उच्च शिक्षा के प्रति सामाजिक उदासीनता- अभिभावकों की खामोशी

प्रोफेसर अशोक कुमार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा जगत में एक नई सुबह की उम्मीद लेकर आई है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर सामाजिक संगठनों के माध्यम से पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन उच्च शिक्षा का क्षेत्र आज एक गहरे संकट से जूझ रहा है। वर्तमान में उच्च शिक्षा की स्थिति स्कूलों की तुलना में कहीं अधिक चिंताजनक है। इसका मुख्य कारण शिक्षा का ‘व्यवसायीकरण’ है, जिसने औपचारिक शिक्षण संस्थानों को केवल ‘डिग्री बाँटने वाले केंद्रों’ में बदल दिया है और कोचिंग सेंटरों को असली शिक्षा का केंद्र बना दिया है।
डमी स्कूल और कोचिंग संस्कृति: एक समानांतर व्यवस्था
आज की सबसे बड़ी विडंबना ‘डमी स्कूल’ और ‘नॉन-अटेंडिंग’ कॉलेज हैं।
संस्थानों का खोखलापन: छात्र केवल कागज़ों पर स्कूल या कॉलेज में नामांकित होते हैं, जबकि उनका पूरा समय कोचिंग सेंटरों में बीतता है। इससे औपचारिक शिक्षण संस्थानों का शैक्षणिक वातावरण पूरी तरह नष्ट हो चुका है।
व्यक्तित्व विकास की बलि: स्कूल और कॉलेज केवल पढ़ाई के लिए ही नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार, नैतिकता, खेल और अनुशासन सीखने के केंद्र होते हैं। डमी संस्कृति के कारण छात्र इन जीवन-कौशलों से वंचित रह जाते हैं और केवल ‘रैंक’ लाने वाली मशीन बनकर रह जाते हैं।
अभिभावकों की भूमिका और संवादहीनता
उच्च शिक्षा के इस बिगाड़ में अभिभावकों का रवैया भी एक महत्वपूर्ण कारक है।
अभिभावकों की चुप्पी: अक्सर देखा जाता है कि स्कूल तक तो माता-पिता बच्चों की पढ़ाई में रुचि लेते हैं, लेकिन कॉलेज स्तर पर पहुँचते ही वे या तो बच्चों की बात कम सुनते हैं या हस्तक्षेप करना छोड़ देते हैं।
कोचिंग को प्राथमिकता: अभिभावक स्वयं बच्चों को नियमित कॉलेज भेजने के बजाय कोचिंग सेंटरों की भारी-भरकम फीस भरना अधिक उचित समझते हैं। उन्हें लगता है कि औपचारिक शिक्षा की डिग्री तो ‘जुगाड़’ से भी मिल जाएगी, जबकि असली मेहनत प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए करनी है।
विशेष खंड: कोचिंग हब का दबाव और मानसिक स्वास्थ्य का संकट
कोटा और जयपुर जैसे कोचिंग हब आज ‘सफलता की फैक्ट्रियां’ तो बन गए हैं, लेकिन यहाँ से आने वाली खबरें चिंताजनक हैं।
एकाकीपन और अवसाद: डमी स्कूलों के कारण छात्र अपने हमउम्र साथियों के साथ स्वस्थ सामाजिक वातावरण से कट जाते हैं। कोचिंग की 12–14 घंटे की पढ़ाई और तीव्र प्रतिस्पर्धा उन्हें मानसिक दबाव में डाल देती है, जहाँ केवल ‘नंबर’ ही मायने रखते हैं।
अभिभावकों की अवास्तविक अपेक्षाएँ: अभिभावक बच्चों को कोचिंग में भेजकर यह मान लेते हैं कि उनका चयन लगभग निश्चित है। यह उम्मीद बच्चों पर ‘प्रदर्शन के दबाव’ के रूप में भारी पड़ती है। जब छात्र इस दबाव को सहन नहीं कर पाते, तो वे गंभीर मानसिक संकट में पहुँच जाते हैं।
संवाद का अभाव: घर से दूर हॉस्टल में रह रहे छात्रों के पास अक्सर ऐसा कोई मंच नहीं होता, जहाँ वे अपनी भावनाएँ साझा कर सकें। औपचारिक स्कूलों में होने वाली खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियाँ तनाव कम करने में सहायक होती थीं, जो कोचिंग संस्कृति में लगभग समाप्त हो चुकी हैं।
औपचारिक शिक्षा की गुणवत्ता और अप्रासंगिकता
यह एक कड़वा सच है कि आज सरकारी और कई निजी विश्वविद्यालयों में औपचारिक शिक्षा की गुणवत्ता अत्यंत निम्न स्तर पर है।
अपडेटेड पाठ्यक्रम का अभाव: पाठ्यक्रमों का उद्योगों की मांग या प्रतियोगी परीक्षाओं के स्तर से तालमेल नहीं है।
मूल्यांकन पद्धति: कॉलेज की परीक्षाएँ मुख्यतः रटने की क्षमता को परखती हैं, जबकि प्रतियोगी परीक्षाएँ तार्किक और विश्लेषणात्मक सोच पर आधारित होती हैं। यही कारण है कि छात्र औपचारिक कक्षाओं को समय की बर्बादी मानने लगते हैं।
क्रांतिकारी समाधान: अंकों का एकीकरण और पात्रता परीक्षा
इस समस्या का एक प्रभावी समाधान एकीकृत मूल्यांकन प्रणाली हो सकता है।
प्राप्तांकों की अनिवार्यता: यदि प्रतियोगी परीक्षाओं के अंतिम चयन में स्कूल और कॉलेज के क्वालीफाइंग एग्जाम्स (जैसे 12वीं या स्नातक) के अंकों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए, तो छात्र और अभिभावक औपचारिक शिक्षा को गंभीरता से लेने लगेंगे।
कोचिंग पर निर्भरता में कमी: जब बोर्ड और स्नातक अंकों का महत्व बढ़ेगा, तो छात्र डमी स्कूलों के बजाय वास्तविक कक्षाओं की ओर लौटेंगे। इससे कोचिंग संस्थानों का एकाधिकार कम होगा और छात्रों पर ‘एक ही परीक्षा’ में सब कुछ दांव पर लगाने का दबाव भी घटेगा।
सामाजिक संस्थाओं और सरकार की जिम्मेदारी
उच्च शिक्षा में सुधार के लिए इसे एक सामाजिक आंदोलन का रूप देना होगा।
सामाजिक संगठनों की भूमिका: एनजीओ को अभिभावकों के साथ काउंसलिंग सत्र आयोजित करने चाहिए, ताकि वे डमी स्कूलों के खतरे और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को समझ सकें।
सरकारी नियंत्रण: सरकार को उन शिक्षण संस्थानों की मान्यता रद्द करनी चाहिए, जो केवल कागज़ों पर संचालित हो रहे हैं। साथ ही, कोचिंग संस्थानों के लिए कड़े नियामक कानून लागू करने की आवश्यकता है।
उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए त्रि-आयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। सरकार को नीतिगत बदलाव कर औपचारिक शिक्षा के अंकों को प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल करना चाहिए। अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद स्थापित कर उन्हें डमी संस्कृति से दूर रखते हुए सर्वांगीण विकास के लिए प्रेरित करना होगा।
जब औपचारिक शिक्षा का सम्मान पुनः स्थापित होगा, तभी देश को वास्तव में योग्य, मानसिक रूप से सशक्त और चरित्रवान नागरिक मिल पाएंगे।
(उच्च शिक्षा के प्रति सामाजिक उदासीनता- अभिभावकों की खामोशी)



