Bihar Voter List: 65 लाख नाम हटाने पर SC की मुहर, EC को मिला हक

नई दिल्ली/पटना। बिहार में वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर चल रहे देश के सबसे बड़े कानूनी विवाद पर बुधवार (27 मई, 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग (Election Commission) की शक्तियों को बरकरार रखते हुए उन सभी याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें आयोग के इस कदम को चुनौती दी गई थी।

कोर्ट ने साफ कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग के पास ‘एसआईआर’ (SIR) प्रक्रिया चलाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। इस फैसले के बाद बिहार में वोटर लिस्ट से हटाए गए 65 लाख नामों पर अंतिम मुहर लग गई है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने अपने फैसले में लोकतंत्र की बुनियादी नींव का हवाला देते हुए चुनाव आयोग के कदम को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा:

  • सत्यनिष्ठा सबसे जरूरी: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान के दिन की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते। वे मूल रूप से वोटर लिस्ट की सटीकता और विश्वसनीयता पर निर्भर करते हैं।
  • 40 साल बाद बड़ा सुधार: कोर्ट ने माना कि बिहार में पिछले चार दशकों (40 साल) से कोई अंतिम गहन संशोधन नहीं हुआ था। तीव्र शहरीकरण और प्रवासन (Migration) के कारण वोटर लिस्ट में भारी अशुद्धियां और डुप्लीकेसी आ गई थी, जिसे सुधारना जरूरी था।

चुनाव आयोग ने बिहार में इस विशेष अभियान के बाद ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 65 लाख लोगों के नाम हटा दिए थे। इस प्रक्रिया के नियमों ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था:

अधिसूचना का कड़ा नियम: एसआईआर के नियमों के मुताबिक, जो वोटर्स साल 2002 या 2003 की वोटर लिस्ट में मौजूद नहीं थे, उन्हें अपना नाम बनाए रखने के लिए उस समय की लिस्ट में मौजूद किसी व्यक्ति के साथ अपना ‘पुश्तैनी संबंध’ (Ancestral Link) साबित करना था।

इसी नियम को लेकर सामाजिक संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि चुनाव आयोग एक तरह से “एनआरसी (NRC) जैसी प्रक्रिया” चलाकर लोगों की नागरिकता की जांच कर रहा है, जो कि सिर्फ केंद्र सरकार का अधिकार क्षेत्र है, चुनाव आयोग का नहीं।

इस मामले में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने अपना बचाव करते हुए कोर्ट में एक बड़ा तकनीकी पक्ष रखा था। आयोग ने स्पष्ट किया था कि पहचान पत्र या सरकारी दस्तावेज नागरिकता का ‘अंतिम या पुख्ता सबूत’ नहीं हो सकते, इसलिए वोटर लिस्ट की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए ‘पुश्तैनी लिंक’ की जांच जरूरी थी।

प्रशांत भूषण ने इतनी बड़ी आबादी (65 लाख) के नामों को ‘मृत’ या ‘प्रवासी’ बताकर हटाने की समयसीमा पर भी गंभीर सवाल उठाए थे। हालांकि, कोर्ट ने इन सभी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए आयोग के फैसले को पूरी तरह संवैधानिक माना है। इस फैसले के बाद अब बिहार की राजनीतिक और चुनावी तैयारियों को एक नई दिशा मिलेगी।

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