आखिर क्यों नहीं सुधर रही बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था? जानिए बड़ी वजहें

बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकार लगातार नए अस्पताल, मेडिकल कॉलेज और हेल्थ सेंटर खोलने का दावा कर रही है। स्वास्थ्य बजट में भी लगातार बढ़ोतरी की जा रही है, लेकिन इसके बावजूद राज्य की चिकित्सा व्यवस्था आम लोगों की उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतर पा रही है। ग्रामीण इलाकों में आज भी मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जबकि बड़ी आबादी झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर है। सवाल यह है कि आखिर इतनी कोशिशों के बावजूद बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था क्यों नहीं सुधर रही?
डॉक्टरों की भारी कमी सबसे बड़ी वजह
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या डॉक्टरों की कमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक के अनुसार प्रति 1,000 आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, लेकिन बिहार में एक डॉक्टर पर 17 हजार से 28 हजार लोगों की जिम्मेदारी है। सरकारी अस्पतालों में कई पद वर्षों से खाली पड़े हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात डॉक्टर अक्सर वहां काम करने से बचते हैं।
ग्रामीण अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव
राज्य सरकार ने कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) बनाए हैं, लेकिन इनमें पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। कई जगह इमारतें तो खड़ी हो गई हैं, लेकिन डॉक्टर, नर्स, लैब टेक्नीशियन और अन्य मेडिकल स्टाफ की कमी बनी हुई है। मरीजों को सामान्य जांच के लिए भी जिला मुख्यालय या बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।
झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर गांव
स्वास्थ्य सेवाओं की कमजोर पहुंच का सबसे बड़ा असर ग्रामीण इलाकों में दिखाई देता है। गांवों में बड़ी संख्या में लोग झोलाछाप डॉक्टरों से इलाज कराने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और शहरों में इलाज का बढ़ता खर्च लोगों को ऐसे चिकित्सकों के पास जाने के लिए मजबूर करता है।
हालांकि कई मामलों में ये लोग प्राथमिक उपचार देकर राहत पहुंचाते हैं, लेकिन गंभीर बीमारियों में सही इलाज न मिलने से मरीजों की जान तक चली जाती है।
मशीनें हैं, लेकिन उन्हें चलाने वाले नहीं
स्वास्थ्य क्षेत्र में बुनियादी ढांचे पर निवेश तो हुआ है, लेकिन संसाधनों का संतुलन नहीं बन पाया है। कई अस्पतालों में एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड और अन्य आधुनिक मशीनें मौजूद हैं, लेकिन उन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त तकनीकी स्टाफ नहीं है। नतीजा यह है कि करोड़ों रुपये की मशीनें होने के बावजूद मरीजों को निजी केंद्रों पर जाना पड़ता है।
दवाओं और जांच सुविधाओं की समस्या
सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवा और जांच की योजनाएं चल रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई अस्पतालों में दवाओं की कमी और जांच सुविधाओं का अभाव देखने को मिलता है। मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं, जिससे गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।
डॉक्टर गांवों में क्यों नहीं जाना चाहते?
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी डॉक्टरों की तैनाती में बड़ी बाधा है। बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा, आवास और बेहतर जीवन सुविधाओं के अभाव में कई डॉक्टर गांवों में रहकर सेवा देने से बचते हैं। इसके अलावा अस्पतालों में हिंसा और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी एक बड़ा कारण हैं।
सरकार के प्रयास और चुनौतियां
बिहार सरकार ने स्वास्थ्य बजट बढ़ाकर 21,270 करोड़ रुपये कर दिया है। राज्य में 3,200 नए हेल्थ सेंटर खोलने की योजना पर काम चल रहा है। मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई जा रही है और डॉक्टरों व स्वास्थ्य कर्मियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमीट्रिक सिस्टम लागू किया गया है। सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर भी रोक लगाई गई है।
लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सख्ती और नए भवन बनाने से हालात नहीं बदलेंगे। जब तक डॉक्टरों, नर्सों, तकनीकी कर्मचारियों और दवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक स्वास्थ्य सेवाओं में अपेक्षित सुधार मुश्किल है।
निष्कर्ष
बिहार की चिकित्सा व्यवस्था की चुनौतियां केवल संसाधनों की कमी तक सीमित नहीं हैं। डॉक्टरों की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर स्वास्थ्य ढांचा, तकनीकी स्टाफ का अभाव, दवाओं की अनियमित उपलब्धता और झोलाछाप चिकित्सकों पर निर्भरता जैसे कई कारण मिलकर इस समस्या को जटिल बनाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बुनियादी ढांचे के साथ-साथ मानव संसाधन और सेवा गुणवत्ता पर समान रूप से ध्यान देना होगा, तभी बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर बदल सकेगी।



