लोगों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है, बॉम्बे हाई कोर्ट की तीखी टिप्पणी

मुंबई: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकार के फैसलों का विरोध करना या उसके खिलाफ नारे लगाना किसी भी नागरिक को उसके शहर या क्षेत्र से बाहर निकालने (Externment) का वैध आधार नहीं हो सकता। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के महाराष्ट्र महासचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी एक्सटर्नमेंट ऑर्डर को रद्द कर दिया।
न्यायमूर्ति माधव जामदार की एकल पीठ ने महाराष्ट्र पुलिस की कार्रवाई को असंवैधानिक और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए कहा कि केवल विरोध प्रदर्शन आयोजित करने या सरकार विरोधी नारे लगाने के आधार पर किसी नागरिक को उसके अपने शहर से बाहर नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी, जो मुंबई के चेंबूर क्षेत्र के निवासी हैं, पिछले कई वर्षों से नागरिकता संशोधन कानून (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, बाबरी मस्जिद, वक्फ बोर्ड में कथित भ्रष्टाचार तथा बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों जैसे मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करते रहे हैं।
महाराष्ट्र पुलिस ने वर्ष 2025 में महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम (Maharashtra Police Act) की धारा 56 के तहत उनके खिलाफ एक्सटर्नमेंट की कार्रवाई शुरू की। दिसंबर 2025 में जारी आदेश के तहत उन्हें 12 महीने के लिए मुंबई शहर और मुंबई उपनगर की सीमा से बाहर रहने का निर्देश दिया गया।
यह कार्रवाई वर्ष 2019 से 2024 के बीच दर्ज कई एफआईआर के आधार पर की गई थी। अधिकांश मामलों में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188 के तहत सार्वजनिक आदेशों की अवहेलना का आरोप लगाया गया था।
अदालत ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान जस्टिस माधव जामदार ने पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई।
उन्होंने सवाल किया कि यदि किसी नागरिक ने केवल “बीजेपी सरकार मुर्दाबाद” या “अमित शाह मुर्दाबाद” जैसे नारे लगाए हैं, तो यह एक्सटर्नमेंट जैसी कठोर कार्रवाई का आधार कैसे बन सकता है?
अदालत ने स्पष्ट किया कि:
- सरकार की आलोचना करना लोकतंत्र का हिस्सा है।
- विरोध प्रदर्शन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
- केवल राजनीतिक असहमति के कारण किसी व्यक्ति को उसके शहर से बाहर नहीं किया जा सकता।
- पुलिस कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए है, राजनीतिक विचारों को नियंत्रित करने के लिए नहीं।
“नागरिक सरकार के गुलाम नहीं हैं”
सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकों को सरकार की हर बात मानने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि देशभर में पेपर लीक जैसे मुद्दों पर लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। यदि हर विरोध प्रदर्शन पर मुकदमा दर्ज किया जाएगा तो लोकतंत्र का क्या अर्थ रह जाएगा?
उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस अधिकारी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं, किसी मंत्री या राजनीतिक दल के कार्यकर्ता नहीं।
मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
अपने लिखित आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि केवल भारत सरकार की कुछ नीतियों का विरोध करने के कारण सईद चौधरी के खिलाफ एक्सटर्नमेंट आदेश जारी किया गया।
अदालत के अनुसार यह कार्रवाई भारतीय संविधान के:
- अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता)
- अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार)
दोनों का उल्लंघन है।
हाई कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति व्यक्त करना अपराध नहीं माना जा सकता।
पुलिस के तर्क क्या थे?
पुलिस ने अपने आदेश में कहा था कि सईद चौधरी की गतिविधियों से:
- लोगों में भय का माहौल बन रहा था।
- सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही थी।
- कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी।
पुलिस का दावा था कि विरोध प्रदर्शनों के कारण स्थानीय शांति भंग होने की संभावना थी।
याचिकाकर्ता की दलील
सईद चौधरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत में कहा कि:
- उनके खिलाफ दर्ज सभी मामले विरोध प्रदर्शनों से जुड़े थे।
- अधिकांश मामलों में केवल IPC की धारा 188 लगाई गई थी।
- महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम की धारा 56 का उपयोग केवल गंभीर अपराधों और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में किया जा सकता है।
- राजनीतिक विरोध को अपराध मानकर एक्सटर्नमेंट करना कानून का दुरुपयोग है।
उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय लोगों के बयान पुलिस के आरोपों से मेल नहीं खाते।
हाई कोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस माधव जामदार ने कहा कि:
- एक्सटर्नमेंट ऑर्डर पुलिस शक्तियों का गलत और दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल था।
- याचिकाकर्ता की गतिविधियां महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के तहत निर्वासन का आधार नहीं बन सकतीं।
- केवल विरोध प्रदर्शन आयोजित करना या सरकार विरोधी नारे लगाना किसी नागरिक के खिलाफ इतनी कठोर कार्रवाई का आधार नहीं है।
इसके साथ ही अदालत ने पुलिस आयुक्त और मंडलायुक्त द्वारा पारित दोनों आदेश रद्द कर दिए।
प्रशांत भूषण की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस फैसले का स्वागत करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह निर्णय दिखाता है कि आज भी ऐसे न्यायाधीश मौजूद हैं जो नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार से सवाल पूछने का साहस रखते हैं।
SDPI ने फैसले का किया स्वागत
सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) ने हाई कोर्ट के फैसले को संविधान और लोकतंत्र की बड़ी जीत बताया।
पार्टी ने कहा कि अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि:
- शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है।
- सरकार विरोधी नारे लगाना अपराध नहीं है।
- लोकतांत्रिक असहमति को दबाने के लिए एक्सटर्नमेंट जैसे कानूनों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
जस्टिस माधव जामदार कौन हैं?
न्यायमूर्ति माधव जामदार का जन्म 13 जनवरी 1967 को महाराष्ट्र में हुआ।
उन्होंने:
- कीर्ति कॉलेज, मुंबई से बीएससी की।
- रामनारायण रुइया कॉलेज से इंडस्ट्रियल-एनालिटिकल केमिस्ट्री में डिप्लोमा प्राप्त किया।
- न्यू लॉ कॉलेज, मुंबई से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।
उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में सिविल, आपराधिक और संवैधानिक मामलों में लंबी वकालत की। पर्यावरण, मानवाधिकार, जेल सुधार, रेलवे दुर्घटनाओं, महिला सुरक्षा तथा जनहित याचिकाओं से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण मामलों में उन्होंने पैरवी की।
उन्हें 7 जनवरी 2020 को बॉम्बे हाई कोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था।
फैसले का संवैधानिक महत्व
यह फैसला भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सरकार की आलोचना करना, विरोध प्रदर्शन करना और लोकतांत्रिक असहमति व्यक्त करना संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार हैं। यदि किसी व्यक्ति ने हिंसा, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या गंभीर आपराधिक गतिविधि में भाग नहीं लिया है, तो केवल राजनीतिक विरोध के आधार पर उसे उसके शहर से बाहर नहीं किया जा सकता।



