Friday - 19 August 2022 - 2:33 PM

डंके की चोट पर : उसके कत्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नम्बर अब आया

शबाहत हुसैन विजेता

वह लाउडस्पीकर पर चिल्ला रहे हैं लाउडस्पीकर के खिलाफ. वह हिन्दुओं से चार-चार बच्चे पैदा करने को कह रहे हैं जिन्हें न तो शादी में आस्था है और न ही दुनियावी रिश्तों में. जिन्हें निर्माण की ज़िम्मेदारी दी गई है वह बुल्डोजर लेकर निकल पड़े हैं, और जिन्हें मोहब्बत का टीचर माना जाता रहा है वह नफरत की फसल उगा रहे हैं. सब कुछ उल्टा-पुल्टा है मगर हम विश्वगुरु बनेंगे यह भरोसा है.

मज़हबी कट्टरता नयी चीज़ नहीं है. हमेशा से है मगर पहले आँखों में शर्म हुआ करती थी. लोग कट्टर थे मगर न नफरत करते थे न नफरत सिखाते थे. दो मज़हब के लोग आपस में मिलते थे तो इज्जत से मिलते थे. पीठ पीछे भी बुराई नहीं करते थे.

बहुत ज्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है. तीस-पैंतीस साल पीछे के दौर में कदमताल की जाए तो मौजूदा ज़िन्दगी जहन्नुम सरीखी लगने लगेगी. सुबह की अज़ान से लोग उठते थे. वह अलार्म सरीखी थी. किसी को भी अज़ान से प्राब्लम नहीं होती थी, वह किसी भी मज़हब का हो. अज़ान के बाद लोग सुबह की ताज़ी हवा लेने घरों से निकलते थे तो मन्दिरों से निकलने वाला घंटियों का संगीत मन में ताजगी भर देता था.

नदियाँ साफ़-सुथरी थीं. सूरज निकलने के साथ ही लोग उसमें नहाने के लिए उतर जाते थे. नहाने के बाद पूजा-अर्चना करने मन्दिरों में चले जाते थे. शहर की तंग गलियों में तो कुर्ता-पैजामा पहने टोपी लगाये लोग मस्जिदों से निकल रहे होते थे और मन्दिरों में पूजा के बाद माथे पर तिलक लगाये राम-राम करते हुए लोग वापस लौट रहे होते थे. सब अपने-अपने रास्ते न किसी को किसी से नफरत और न ही दूसरे मज़हब की उधेड़बुन में लगने का वक्त.

अयोध्या-बनारस और चित्रकूट में तो सुबह का नज़ारा देखने के लायक होता था. बनारस में उस्ताद बिस्मिल्ला खां शहनाई बजाते थे तब काशी विश्वनाथ मन्दिर के दरवाज़े खुलते थे. गंगा के पानी में वजू करने के बाद उस्ताद बिस्मिल्ला खां नमाज़ पढ़ने के बाद अपने घर लौट जाते थे.

अयोध्या के राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद ने पूरे हिन्दुस्तान में नफरत की हिलोरें उठा दीं लेकिन अयोध्या की ज़मीन पर खड़े होकर इस मुद्दे को परखने की ज़रूरत है. बाबरी मस्जिद के मुद्दई हाशिम अंसारी और निर्मोही अखाड़े के राम केवल दास तथा दिगम्बर अखाड़े के रामचन्द्र परमहंस के बीच ज़िन्दगी भर दोस्ती बनी रही. हाशिम अंसारी बाबरी मस्जिद की 1949 से पैरवी कर रहे थे. हाशिम अंसारी और रामचन्द्र परमहंस एक ही रिक्शे पर सवार होकर अदालत जाते थे. दोपहर का खाना दोनों साथ में खाते थे, मुकदमे की सुनवाई के बाद दोनों साथ ही वापस लौट जाते थे.

 

जुलाई 2016 में हाशिम अंसारी का इंतकाल हुआ तो उनके दरवाज़े पर अयोध्या के संतों की भीड़ लग गई. महंत ज्ञानदास हाशिम अंसारी की लाश के पास फूट-फूटकर रो पड़े. उन्हें अयोध्या में शीश पैगम्बर की कब्र के पास दफ्न किया गया तो उस वक्त मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू वहां मौजूद थे. अयोध्या के संतों ने वहीं एलान किया कि हाशिम अंसारी के परिवार की ज़िम्मेदारी अब हम उठाएंगे.

अयोध्या के मन्दिरों में फूलों की सप्लाई आज भी मुसलमान करते हैं. राम और सीता के कपड़ों की सिलाई आज भी मुसलमान करते हैं मगर हालात हमें कहाँ ले आये कि एक साध्वी ने कहा कि हिन्दू अब मुसलमानों की बनाई कांवड़ का इस्तेमाल बंद करें. हम कौन से दौर में पहुँच गए जब अचानक से अज़ान की आवाज़ कर्कश लगने लगी.

