E20 Petrol Controversy: क्या E25 ब्लेंडिंग पर यू-टर्न लेगी सरकार? जानिए माइलेज और इंजन का सच

जुबिली स्पेशल डेस्क
नई दिल्ली। देश में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग वाले E20 पेट्रोल को लागू करने की रफ्तार जितनी तेज है, इसे लेकर विरोध की आंच भी उतनी ही सुलग रही है। अब तक यह विवाद सिर्फ आम कार और बाइक मालिकों तक सीमित था, लेकिन अब देश की लाइफलाइन यानी ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री (Transport Sector) ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
‘ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन’ ने E20 ईंधन की नीति पर गंभीर तकनीकी और आर्थिक सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रांसपोर्टर्स का साफ कहना है कि करोड़ों रुपये के कमर्शियल वाहनों को सरकार की किसी नई नीति का ‘प्रायोगिक चूहा’ (Experimental Ground) नहीं बनाया जा सकता।
छोटे ट्रांसपोर्टर्स की रीढ़ तोड़ेगा E20? एसोसिएशन का दावा
एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र कपूर का कहना है कि देश में लाखों छोटे और मध्यम ट्रांसपोर्टर बैंक से लोन लेकर ट्रक और लाइट कमर्शियल व्हीकल (LCV) चला रहे हैं। ऐसे में E20 ईंधन उनके बिजनेस मॉडल को पूरी तरह तबाह कर सकता है। इसके पीछे दो मुख्य तर्क दिए गए हैं:
1. माइलेज में 2% से 6% की गिरावट (परिवहन लागत में भारी उछाल)
विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों के हवाले से दावा किया गया है कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहनों का माइलेज 2 से 6 फीसदी तक कम हो जाता है। आम आदमी के लिए यह आंकड़ा छोटा हो सकता है, लेकिन रोजाना सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करने वाले भारी वाहनों के लिए यह हर महीने हजारों-लाखों रुपये का अतिरिक्त डीजल-पेट्रोल खर्च बन जाएगा।
2. पुरानी गाड़ियों के इंजन पर ‘खतरे की घंटी’
सबसे बड़ी चिंता 8 से 15 साल पुराने कमर्शियल वाहनों को लेकर है। ये गाड़ियाँ E20 ईंधन के अनुकूल (Compatible) नहीं हैं। इथेनॉल के कारण इनके फ्यूल पाइप, रबर सील, गैस्केट और फ्यूल पंप जल्दी खराब होने का खतरा है।
सरकार के सामने दागे गए 4 बड़े सवाल (जवाबदेही किसकी?)
ट्रांसपोर्ट संगठनों ने केंद्र सरकार के सामने चार बेहद कड़े सवाल रखे हैं और मांग की है कि नीति को आगे बढ़ाने से पहले इनका स्पष्ट जवाब दिया जाए:
- सुरक्षा का सर्टिफिकेट कहाँ है? क्या देश में चल रहे सभी कमर्शियल वाहन E20 ईंधन के लिए पूरी तरह सुरक्षित और प्रमाणित हैं?
- पुराने वाहनों पर स्टडी कहाँ है? क्या सरकार के पास ऐसा कोई सार्वजनिक वैज्ञानिक डेटा है, जो 8-15 साल पुराने वाहनों पर E20 के सुरक्षित इस्तेमाल की गारंटी देता हो?
- नुकसान की भरपाई कौन करेगा? यदि E20 के कारण इंजन या फ्यूल सिस्टम में खराबी आती है, तो उसकी वित्तीय जिम्मेदारी किसकी होगी—वाहन निर्माता की, तेल कंपनियों की या सरकार की?
- महंगाई का बोझ कौन उठाएगा? माइलेज घटने से जो मालभाड़ा (Freight Rate) बढ़ेगा, उसका अंतिम बोझ ट्रांसपोर्टर, व्यापारी या आम उपभोक्ता में से किस पर डाला जाएगा?
IIT विशेषज्ञों की समिति और ‘क्षतिपूर्ति नीति’ की मांग
ट्रांसपोर्टर्स ने साफ किया है कि वे पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने के सरकारी कदम के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह सब ट्रांसपोर्ट उद्योग की बली देकर नहीं होना चाहिए। उन्होंने सरकार से दो बड़ी मांगें की हैं:
- हाई-लेवल जॉइंट कमेटी: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT), ऑटोमोबाइल कंपनियों, तेल कंपनियों और ट्रांसपोर्ट संगठनों के प्रतिनिधियों को मिलाकर एक उच्चस्तरीय समिति बने, जो भारतीय परिस्थितियों में E20 के असर का पारदर्शी अध्ययन करे।
- कंपनसेशन पॉलिसी (Compensation Policy): यदि E20 ईंधन के कारण किसी भी गाड़ी को तकनीकी या आर्थिक नुकसान होता है, तो प्रभावित वाहन मालिकों के लिए सरकार एक पारदर्शी मुआवजा नीति घोषित करे।
यह सिर्फ ईंधन नहीं, पूरी अर्थव्यवस्था का मामला है
ट्रांसपोर्ट सेक्टर का मानना है कि यह मामला केवल पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने तक सीमित नहीं है। सप्लाई चेन (Supply Chain) और मालभाड़ा सीधे तौर पर देश की जीडीपी और आम आदमी की रसोई के बजट से जुड़ा है। यदि सरकार ने समय रहते वैज्ञानिक पारदर्शिता, आर्थिक सुरक्षा और स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं की, तो E20 का यह विवाद देश की आर्थिक रफ्तार को धीमा कर सकता है।


