दीक्षांत समारोह में पूर्व कुलपतियों की उपस्थिति


प्रो. अशोक कुमार
विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह में पूर्व कुलपतियों की उपस्थिति, आमंत्रण और उनकी अनुपस्थिति एक ऐसा विषय है जो केवल औपचारिकता या शिष्टाचार तक सीमित नहीं है। यह विश्वविद्यालयों की आंतरिक राजनीति, सत्ता के हस्तांतरण, व्यक्तिगत अहंकार, और अकादमिक संस्कृति के गहरे अंतर्विरोधों को दर्शाता है।
अक्सर यह देखा गया है कि दीक्षांत समारोहों में या तो पूर्व कुलपतियों को वरीयता क्रम में वह स्थान नहीं मिलता जिसके वे हकदार हैं, या फिर आमंत्रण मिलने के बावजूद वे खुद को इन समारोहों से दूर रखते हैं। इसके पीछे कोई एक एकल कारण नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक, मनोवैज्ञानिक, राजनीतिक और अकादमिक कारणों का एक जटिल मिश्रण है।
दीक्षांत समारोह मे ‘वर्तमान’ बनाम ‘भूतपूर्व’ कुलपति की उपस्थिति, पूरी तरह से एक आधिकारिक और कड़े प्रोटोकॉल से बंधा हुआ आयोजन होता है। इसमें कुलाधिपति आमतौर पर राज्य के राज्यपाल या देश के राष्ट्रपति होते हैं , मुख्य अतिथि और वर्तमान कुलपति केंद्र बिंदु होते हैं।
सरकारी और विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार, प्रोटोकॉल हमेशा पद पर बैठे व्यक्ति को प्राथमिकता देता है, न कि पूर्व में उस पद पर रहे व्यक्ति को। दीक्षांत समारोह के मंच पर स्थान बेहद सीमित होता है। वहाँ केवल कुलाधिपति, मुख्य अतिथि, वर्तमान कुलपति, रजिस्ट्रार और डीन को ही जगह मिलती है। पूर्व कुलपतियों को आम तौर पर सामने की दीर्घा में पहली या दूसरी पंक्ति में जगह दी जाती है। कई पूर्व कुलपतियों के लिए, जिन्होंने कभी उस पूरे समारोह की कमान संभाली थी, मंच के नीचे बैठना उनके आत्मसम्मान या अहंकार को ठेस पहुँचाता है।
जब एक नया कुलपति आता है, तो विश्वविद्यालय का पूरा प्रशासनिक अमला (रजिस्ट्रार, प्रॉक्टर, क्लर्क) नए बॉस को खुश करने में लग जाता है। ऐसे में पूर्व कुलपतियों को औपचारिक निमंत्रण पत्र तो भेज दिया जाता है, लेकिन जो व्यक्तिगत आदर या विशेष अनुवर्ती कॉल मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। इसे पूर्व कुलपति अपना अपमान समझते हैं और गरिमा बनाए रखने के लिए समारोह में नहीं आते।
भारत और कई अन्य देशों में विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति एक बेहद राजनीतिक प्रक्रिया बन चुकी है। सरकार बदलने के साथ ही विश्वविद्यालयों के शीर्ष नेतृत्व की विचारधारा भी बदल जाती है।यदि किसी पूर्व कुलपति की नियुक्ति किसी एक राजनीतिक दल की सरकार के दौरान हुई थी और वर्तमान कुलपति की नियुक्ति दूसरी विचारधारा वाली सरकार ने की है, तो दोनों के बीच एक अदृश्य दूरी बन जाती है। वर्तमान प्रशासन पूर्व कुलपति को आमंत्रित करने में हिचकिचाता है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी उपस्थिति से एक अलग राजनीतिक संदेश जा सकता है।
विश्वविद्यालयों के भीतर प्रोफेसरों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के अपने-अपने गुट होते हैं। कई बार पूर्व कुलपति का गुट वर्तमान कुलपति के काम में बाधा पहुँचाने की कोशिश करता है। ऐसे माहौल में, वर्तमान कुलपति कभी नहीं चाहेंगे कि उनका पूर्ववर्ती दीक्षांत समारोह जैसे बड़े मंच पर आकर लाइमलाइट बटोरे या कैंपस के भीतर अपने समर्थकों को दोबारा सक्रिय करे।
दीक्षांत समारोह में अक्सर मुख्यमंत्री, मंत्री या राज्यपाल आते हैं। यदि पूर्व कुलपति किसी विपक्षी दल के करीबी रहे हैं, तो उनकी उपस्थिति से एक असहज स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए, रणनीतिक रूप से उन्हें किनारे कर दिया जाता है।
कार्यकाल का प्रभाव: ‘बहुत अच्छा’ बनाम ‘बहुत खराब’ कार्यकाल ! कार्यकाल का बहुत अच्छा या बहुत खराब होना इसका कारण हो सकता है? दोनों ही स्थितियाँ अनुपस्थिति या आमंत्रण न मिलने का कारण बनती हैं।
कार्यकाल का ‘बहुत अच्छा’ होना (ईर्ष्या और असुरक्षा की भावना) यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन यदि किसी पूर्व कुलपति का कार्यकाल अभूतपूर्व रहा हो—उन्होंने बुनियादी ढांचे का विकास किया हो, शोध में विश्वविद्यालय को ऊंचाइयों पर पहुँचाया हो, और वे छात्रों व शिक्षकों के बीच बेहद लोकप्रिय रहे हों—तो यह वर्तमान कुलपति के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। वर्तमान कुलपति को लगता है कि यदि पूर्व कुलपति समारोह में आएंगे, तो पूरा परिसर उन्हीं की तारीफ करेगा और उनकी तुलना पूर्व कुलपति से की जाएगी। कोई भी मौजूदा प्रशासनिक प्रमुख यह नहीं चाहता कि उसके कार्यक्रम में कोई दूसरा व्यक्ति आकर्षण का केंद्र बने। जब पूर्व कुलपति दीक्षांत समारोह में आते हैं, तो अनौपचारिक बातचीत में लोग उनके समय के ‘स्वर्ण काल’ को याद करने लगते हैं, जिससे वर्तमान प्रशासन असहज महसूस करता है।
