जनता और पार्टी दोनों के बीच चमक खो रहे हैं बालेन शाह ?


डा. उत्कर्ष सिन्हा
काठमांडू के पूर्व मेयर और अब नेपाल के प्रधान मंत्री बालेन शाह अभी कुछ ही महीनो पहले तक नेपाल की नई राजनीति के सबसे चमकदार चेहरे थे। भ्रष्टाचार-विरोध, व्यवस्था-परिवर्तन और युवाओं की उम्मीदों ने उन्हें असाधारण लोकप्रियता दी थी, लेकिन अब वही छवि तेजी से धुंधली पड़ती दिख रही है। हाल के विरोध, छात्र संगठनों की नाराज़गी और राष्ट्रीय स्वराज पार्टी जैसे मंचों पर उभरे अंदरूनी टकराव यह संकेत दे रहे हैं कि बालेन की कार्यशैली अब समर्थन नहीं, सवाल पैदा कर रही है।
बालेन शाह की लोकप्रियता जिस आक्रोश और उम्मीद पर टिकी थी, वह अब उन्हीं के खिलाफ काम करने लगी है। जन-अपेक्षाएँ तेज़ी से बढ़ीं, लेकिन शासन-शैली उसी गति से परिष्कृत नहीं हुई। परिणाम यह है कि जो नेता कल तक बदलाव का प्रतीक था, आज वही नेता “अहंकारी”, “असंवादशील” और “अति-आक्रामक” समझा जाने लगा है। राजनीति में यह बदलाव बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि छवि का निर्माण जितनी तेजी से होता है, उसका क्षरण उससे भी तेज़ हो सकता है।
बालेन शाह की ताकत उनकी स्पष्ट, आक्रामक और सीधे टकराव वाली शैली रही है। उन्होंने पारंपरिक दलों के खिलाफ जो राजनीतिक भाषा अपनाई, वह युवाओं को आकर्षित करती थी क्योंकि उसमें व्यवस्था बदलने का साहस दिखता था। लेकिन राजनीति में वही शैली तब बोझ बन जाती है जब उसमें संवाद, लचीलापन और संस्थागत संतुलन की जगह केवल कठोरता रह जाए। बालेन के मामले में यही संकट सामने आता दिख रहा है।
उनके खिलाफ उभरता असंतोष केवल किसी एक बयान या एक फैसले का परिणाम नहीं है। यह उस गहरी बेचैनी का हिस्सा है जिसमें समर्थक अब यह पूछने लगे हैं कि क्या बालेन वास्तव में वैकल्पिक राजनीति का निर्माण कर रहे हैं, या सिर्फ टकराव की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं। युवा वर्ग, जिसने उन्हें बदलाव का प्रतीक माना था, अब उन्हीं से अधिक संवाद, पारदर्शिता और व्यवहारिकता की अपेक्षा कर रहा है। जब यह अपेक्षा पूरी नहीं होती, तो मोहभंग बहुत तेज़ी से होता है।
उसकी पार्टी रास्वपा के हालिया अधिवेशन और बैठकों में हुए विवादों ने इस धारणा को और मजबूत किया है कि नेपाल की नई राजनीति अभी भी नेतृत्व-संक्रमण और आंतरिक अनुशासन की परीक्षा से गुजर रही है। जगह-जगह झड़पें, धक्कामुक्की और आयोजनों का स्थगित होना यह दिखाता है कि नए राजनीतिक प्रयोग अभी संस्थागत स्थिरता से बहुत दूर हैं। ऐसे माहौल में बालेन जैसे नेता, जिनकी छवि पहले से ही तेज और असहज करने वाली रही है, और अधिक आलोचना के केंद्र में आ जाते हैं।
रास्वपा के भीतर भी खींचतान के संकेत साफ़ दिख रहे हैं, और यह सिर्फ संगठनात्मक मतभेद नहीं लगते बल्कि नेतृत्व-शैली को लेकर भी तनाव जैसा है। हालिया अधिवेशनों में झड़प, कुटाकुट और बैठकों के स्थगन की खबरें आई हैं, और कुछ रिपोर्टें सीधे यह सवाल उठा रही हैं कि क्या पार्टी में “रवि बनाम बालेन” जैसी अलग-अलग राजनीतिक धाराएँ बन रही हैं।
रिपोर्टों के अनुसार रास्वपा के जिला और प्रदेश अधिवेशनों में कई जगह विवाद हुआ, कुछ स्थानों पर हाथापाई तक पहुंचा, और मधेश प्रदेश में गतिविधियाँ रोकनी पड़ीं। इस तरह की घटनाएँ अक्सर तब होती हैं जब संगठन तेज़ी से फैल रहा हो लेकिन उम्मीदवार चयन, स्थानीय शक्ति-संतुलन और नेतृत्व पर सहमति कमजोर हो।
बालेन शाह की शैली को लेकर जो चर्चा है, उसका मतलब यह नहीं कि पार्टी खुलकर उनके खिलाफ खड़ी है, बल्कि यह कि कुछ कार्यकर्ता और नेता उनकी टकरावपूर्ण, तीखी और केंद्रीयकृत राजनीतिक शैली से पूरी तरह सहज नहीं हैं। बीबीसी की एक रिपोर्ट में भी यह सवाल उठाया गया है कि क्या रास्वपा के भीतर रवि लामिछाने और बालेन शाह से जुड़े अलग-अलग गुट या झुकाव उभर रहे हैं।
यह भी सच है कि बालेन अभी पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुए हैं। उनके पास अब भी शहरी युवाओं का एक वर्ग, सोशल मीडिया पर मजबूत उपस्थिति और स्थापित दलों से असंतुष्ट लोगों की सहानुभूति बनी हुई है। लेकिन समस्या यह है कि यह समर्थन अब भरोसे के बजाय जिज्ञासा और विरोधाभास के साथ जुड़ता जा रहा है। यही वह बिंदु है जहां लोकप्रियता धीरे-धीरे अलोकप्रियता में बदलने लगती है।
नेपाल की वर्तमान राजनीति में बालेन शाह एक प्रतीकात्मक चेतावनी बनते जा रहे हैं। यह चेतावनी सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि उन तमाम नए नेताओं के लिए है जो करिश्मे को शासन का विकल्प मान बैठते हैं। जनता शुरुआत में तेज़ स्वर को साहस समझती है, लेकिन लंबे समय में वही तेज़ स्वर अगर समाधान न दे, तो असंतोष में बदल जाता है। बालेन शाह की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है, लेकिन उनकी कार्यशैली पर उठते सवाल यह साफ़ बता रहे हैं कि उनका राजनीतिक सफर अब नए और कठिन मोड़ पर है।



