ईरान के मुद्दे पर क्या पाकिस्तान ने भारत को कूटनीति में पीछे छोड़ दिया? जानिए क्यों उठ रहे हैं सवाल

पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच भारत और पाकिस्तान की विदेश नीतियां एक बार फिर चर्चा में हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के शामिल होने की खबरों के बाद क्षेत्रीय कूटनीति को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

दूसरी ओर, भारत की ओर से इस स्तर पर किसी शीर्ष नेता के शामिल नहीं होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, भारत लंबे समय से ईरान, इजरायल, अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति अपनाता रहा है।

ईरान के साथ भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की तुलना नई नहीं है। वर्ष 1989 में ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातोल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम इसहाक खान अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे।

उस समय भी भारत की ओर से प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति स्तर का कोई नेता शामिल नहीं हुआ था। उस दौर में पाकिस्तान अमेरिका के करीबी सहयोगियों में शामिल था, जबकि अमेरिका ईरान में स्थापित इस्लामिक शासन के प्रति बेहद आलोचनात्मक रुख रखता था।इसके बावजूद पाकिस्तान ने ईरान के साथ अपने संबंध बनाए रखे।

पाकिस्तान की विदेश नीति की खासियत यह रही है कि उसने कई बार एक-दूसरे से विरोधी देशों के साथ भी संवाद बनाए रखने की कोशिश की है।

ईरान के साथ उसकी साझा सीमा, सुरक्षा हित और क्षेत्रीय समीकरण उसे महत्वपूर्ण बनाते हैं। वहीं अमेरिका के साथ उसके सैन्य और रणनीतिक संबंध भी लंबे समय से रहे हैं।

यही वजह है कि कई विश्लेषक पाकिस्तान की इस क्षमता को उसकी कूटनीतिक ताकत के रूप में देखते हैं कि वह अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संपर्क बनाए रखता है।

भारत की विदेश नीति का आधार लंबे समय से रणनीतिक स्वतंत्रता और संतुलित संबंधों पर रहा है।नई दिल्ली ने एक ओर अमेरिका और इजरायल के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी मजबूत की है, वहीं दूसरी तरफ ईरान के साथ भी ऊर्जा, व्यापार और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में संबंध बनाए रखे हैं।

भारत के लिए ईरान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह मध्य एशिया तक पहुंच और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में अहम भूमिका रखता है।

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव के दौरान भारत ने किसी एक पक्ष के समर्थन में खुलकर बयान देने से परहेज किया। भारत ने लगातार तनाव कम करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की बात कही।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के इस रुख से कुछ देशों में यह संदेश गया कि नई दिल्ली अमेरिका और इजरायल के ज्यादा करीब दिखाई दे रही है।वहीं दूसरी राय यह है कि भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित रुख अपनाया।

पश्चिम एशिया भारत के लिए क्यों अहम?

पश्चिम एशिया भारत की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस क्षेत्र से भारत का ऊर्जा आयात काफी हद तक जुड़ा हुआ है। इसके अलावा लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं, जिससे भारत को बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।खाड़ी देशों के साथ मजबूत संबंध भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि हालिया घटनाक्रम में पाकिस्तान ने खुद को क्षेत्रीय बातचीत में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में पेश करने की कोशिश की है।

ईरान, अफगानिस्तान और खाड़ी क्षेत्र के बीच पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक महत्व देती है।

हालांकि, यह भी माना जाता है कि पाकिस्तान के सामने आर्थिक और सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियां मौजूद हैं, इसलिए केवल कूटनीतिक सक्रियता से उसकी स्थिति पूरी तरह नहीं बदल जाती।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अमेरिका, इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों का संतुलन बनाए रखे।

एक तरफ भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह ईरान और अन्य पश्चिम एशियाई देशों के साथ अपने पुराने संबंधों को भी बनाए रखना चाहता है।

बदलती वैश्विक राजनीति में भारत को यह तय करना होगा कि वह अपने आर्थिक और सुरक्षा हितों की रक्षा करते हुए किस तरह सभी प्रमुख देशों के साथ रिश्ते आगे बढ़ाए।

निष्कर्ष

ईरान के मुद्दे पर पाकिस्तान की सक्रियता और भारत की सतर्क कूटनीति ने एक बार फिर दक्षिण एशिया की विदेश नीतियों को चर्चा में ला दिया है। हालांकि, दोनों देशों की परिस्थितियां और रणनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं। आने वाले समय में पश्चिम एशिया की राजनीति भारत और पाकिस्तान दोनों की कूटनीतिक क्षमता की परीक्षा लेती रहेगी।

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