और वह उसी में रात-दिन मेहनत करते रह जाते हैं. हिन्दुस्तान की एक बड़ी कम्पनी के मालिक से मेरे काफी करीबी रिश्ते रहे. वह रात तीन बजे से पहले कभी अपने ऑफिस से नहीं उठे. दिन में भी एक मीटिंग के बाद दूसरी मीटिंग, कभी लखनऊ, कभी दिल्ली और कभी विदेश. मगर चेहरे पर थकान की शिकन नहीं. एक रोज़ उनसे पूछा कि हज़ारों करोड़ हासिल कर लेने के बाद भी इस लगातार भागदौड़ का क्या मतलब है. उन्होंने कहा मुझे एक लाख 86 हज़ार किचेन का ध्यान रखना पड़ता है. सो जाऊँगा तो बहुत से लोगों को खाना मिलना मुश्किल हो जायेगा.

वह कम्पनी आजकल दिक्कतों से जूझ रही है क्योंकि उसकी सरकार से पटरी नहीं खाई. उस कम्पनी पर तमाम इल्जाम हैं. उस कम्पनी में काम करने वाले न जाने कितने लोग बेरोजगार हो गए. न जाने कितनों ने सुसाइड कर लिया. इस कम्पनी की बहुत बड़ी रकम उसके असली मालिकों तक पहुंचाने के नाम पर एक सरकारी डिपार्टमेंट ने जमा करा रखी है. उस डिपार्टमेंट को वह लोग तो नहीं मिले जिन्हें रकम लौटानी थी मगर कम्पनी विकलांग सरीखी हो गई.

एक घर चलाना मुश्किल होता है तो ज़ाहिर है कि एक कम्पनी चलाना घर चलाने से हज़ारों गुना मुश्किल होगा ही. फिर अगर देश चलाना हो तो सामने खड़े मुश्किलों के पहाड़ों को समझना बहुत ज्यादा मुश्किल होगा ही.

पड़ोसी देश श्रीलंका हिन्दुस्तान का नक्शा देखिये तो एक बूँद सरीखा लगता है. जिस श्रीलंका में पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं. यह देश कई साल आतंकवाद से जूझा है. प्रभाकरण जैसे आतंकी ने लोगों का जीना दूभर कर रखा था लेकिन उस आतंकवाद से उबरकर भी श्रीलंका उन हालात में पहुँच गया कि प्रधानमन्त्री को अपना देश छोड़कर भागना पड़ा. प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति के घर जला दिए गए. सरकार को पूरे देश में पहले इमरजेंसी और इसके बाद कर्फ्यू लगाना पड़ा लेकिन माहौल नहीं ठीक हो पाया. सड़कों पर जमा भीड़ को घरों में नहीं पहुंचाया जा सका. मंत्रियों की पिटाई हुई. सरकार के तलवे चाटने वाले पत्रकारों की बुरी गत हुई. जो पत्रकार प्रधानमन्त्री के साथ बैठते थे वह सड़क पर नंगे घूमते दिखे, सुरक्षा घेरे में रहने वाले मंत्री को कार समेत नदी में फेंक दिया गया.

एक खुशहाल देश जल रहा है क्योंकि इस देश के हुक्मरानों ने कर्ज़ पर ऐश की नीति को अपनाया. हालात को बिलकुल सही दिखाने के चक्कर में सरकार ने इतना कर्ज़ ले लिया कि उसके पास ईंधन तो छोड़िये खाने का सामान खरीदने का भी पैसा नहीं बचा.

जब खबर आई कि श्रीलंका में दूध 2000 रुपये लीटर, शक्कर 290 रुपये किलो और चावल 500 रुपये किलो बिक रहा है तो सुनने वालों ने एक कान से सुनकर दूसरे से बाहर निकाल दिया क्योंकि यह हमारे देश का नहीं पड़ोसी देश का मामला है.

पड़ोसी को छोड़िये खुद के गरेबान में झांकिए. लखनऊ में आटा 28 रुपये किलो मिल रहा है तो खुश होने की ज़रूरत नहीं. यही आटा मुम्बई में 49 रुपये किलो बिक रहा है. पोर्ट ब्लेयर में इसकी कीमत 59 रुपये किलो पहुँच गई है. आटे का मौजूदा दाम पिछले 12 सालों में सबसे ज्यादा है. सोचिये आज आटा महंगा हुआ है तो क्या बाकी सब कुछ ठीक चलता रहेगा. क्या कल इसी आटे से बनने वाली ब्रेड इसी दाम पर मिलेगी. क्या कम्पनियां बिस्कुट के दाम नहीं बढ़ाएंगी. दूध हमारे यहाँ भी तो 60 से 65 रुपये लीटर पहुँच गया है.

पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस के दाम आसमान छू रहे हैं. याद करिये पिछले साल प्याज़ ढाई सौ रुपये किलो में बिक रही थी और यह सवाल देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से पूछा गया था तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था कि मुझे क्या पता मैं तो प्याज खाती ही नहीं.

देश विकास के रास्ते पर चलता है तो किसी को भी खुशी हो सकती है लेकिन जब विरासत में मिली पूँजी को बेच-बेचकर खाने का सिलसिला शुरू होता है तो हालात ऐसे ही बर्बादी की तरफ ले जाते हैं.