यदि किसी पूर्व कुलपति का कार्यकाल भ्रष्टाचार के आरोपों, छात्र आंदोलनों, अकादमिक गिरावट या मुकदमों से घिरा रहा हो, तो परिस्थितियाँ पूरी तरह उलट जाती हैं। वर्तमान प्रशासन ऐसे विवादास्पद पूर्व प्रमुखों से दूरी बनाना चाहता है ताकि विश्वविद्यालय की छवि पर कोई आंच न आए।
अगर कोई विवादास्पद पूर्व कुलपति समारोह में आता है, तो छात्र संगठन या शिक्षक संघ दीक्षांत समारोह के पवित्र और शांत माहौल में हंगामा या विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। इस कानून-व्यवस्था की स्थिति से बचने के लिए उन्हें आमंत्रित ही नहीं किया जाता, और यदि किया भी जाए, तो वे खुद किसी भी अप्रिय स्थिति या हूटिंग से बचने के लिए आने से मना कर देते हैं।
पद से हटने के बाद का मनोवैज्ञानिक बदलाव एक बहुत बड़ा कारक है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। कुलपति का पद अत्यंत शक्तिशाली होता है। जब तक व्यक्ति पद पर रहता है, उसके आगे-पीछे गाड़ियाँ, सुरक्षाकर्मी और आदेशों का पालन करने वाले सैकड़ों लोग होते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद, अचानक उस चकाचौंध का खत्म हो जाना मानसिक रूप से स्वीकार करना कठिन होता है। दीक्षांत समारोह में आकर अपनी ही पूर्व सल्तनत में एक सामान्य अतिथि की तरह बैठना कई पूर्व कुलपतियों के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से कष्टदायक होता है।
अक्सर नए कुलपति आते ही पूर्ववर्ती की नीतियों, योजनाओं और नियुक्तियों को बदलना या रद्द करना शुरू कर देते हैं। जब एक पूर्व कुलपति देखता है कि उसके द्वारा बनाए गए विभागों या शुरू किए गए कोर्सेस को बंद किया जा रहा है, तो संस्था के प्रति उसका मोहभंग हो जाता है। वे ऐसी जगह जाना पसंद नहीं करते जहाँ उनके काम का सम्मान न बचा हो।
पुराने समय में विश्वविद्यालयों में ‘अकादमिक गुरुओं’ के प्रति एक शाश्वत सम्मान की भावना होती थी। कुलपति भले ही बदल जाए, लेकिन पूर्व प्रमुखों को मार्गदर्शक माना जाता था। आज की उपभोक्तावादी और अत्यधिक प्रशासनिक अकादमिक संस्कृति में यह परंपराएं दम तोड़ रही हैं।
आज के विश्वविद्यालयों का प्रशासन अक्सर कॉर्पोरेट संस्कृति की तरह काम करता है। यहाँ ‘जो पद पर है, वही उपयोगी है’ की नीति चलती है। पूर्व कुलपतियों के पास अब कोई प्रशासनिक शक्ति या बजट स्वीकृत करने का अधिकार नहीं होता, इसलिए विश्वविद्यालय का निचला स्टाफ भी उनके प्रति उदासीन हो जाता है।
निष्कर्ष और सुधारात्मक दृष्टिकोण
संक्षेप में कहें तो, विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह में पूर्व कुलपतियों का सर्वप्रथम आमंत्रित न किया जाना या उनका न आना प्रशासनिक प्रोटोकॉल की मजबूरी, वर्तमान नेतृत्व की असुरक्षा, राजनीतिक विचारधाराओं के टकराव और व्यक्तिगत आत्मसम्मान के आहत होने का परिणाम है। कार्यकाल का बहुत अच्छा होना वर्तमान कुलपति में ईर्ष्या जगाता है, और बहुत खराब होना संस्था के लिए बदनामी का कारण बनता है—दोनों ही सूरतों में दूरी बना ली जाती है।
क्या इसे बदला जा सकता है?
एक स्वस्थ अकादमिक वातावरण के लिए इस संस्कृति को बदलना जरूरी है। विश्वविद्यालयों को चाहिए कि वे: दीक्षांत समारोह में पूर्व कुलपतियों के लिए एक विशेष ‘सलाहकार दीर्घा’ या सम्मानजनक स्थान आरक्षित करें। दीक्षांत स्मारिका में पूर्व प्रमुखों के योगदान का संक्षिप्त उल्लेख करें।
केवल एक सरकारी पत्र भेजने के बजाय, वर्तमान कुलपति स्वयं या रजिस्ट्रार के माध्यम से उन्हें फोन पर व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करें।
जब तक संस्थाएं अपने अतीत का सम्मान करना नहीं सीखेंगी, तब तक वे भविष्य के छात्रों को नैतिक मूल्य और कृतज्ञता का पाठ नहीं पढ़ा पाएंगी। दीक्षांत समारोह केवल उपाधि बांटने का मंच नहीं, बल्कि संस्थागत निरंतरता और सम्मान का प्रतीक होना चाहिए।
(लेखक पूर्व कुलपति कानपुर , गोरखपुर विश्वविद्यालय , विभागाध्यक्ष राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर रहे हैं)



