दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ ओटीटी से हटाई गई, रिलीज के बाद क्यों बढ़ा विवाद?

नई दिल्ली: मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म ज़ी5 ने रिलीज के महज दो दिन बाद ही भारत में अपनी कैटलॉग से हटा दिया है। यह फिल्म 3 जुलाई को रिलीज हुई थी, लेकिन 5 जुलाई की शाम इसे “अगले आदेश तक उपलब्ध नहीं” बताते हुए प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया।

ज़ी5 ने अपने आधिकारिक एक्स (Twitter) हैंडल पर बयान जारी करते हुए कहा कि फिल्म को दर्शकों से भारी प्यार मिला है और वह इसके रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ खड़ा है।

बयान में कहा गया,
“अगले आदेश तक ‘सतलुज’ भारत में उपलब्ध नहीं होगी। फिल्म को जल्द से जल्द दोबारा उपलब्ध कराने के लिए सभी उचित विकल्पों पर काम किया जाएगा।”प्लेटफॉर्म ने दर्शकों का आभार जताते हुए यह भी कहा कि फिल्म ने रिलीज के बाद गहरी चर्चा को जन्म दिया है, जो अभी भी जारी है।

फिल्म में जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभा रहे दिलजीत दोसांझ ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह फिल्म अब रुकने वाली नहीं है।

उन्होंने लिखा,
“अब ये फिल्म रुकने वाली नहीं है। खालड़ा साहब की आवाज को कोई नहीं दबा सकता।”

उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर बहस और तेज हो गई है।

फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहन ने पहले बताया था कि सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) ने शुरुआत में फिल्म में 21 कट लगाने की मांग की थी, जो बाद में बढ़कर 120 से अधिक हो गई।

निर्देशक के अनुसार, कई कट ऐसे थे जिनका कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया। उन्होंने यह भी कहा था कि फिल्म के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ स्वीकार नहीं की जा सकती।

यह फिल्म पहले ‘पंजाब 95’ नाम से बन रही थी और लंबे समय से इसकी रिलीज अटकी हुई थी। इसे 7 फरवरी 2025 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज करने की घोषणा भी की गई थी, लेकिन बाद में यह योजना भी स्थगित हो गई।

फिल्म में दिलजीत दोसांझ के अलावा अर्जुन रामपाल, सुविंदर विक्की, जगजीत संधू और गीतिका विद्या ओहल्यान जैसे कलाकार नजर आते हैं।

जसवंत सिंह खालड़ा पंजाब में 1980–90 के दशक में मानवाधिकार आंदोलनों से जुड़े एक प्रमुख कार्यकर्ता थे। वे शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव भी रह चुके थे।

उन्होंने अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के श्मशान घाटों में मिले हजारों अज्ञात शवों का डेटा सार्वजनिक किया था। उनका आरोप था कि ये शव पुलिस की कथित अवैध कार्रवाइयों और फर्जी मुठभेड़ों के प्रमाण हैं।

सीबीआई रिपोर्ट के अनुसार, इसी काम के चलते 6 सितंबर 1995 को अमृतसर स्थित उनके घर से उनका अपहरण किया गया और बाद में उनकी हत्या कर दी गई।

फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने के बाद एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सेंसरशिप और ऐतिहासिक घटनाओं के चित्रण को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे “आवाज़ दबाने की कोशिश” बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे संवेदनशील विषय के चलते लिया गया निर्णय मान रहे हैं।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या ‘सतलुज’ को जल्द ही दोबारा स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध कराया जाएगा या यह विवाद और लंबा खिंचेगा।

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