ईरान ने कैसे कर दिया ट्रंप और IAEA को अंधा? गायब हुआ परमाणु ‘खजाना’, बढ़ी अमेरिका की टेंशन

तेहरान/वाशिंगटन। ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। दोनों देशों के बीच हालिया सैन्य टकराव के बीच सबसे बड़ी चिंता ईरान का ‘परमाणु खजाना’ बन चुका है।
आलम यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु निगरानी संस्था, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA), ईरान के मौजूदा परमाणु कार्यक्रम को लेकर पूरी तरह अंधेरे में है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति के जिम्मेदार खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं, जिनका एक पुराना फैसला आज पूरे पश्चिम के लिए गले की हड्डी बन गया है।
क्या था ओबामा का ऐतिहासिक समझौता और ट्रंप की ‘भूल’?
साल 2015 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान ईरान और छह वैश्विक शक्तियों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था, जिसे JCPOA (जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन) कहा जाता है।
- समझौते की शर्त: इसके तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों (IAEA) को अपने ठिकानों की चौबीसों घंटे निगरानी और औचक निरीक्षण की खुली छूट देने पर सहमत हुआ था।
- ट्रंप का यू-टर्न: साल 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को ‘इतिहास की सबसे खराब डील’ बताते हुए अमेरिका को इससे अलग कर लिया। ट्रंप का मानना था कि कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाकर वे ईरान को अधिक सख्त शर्तों पर घुटने टेकने के लिए मजबूर कर देंगे। लेकिन यह दांव पूरी तरह उल्टा पड़ गया।
प्रतिबंधों के जवाब में ईरान की ‘जासूसी रोको’ नीति
अमेरिकी प्रतिबंधों से पीछे हटने के बजाय ईरान ने कड़ा रुख अपनाया और अपनी संसद में एक नया कानून पास कर दिया। इसके बाद ईरान ने IAEA के निरीक्षकों को मिलने वाली सहूलियतों को धीरे-धीरे खत्म कर दिया।
- निगरानी कैमरे बंद: ईरान ने अपने संवेदनशील परमाणु केंद्रों पर लगे IAEA के दर्जनों लाइव कैमरों को बंद कर दिया और उनका डेटा अंतरराष्ट्रीय एजेंसी से साझा करना बंद कर दिया।
- ‘फ्लाइंग ब्लाइंड’ हुई IAEA: खुद IAEA के प्रमुख राफेल ग्रॉसी कई बार स्वीकार कर चुके हैं कि उनकी एजेंसी अब ईरान के मामले में ‘फ्लाइंग ब्लाइंड’ (बिना कुछ देखे अंधेरे में उड़ने जैसी) स्थिति में है। लाइव फुटेज और औचक निरीक्षण के बिना यह बताना नामुमकिन है कि बंद कमरों के पीछे क्या चल रहा है।
कहां छिपा है सेंट्रीफ्यूज और संवर्धित यूरेनियम का रहस्य?
पश्चिमी देशों और खुफिया एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द यह है कि उन्हें ईरान के एडवांस सेंट्रीफ्यूज और संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) के सटीक आंकड़ों की कोई जानकारी नहीं है।
- एडवांस सेंट्रीफ्यूज की तैनाती: अंतरराष्ट्रीय निगरानी हटने का फायदा उठाकर ईरान ने अपने भूमिगत बंकरों में बेहद आधुनिक और तेज गति से काम करने वाले सेंट्रीफ्यूज स्थापित कर लिए हैं।
- संवर्धन की सीमा पार: समझौते के तहत ईरान को केवल 3.67% तक ही यूरेनियम संवर्धित करने की अनुमति थी। लेकिन हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरान 60% या उससे अधिक शुद्धता तक यूरेनियम का संवर्धन कर चुका है। परमाणु बम बनाने के लिए 90% शुद्धता की आवश्यकता होती है, जिसके बेहद करीब ईरान पहुंच चुका है।
- लापता डेटा: कैमरों की रिकॉर्डिंग न मिलने के कारण किसी को नहीं पता कि ईरान ने अब तक कितना घातक यूरेनियम तैयार कर लिया है और उसे किन गुप्त ठिकानों में शिफ्ट कर दिया है।
क्या ईरान के पास आ गया है परमाणु बम?
इस कूटनीतिक अंधेरे ने अमेरिका और इजरायल की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इजरायल लगातार दावा कर रहा है कि ईरान किसी भी वक्त खुद को परमाणु संपन्न देश घोषित कर सकता है।
अब अमेरिका और पश्चिमी देशों के सामने दोहरी दुविधा है:
- सैन्य कार्रवाई का खतरा: यदि अमेरिका या इजरायल ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने के लिए सैन्य कदम उठाते हैं, तो यह सीधे एक बड़े क्षेत्रीय या न्यूक्लियर वॉर में बदल सकता है।
- चुप रहने का नुकसान: यदि पश्चिम हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है, तो ईरान बहुत जल्द परमाणु बम बनाने की तकनीकी क्षमता हासिल कर लेगा।
गतिरोध की मुख्य वजह: पश्चिमी देश चाहते हैं कि ईरान तुरंत IAEA के कैमरों को दोबारा चालू करे और निरीक्षकों को पूरी पहुंच दे। वहीं, ईरान की दो टूक शर्त है कि जब तक अमेरिका उस पर लगाए गए सभी आर्थिक प्रतिबंधों को पूरी तरह नहीं हटाता, तब तक वह निगरानी की खिड़की दोबारा नहीं खोलेगा।