हालात के बिस्तर की सिलवटों को पढ़ने का सलीका आ जाये तो सब कुछ बहुत साफ़-साफ़ नज़र आने लगेगा. मज़हब जब तक सिर्फ मज़हब था बहुत अच्छा था लेकिन जिस दिन से मज़हब की डोर को सियासी लोगों ने झूला बना लिया यही तोड़फोड़ की जड़ बन गया. कुर्सियां हासिल करने के लिए इंसान को इंसान से लड़ाने का नुस्खा तैयार कर लिया गया.

मन्दिर और मस्जिद के नाम पर हुकूमतें बनने लगीं तो मुल्क के विकास की किताब को बंद कर दिया गया. सियासी लोगों की समझ में आ गया कि अंग्रेजों का फूट डालो और राज करो का नुस्खा बहुत अच्छा था. पुराने दौर के हिन्दू-मुसलमानों के बीच अपने मज़हब को लेकर कट्टरता थी मगर दूसरे मज़हब से नफरत नहीं थी. इन सियासी लोगों ने उसी कट्टरता पर वार करते हुए नफरत की धारा को भी बहा दिया.

मन्दिर के नाम पर बनी हुकूमत जब भी किसी मस्जिद पर बुल्डोजर चलाती तो यह अहसास कराती कि हम ही हैं जो तुम्हें मुगलों की लूटी हुई दौलत वापस दिला रहे हैं. मस्जिदें तोड़ते-तोड़ते बुल्डोजर अब मन्दिरों की तलाश में निकल चुके हैं. दिल्ली के सरोजनीनगर में बने सौ साल से पुराने चार मन्दिरों को ढहाने की तैयारी कर ली गई. मन्दिरों के दरवाजों पर नोटिस चस्पा कर दिया गया है.

दरअसल समझने की यह ज़रूरत हैं कि सियासत अलग चीज़ है और मज़हब अलग चीज़ है. दोनों का घालमेल किया ही नहीं जा सकता. दूध इंसान के लिए बहुत फायदेमंद है तो मछली भी जिस्म की तमाम कमियों को दूर करती है मगर मछली और दूध को साथ-साथ नहीं लिया जाता. मछली खाने के बाद दूध पीने से सफ़ेद दाग की बीमारी हो जाती है. मछली के साथ दही नहीं खाना चाहिए. उड़द की दाल खाने के बाद भी दूध नहीं पीना चाहिए.

सियासत और मज़हब का गठजोड़ में मछली और दूध के गठजोड़ जैसा है. लम्बे वक्त से यह गठजोड़ चलता आ रहा और हुकूमत दिलवाता आ रहा है तो इसे बनाये रखने के लिए सियासत टेस्ट में बदलाव भी करती रहती है ताकि नयापन बना रहे. कभी अज़ान का मुद्दा, कभी सड़क पर नमाज़ का मुद्दा.

लाउडस्पीकर का मुद्दा वह लोग लेकर आये हैं जो लाउडस्पीकर के बगैर विकलांग सरीखे हैं. जिस लाउडस्पीकर पर यह रैलियां करते हैं, नफरत फैलाते हैं, वोटों की जोड़तोड़ करते हैं, दलों का गठजोड़ करते हैं. विपक्ष पर हमला करते हैं उसी लाउडस्पीकर को लेकर हंगामा करते हैं.

हंगामे कामयाब हो जाते हैं क्योंकि इस हंगामे में अफसर, कलाकार, पत्रकार और कवि भी शामिल हो जाते हैं. सबकी अपनी-अपनी ज़रूरतें हैं. किसी को अवार्ड चाहिए है तो किसी को पैसा और किसी को प्रमोशन. अपने थोड़े से फायदे के लिए नफरत का बिजनेस करने वालों ने क़ानून को भी अपनी जेब में रखा हुआ है. हालात खराब होते जा रहे हैं. आपसी मोहब्बत नफरत में बदलती जा रही है. साथ खेलकर बड़े हुए लोग एक दूसरे को खटकने लगे हैं.

संभलने की ज़रूरत है. चीज़ों को समझने की ज़रूरत है. हम लगातार उस रास्ते पर बढ़ते जा रहे हैं जिसमें फिसलन बढ़ती जा रही है और वापसी का रास्ता सकरा होता जा रहा है. जितनी जल्दी यह बात समझ आ जाए बेहतर है कि मज़हब हमें जीने का सलीका सिखाने के लिए है एक दूसरे से दूर करने के लिए नहीं. सरोजनीनगर दिल्ली के मन्दिरों के दरवाजों पर ध्वस्तीकरण का नोटिस रातों में सोने नहीं देता. बार-बार जगाकर पूछता है कि सौ साल से पुराने मन्दिर आखिर अवैध कैसे हो गए. जिनसे लोगों की आस्था जुड़ी है उसे सरकार कैसे तोड़ डालेगी. सरकार क्या किसी की आस्था से खेल सकती है. मगर सच यह भी तो है जो नवाज़ देवबंदी ने लिखा था :-

उसके कत्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नम्बर अब आया.
मेरे कत्ल पे आप भी चुप हैं. अगला नम्बर आपका है.

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