किताबों पर बैन, फतवा और 20 साल का वनवास… बंगाल में सत्ता बदलते ही कैसे मुमकिन हुई तसलीमा नसरीन की ‘घरवापसी’?

कोलकाता . भारत और बांग्लादेश के साहित्यिक-राजनैतिक इतिहास की सबसे विवादित और चर्चित लेखिकाओं में शुमार तसलीमा नसरीन पूरे दो दशक बाद एक बार फिर कोलकाता की धरती पर कदम रखने जा रही हैं। पश्चिम बंगाल में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन (बीजेपी सरकार के गठन) के बाद इसे वैचारिक और राजनैतिक गलियारों में एक बहुत बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

तसलीमा नसरीन ने खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर इस बात की पुष्टि की है कि वे 1 अगस्त को कोलकाता में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में भाग लेने पहुंच रही हैं।

तसलीमा नसरीन कोलकाता के रवींद्र सदन में कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज बुलंद करती नजर आएंगी:

  • आयोजक: यह ऐतिहासिक कार्यक्रम ‘धर्मनिरपेक्ष मिशन’ और ‘मानवाधिकार एवं बांग्लादेश स्वतंत्रता सेनानी फाउंडेशन’ की ओर से संयुक्त रूप से आयोजित किया जा रहा है।
  • उद्देश्य: इस मंच पर देश-विदेश के कई कट्टरपंथ विरोधी कवि और लेखक जुट रहे हैं, जहाँ तसलीमा को अभिव्यक्ति की आजादी के लिए उनके लंबे संघर्ष के लिए सम्मानित भी किया जाएगा।

तसलीमा नसरीन का कोलकाता से हमेशा एक गहरा भावनात्मक रिश्ता रहा है और वे इसे अपने दिल के सबसे करीब का शहर बताती हैं, लेकिन राजनीति ने उन्हें इस शहर से दूर कर दिया था:

  • 2007 का वो खूनी बवाल: साल 2004 से 2007 तक तसलीमा कोलकाता में ही रह रही थीं। इसी दौरान उनकी किताब ‘द्विखंडितो’ को लेकर तत्कालीन वामपंथी (Left) सरकार ने बंगाल में प्रतिबंध लगा दिया था। साल 2007 में उनके खिलाफ कट्टरपंथियों ने हिंसक प्रदर्शन किया, जिसके बाद कानून-व्यवस्था का हवाला देकर उन्हें रातों-रात शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया।
  • सुरक्षा के नाम पर 20 साल का इंतजार: पिछले दो दशकों में उन्होंने कई बार कोलकाता लौटने की कोशिश की, लेकिन हर बार सुरक्षा कारणों का हवाला देकर उनके कार्यक्रम रद्द कर दिए गए। अब जब बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार आई है, उनकी वापसी का यह संयोग हकीकत बनने जा रहा है।

3. ‘लज्जा’ उपन्यास से लेकर दिल्ली के परमिट तक: तसलीमा का संघर्ष पथ

तसलीमा नसरीन की जिंदगी लगातार खतरों और निर्वासन के साये में बीती है:

  • 1994 का वो फतवा: साल 1993-94 में जब उनका मशहूर उपन्यास ‘लज्जा’ सामने आया, तो बांग्लादेश में भूचाल आ गया। इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनके खिलाफ मौत का फतवा जारी कर दिया। जान बचाने के लिए वे स्वीडन भाग गईं, जहां उन्हें वहां की नागरिकता मिली। बांग्लादेश में आज भी उनकी कई किताबों पर बैन है।
  • भारत में ठिकाना: कोलकाता से निकाले जाने के बाद वे कुछ समय जयपुर में रहीं और फिर साल 2011 से वे दिल्ली में दीर्घकालिक निवास परमिट (Long-term Residence Permit) पर रह रही हैं।

तसलीमा का भारत में रहना कभी भी आसान नहीं रहा। साल 2024 के जुलाई महीने में उनका निवास परमिट अचानक रद्द होने की खबरें आई थीं, जिससे उनकी नागरिकता और सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए थे। हालांकि, बाद में उन्होंने साफ किया कि परमिट रिन्यूअल प्रक्रिया में था। इसी साल (2024) बांग्लादेश में हुए बड़े तख्तापलट और हिंदुओं पर हुए हमलों को लेकर भी तसलीमा ने खुलकर अपनी चिंता व्यक्त की थी।

अब, 18 साल, 8 महीने और 10 दिनों के इस लंबे और दर्दनाक इंतजार के बाद, 1 अगस्त 2026 को कोलकाता की जनता और साहित्यिक जगत अपनी इस चहेती लेखिका का स्वागत करने के लिए उत्सुक है। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दौरा बंगाल की राजनीति में और कितनी गरमाहट लेकर आता है।

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