पुरानी विरासत को बेचने का सिलसिला 2014 में आयी मोदी सरकार के दौर में शुरू हुआ हो ऐसा भी नहीं है. सबसे पहले सरकारी उपक्रमों की हिस्सेदारी बेचने का काम 1991 में शुरू हुआ था. चन्द्रशेखर प्रधानमन्त्री थे तो उन्होंने पैसों की कमी दूर करने के लिए देश का सोना गिरवीं रखा था. 1991 में देश आर्थिक संकट में था तो सरकार ने सरकारी कम्पनियों से अपनी हिस्सेदारी बेचकर पैसा जमा करने की शुरुआत की थी. मोदी सरकार ने इसी नीति को अपनाया. नरेन्द्र मोदी के कार्यकाल में 121 कम्पनियों से सरकार ने अपनी हिस्सेदारी बेचकर 3.36 लाख करोड़ रुपये की कमाई की. अब तक कि किसी भी सरकार ने सरकारी हिस्सेदारी बेचकर इतनी रकम नहीं जुटाई. यह बात इसलिए कहनी पड़ रही है कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने साढ़े छह साल में 3.36 लाख करोड़ रुपये की सरकारी हिस्सेदारी बेची है जबकि पिछले तीस सालों में 4.89 लाख करोड़ रुपये की हिस्सेदारी बेची गई है.

मोदी सरकार ने कम्पनियों से सरकारी हिस्सा बेचकर पैसा कमाने का जो तरीका ढूँढा है उसे डिस इन्वेस्टमेंट कहते हैं. मतलब कम्पनियों पर सरकारी नकेल कसे रहने के लिए सरकार ने उस पर जो पैसे इन्वेस्ट किये थे उसे पैसे लेकर वापस उसी कम्पनी को सौंप देना.
ज़रूरत पड़े तो एक-एक कम्पनी का नाम लिखा जा सकता है, कहाँ से कितना पैसा जुटाया उस पर बात की जा सकती है मगर आज बात करने का मुद्दा दूसरा है. आज श्रीलंका के हालात पर गौर करने का दिन है. हमें वैसे हालात से न गुज़रना पड़े इस पर चिंतन-मनन और वैसे हालात से खुद को बचा ले जाने की कोशिश करने का वक्त है.

सोचिये और ज़रूर सोचिये कि अचानक से ताजमहल और कुतुबमीनार का मुद्दा क्यों उठाया गया. सोचिये काशी और मथुरा का चैप्टर एज इट इज क्लोज़ करते हुए अयोध्या को हासिल करने के लिए 1991 में जो क़ानून बनाया गया था आज उस क़ानून की धज्जियां क्यों उड़ाई जा रही हैं. सोचिये जिस हिन्दुस्तान में हमेशा से सब मिलजुलकर रहते आये उसमें नफरत आखिर क्यों घोली जा रही है. सोचिये आखिर सरकार को बुल्डोजर की ज़रूरत क्यों पड़ रही है. सोचिये सरकार 80 बनाम 20 का गेम क्यों खेल रही है.

इस सबके पीछे सिर्फ और सिर्फ डिसइन्वेस्टमेंट है. इसके पीछे सरकारी उपक्रम बेचकर उस पैसों को इधर-उधर खपा देने का मामला है. पैसा खर्च हुआ तो समझदारी से नहीं हुआ. हमारी सरकार रिजर्व बैंक से वह रकम भी निकाल चुकी है जो बेहद खराब माहौल में निकाली जाती है.

नौकरियां नहीं हैं. जो नौकरी में हैं वह बेरोजगार हो रहे हैं. प्राइवेट धंधे खत्म हो रहे हैं. मुफ्त की रोटी देकर सरकार वोट के जुगाड़ में लगी है. सोचिये मुफ्त का खाना चाहिए या फिर हाथों को काम. सोचिये सरकार कब तक खिलायेगी. पेट्रोल-डीज़ल पर बेहिसाब टैक्स लेकर भी सरकार चलाना मुश्किल हो रहा है. हज़ारों करोड़ टोल टैक्स लेकर भी सड़कों को सही रख पाना मुश्किल हो रहा है. मुफ्त की रोटियां देश कब तक तोड़ेगा. जब अचानक सरकार के पास मुफ्त का राशन देने को पैसा नहीं होगा तब क्या होगा.

सोचिये, उठिए, सरकार से सवाल पूछिए, अपने लिए काम तलाशिये. श्रीलंका खतरे की घंटी है. इसी घंटी पर जाग जाइए. मन्दिर-मस्जिद के लिए कभी भी लड़ लीजियेगा. बात को समझिये. जो ताजमहल करोड़ों कमाकर देता है क्या सरकार उसके रूप को बदलने देगी. जिस ताजमहल के बाहर विदेशी सरकारों के साथ हमारी सरकार खड़े होकर तस्वीर खिंचाती है उसे बर्बाद होने देगी. नफरतों में बर्बाद होंगे आप और हमारा यह खूबसूरत देश. साल 2014 में नरेन्द्र मोदी ने जहाँ से बात शुरू की थी हम भी वहीं से बात शुरू करेंगे. प्रसून जोशी की कविता याद है ना. सौगंध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं बिकने दूंगा.

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