क्या अमेरिका-ईरान संघर्ष में डोनाल्ड ट्रंप हार गए? जानिए युद्ध के बाद क्या कहते हैं विशेषज्ञ

अमेरिका-ईरान संघर्ष और युद्धविराम के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप हार गए? जानिए सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर किसकी रही बढ़त।

अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सैन्य टकराव और उसके बाद हुए युद्धविराम ने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस संघर्ष में अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump को हार का सामना करना पड़ा या फिर उन्होंने अपने उद्देश्यों को हासिल कर लिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस संघर्ष का परिणाम इतना सीधा नहीं है कि इसे केवल जीत या हार की श्रेणी में रखा जा सके। हालांकि कई विश्लेषक मानते हैं कि ट्रंप को कुछ महत्वपूर्ण मोर्चों पर सफलता मिली, लेकिन उन्हें अपनी कई शुरुआती मांगों में नरमी भी दिखानी पड़ी।

संघर्ष के दौरान अमेरिका ने अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया और ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश की। अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान को कई रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इससे ट्रंप प्रशासन को यह दावा करने का मौका मिला कि उसने ईरान को बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर किया।

विश्लेषकों के अनुसार, सैन्य दृष्टि से अमेरिका की स्थिति मजबूत रही और वह अपने विरोधी पर दबाव बनाने में सफल रहा।

यहीं से बहस शुरू होती है। संघर्ष की शुरुआत में अमेरिका की मांग थी कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों पर व्यापक प्रतिबंध स्वीकार करे। लेकिन अंतिम समझौते में कई मुद्दों पर बातचीत का रास्ता खुला रहा और ईरान पूरी तरह अमेरिकी शर्तों के सामने झुकता नहीं दिखा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि किसी युद्ध के बाद विरोधी देश अपनी सभी प्रमुख नीतियां बदल दे, तभी उसे निर्णायक जीत माना जाता है। ईरान के मामले में ऐसा नहीं हुआ।

ट्रंप के विरोधियों का तर्क है कि अमेरिका ने सैन्य दबाव तो बनाया, लेकिन उसे अंततः बातचीत और समझौते का रास्ता अपनाना पड़ा। उनका कहना है कि यदि युद्ध के बाद भी ईरान की राजनीतिक व्यवस्था और उसकी कई रणनीतिक नीतियां बरकरार हैं, तो इसे अमेरिका की पूर्ण जीत नहीं कहा जा सकता।

आलोचकों का यह भी कहना है कि संघर्ष के दौरान बढ़ी तेल कीमतों और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता ने अमेरिका समेत कई देशों पर दबाव बनाया।

वहीं ट्रंप समर्थक इसे उनकी बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि बता रहे हैं। उनका तर्क है कि अमेरिका बिना लंबे और महंगे युद्ध में उलझे अपने प्रतिद्वंद्वी को बातचीत की मेज तक लाने में सफल रहा। साथ ही क्षेत्रीय तनाव कम होने और तेल बाजार में स्थिरता लौटने को भी वे ट्रंप प्रशासन की सफलता मानते हैं।

इस संघर्ष का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहा। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया, जिसका असर भारत समेत कई तेल आयातक देशों पर पड़ा। वैश्विक बाजारों में भी अनिश्चितता देखने को मिली।

हालांकि युद्धविराम और समझौते के बाद बाजारों में कुछ राहत देखने को मिली है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका-ईरान संघर्ष को डोनाल्ड ट्रंप की स्पष्ट हार कहना सही नहीं होगा। वहीं इसे उनकी पूर्ण जीत भी नहीं माना जा सकता। सैन्य स्तर पर अमेरिका मजबूत रहा, लेकिन राजनीतिक और कूटनीतिक मोर्चे पर उसे समझौते का रास्ता अपनाना पड़ा।

यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इस पूरे घटनाक्रम को “आंशिक जीत और आंशिक समझौते” के रूप में देख रहे हैं। इसलिए फिलहाल यह कहना ज्यादा उचित होगा कि ट्रंप इस संघर्ष में न तो पूरी तरह हारे और न ही निर्णायक रूप से जीते।

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