देश पर फिर मंडराया संकट! तेल के बाद अब रसोई गैस सप्लाई पर खतरा, बढ़ सकती है टेंशन

नई दिल्ली: खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने और युद्धविराम की खबरों के बाद उम्मीद थी कि वैश्विक तेल बाजार में हालात सामान्य हो जाएंगे। लेकिन अब एक नई चुनौती सामने आ गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) से जहाजों की आवाजाही भले ही दोबारा शुरू हो गई हो, लेकिन तेल ढोने वाले जहाजों की भारी कमी ने पूरी सप्लाई चेन को प्रभावित कर दिया है।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि भारत आने वाले एक बड़े कच्चे तेल के टैंकर का किराया सामान्य दर से करीब 9 गुना अधिक तय किया गया है। इसे वर्ष 2026 की सबसे महंगी शिपिंग डील माना जा रहा है।
रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा तेल टैंकर का किराया
दक्षिण कोरिया की शिपिंग कंपनी सिनोकोर ने फारस की खाड़ी से भारत तक कच्चा तेल लाने के लिए एक विशाल तेल टैंकर बुक किया है। इस जहाज की क्षमता करीब 20 लाख बैरल कच्चा तेल ढोने की है।
शिपिंग उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार इस बुकिंग का किराया सामान्य दरों की तुलना में लगभग नौ गुना अधिक है। यह संकेत देता है कि क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति बेहतर होने के बावजूद समुद्री परिवहन व्यवस्था अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।
कैसे तय होता है तेल टैंकर का किराया?
अधिकांश लोगों को लगता है कि जहाजों का किराया सीधे डॉलर में तय होता है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। वैश्विक शिपिंग उद्योग में एक मानक प्रणाली लागू होती है, जिसमें हर समुद्री मार्ग के लिए एक बेस रेट तय किया जाता है।
इसके बाद मांग और उपलब्धता के आधार पर उसी बेस रेट पर प्रतिशत के रूप में किराया तय किया जाता है। मौजूदा हालात में तेल कंपनियों को एक खेप तेल लाने के लिए सामान्य से कई गुना अधिक भुगतान करना पड़ रहा है।
मार्च 2026 में शुरू हुआ था संकट
विश्लेषकों के अनुसार मौजूदा संकट की जड़ें मार्च 2026 में शुरू हुए अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़े तनाव में हैं। उस दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई थी।
दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। तनाव के चरम पर पहुंचने के दौरान कई जहाजों ने इस मार्ग से दूरी बना ली थी।
परिणामस्वरूप:
- तेल टैंकरों का दैनिक किराया रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
- बीमा कंपनियों ने जोखिम बढ़ने के कारण कवरेज सीमित कर दिया।
- कई जहाजों ने वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
तनाव कम हुआ, लेकिन जहाजों की कमी बढ़ गई
जून 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद स्थिति में सुधार आया और तेल कंपनियों ने फिर से खाड़ी क्षेत्र से आयात बढ़ाना शुरू किया।
हालांकि अब नई समस्या यह है कि तेल तो उपलब्ध है, लेकिन उसे ढोने के लिए पर्याप्त जहाज नहीं हैं।
संकट के महीनों में कई टैंकर दुनिया के अन्य क्षेत्रों में भेज दिए गए थे। अब उनकी वापसी में समय लग रहा है। नतीजतन मांग तेजी से बढ़ी है जबकि उपलब्ध जहाजों की संख्या सीमित है।
यही वजह है कि तेल कंपनियां जहाजों की बुकिंग के लिए अधिक कीमत चुकाने को मजबूर हैं।
भारत ने पहले ही बदल ली थी रणनीति
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। खासकर एलपीजी की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है।
संभावित जोखिम को देखते हुए भारत ने पिछले कुछ महीनों में अपने आयात स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई।
रूस बना सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता
जून 2026 में रूस से भारत का तेल आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। आंकड़ों के अनुसार:
- रूस से करीब 26 लाख बैरल प्रतिदिन तेल आयात हुआ।
- भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 53 प्रतिशत से अधिक रही।
- इसके अलावा उत्तरी अमेरिका और वेनेजुएला से भी खरीद बढ़ाई गई।
इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम करना है।
भारतीय जहाज सुरक्षित पहुंचे
सरकार के लिए राहत की बात यह रही कि भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकी।
हाल के दिनों में 94 भारतीय नाविकों और लाखों टन कच्चे तेल को लेकर चल रहे कई भारतीय जहाज सुरक्षित रूप से होर्मुज मार्ग पार कर चुके हैं। इससे भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर तत्काल खतरा नहीं दिख रहा है।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस संकट का असर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर पड़ेगा?
फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखने को मिल रही है। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 73 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। इसलिए तत्काल तौर पर ईंधन की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी की आशंका कम है।
हालांकि यदि जहाजों की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो:
- तेल आयात लागत बढ़ सकती है।
- सरकारी तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।
- भारत का आयात बिल ऊंचा रह सकता है।
- रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
- भविष्य में ईंधन कीमतों पर असर पड़ सकता है।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कुछ हफ्तों में यदि अधिक टैंकर दोबारा खाड़ी क्षेत्र में लौटते हैं तो शिपिंग दरें सामान्य हो सकती हैं। लेकिन तब तक भारत समेत दुनिया के कई बड़े तेल आयातक देशों को ऊंची ढुलाई लागत का सामना करना पड़ सकता है।
यानी खाड़ी क्षेत्र में युद्ध का खतरा भले कम हो गया हो, लेकिन होर्मुज संकट अब एक नए आर्थिक रूप में सामने आ चुका है और इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई दे रहा है।



