Thursday - 29 October 2020 - 2:22 AM

पूर्वोत्तर में फिर उठी हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने की मांग

जुबिली न्यूज डेस्क

पूर्वोत्तर भारत में एक बार फिर हिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने की मांग की गई है। हालांकि इस मांग पर बहस भी छिड़ गई है। कुछ लोग इसे एक सही कदम मानते हैं तो कुछ का कहना है कि पूरे देश में हिंदुओं की आबादी सबसे ज्यादा है। ऐसे में उनको अल्पसंख्यक के दर्जे या सरकारी संरक्षण की जरूरत नहीं हैं।

असम के गुवाहाटी हाईकोर्ट में पंकज डेका ने और मेघालय हाईकोर्ट में डेलिना खांग्डुप ने जनहित याचिका दायर किया है जिसमें हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की गई है।

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दोनों याचिकाओं में 23 अक्टूबर, 1993 को जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है जिसमें मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी और जैन समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित किया गया था।

दायर याचिका में कहा गया है कि पूर्वोत्तर भारत में ईसाई समुदाय के लोगों की बहुलता के बावजूद उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा मिला है। याचिका में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रीय आधार पर नहीं बल्कि इलाके के विभिन्न राज्यों में आबादी के आधार पर अल्पसंख्यक श्रेणी में शामिल समुदाय के बारे में फैसला किया जाना चाहिए।

अब निगाहें इन याचिकाओं पर होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। पूर्वोत्तर की मौजूदा सामाजिक परिस्थिति के संदर्भ में अदालत का फैसला बेहद अहम साबित हो सकता है।

मांग के पीछे का क्या है तर्क

उच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं में टीएमए पाई और अन्य बनाम कर्नाटक सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि मिजोरम, नागालैंड और मेघालय ईसाई-बहुल राज्य हैं। असम को छोड़कर बाकी राज्यों में भी ईसाईयों की संख्या अधिक है। वहां हिंदु अल्पसंख्यक हैं, लेकिन उनको यह दर्जा नहीं मिला है।

उनका कहना है कि हिंदुओं को की संख्या कम है। उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं मिला है इसलिए वे लोग अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जाने वाली सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते। दूसरी ओर, बहुसंख्यक आबादी वाली जातियों को ऐसे तमाम फायदे मिल रहे हैं।

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पहले भी उठ चुका है यह मामला

पूर्वोत्तर समेत कुछ राज्यों राज्यों के हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग पहले भी उठा चुका है। इसी साल फरवरी में पेशे से एडवोकेट और बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन अदालत ने इस पर सुनवाई से इनकार करते हुए उनसे हाईकोर्ट में जाने को कहा था।

साल 2017 में भी अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में यह मामला उठाया था। उस समय कोर्ट ने उनको राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के समक्ष यह मुद्दा उठाने की सलाह दी थी, लेकिन आयोग ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया। इसी वजह से याचिकाकर्ता ने दोबारा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

याचिकाकर्ता की दलील थी कि देश के नौ राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं और उनको वहां अल्पसंख्यकों के लिए तय कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। वहां की बहुसंख्यक आबादी सारे लाभ ले लेती है।

उपाध्याय ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि लद्दाख में हिंदू आबादी महज एक प्रतिशत है। इसी तरह मिजोरम में 2.75 प्रतिशत, लक्ष्यदीप में 2.77 प्रतिशत, कश्मीर में चार प्रतिशत, नागालैंड में 8.74 प्रतिशत, मेघालय में 11.53 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 29.24 प्रतिशत, पंजाब में 38.49 और मणिपुर में 41.29 प्रतिशत हिंदू आबादी है। इसके बावजूद सरकारी योजनाओं को लागू करते समय इस समुदाय को अल्पसंख्यकों के लिए तय कोई लाभ नहीं मिलता।

उन्होंने भी अपनी याचिका में 2002 के टीएमए पाई बनाम कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया था। उनकी दलील थी कि जिस तरह पूरे देश में अल्पसंख्यकों को चर्च की ओर से संचालित स्कूल या मदरसा खोलने की अनुमति मिली है वैसी इजाजत हिंदुओं को भी उक्त नौ राज्यों में मिलनी चाहिए। साथ ही इन स्कूलों को विशेष सरकारी संरक्षण मिलना चाहिए।

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क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने

इन याचिकाओं में शीर्ष अदालत के जिस फैसले का हवाला दिया गया है उसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि राज्यों में आबादी के आधार पर ही भाषाई अल्पसंख्यकों के बारे में फैसला किया जाना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि किसी इलाके में जो लोग संख्या में कम हैं उन्हें संविधान के अनुच्छेद 30 (1) के तहत अपने धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए स्कूल और कॉलेज खोलने का अधिकार है। याचिकाओं में कहा गया है कि धार्मिक आधार पर भी अल्पसंख्यकों के बारे में फैसला राज्यों की आबादी के आधार पर ही किया जाना चाहिए। आबादी के राष्ट्रीय औसत के आधार पर नहीं।

जानकारों का क्या है कहना ?

हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग में दायर याचिकाओं पर अब तक मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई है। समाजशास्त्री
डॉ.अभिषेक रंजन कहते हैं, ” टीएमए पाई बनाम कर्नाटक सरकार के मामले को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ताओं की यह मांग जायज है। इससे इलाके में तेजी से सिमट रही हिंदू आबादी का अस्तित्व बचाने में सहायता मिलेगी।” लेकिन एक अन्य समाजशास्त्री डॉ. अनुपमा सिंह कहती हैं- “पूर्वोत्तर राज्यों की तुलना देश के बाकी राज्यों से करना उचित नहीं है। ऐसा कोई भी फैसला करते वक्त इलाके की आबादी, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने को ध्यान में रखना होगा।”

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