पति की हर हाल में नहीं बनती जिम्मेदारी! गुजारा भत्ता पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

तलाक या पति-पत्नी के अलग रहने की स्थिति में सबसे ज्यादा चर्चा गुजारा भत्ता (Maintenance) को लेकर होती है। आम धारणा है कि हर हाल में पति को पत्नी का भरण-पोषण करना पड़ता है। लेकिन भारतीय कानून और अदालतों के फैसले बताते हैं कि ऐसा हर मामले में जरूरी नहीं है।

हाल ही में कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है और उसकी आय पति से अधिक है, तो उसे सिर्फ पत्नी होने के आधार पर गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता।

कर्नाटक हाईकोर्ट की एकल पीठ ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर जीवनसाथी की मदद करना है, न कि पहले से आत्मनिर्भर व्यक्ति को अतिरिक्त आर्थिक लाभ देना।

अदालत ने कहा कि यदि पत्नी अपनी जरूरतों का खर्च खुद उठा सकती है और उसकी आय पति से ज्यादा है, तो अंतरिम गुजारा भत्ता देने का कोई औचित्य नहीं बनता।

अदालत प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर फैसला करती है। हालांकि, सामान्य तौर पर निम्न परिस्थितियों में गुजारा भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है—

  • पत्नी की आय पति से अधिक हो।
  • पत्नी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो और उसकी नियमित आय हो।
  • पत्नी के पास पर्याप्त संपत्ति, निवेश या अन्य आय के स्रोत हों।
  • पत्नी बिना उचित कारण के पति से अलग रह रही हो (यह हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है)।
  • पत्नी ने दोबारा विवाह कर लिया हो। ऐसी स्थिति में सामान्यतः गुजारा भत्ता समाप्त हो सकता है।

न्यायमूर्ति डॉ. चिल्लकुर सुमालथा की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि यदि पत्नी खुद कमाती है, उसकी आय पति से अधिक है और उस पर बच्चों की देखभाल जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारी भी नहीं है, तो केवल महिला या पत्नी होने के आधार पर उसे गुजारा भत्ता नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण तभी दिया जाता है जब यह साबित हो कि पत्नी के पास अपनी आवश्यक जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं हैं।

ऐसा नहीं है। केवल नौकरी करना या आय होना ही गुजारा भत्ता खारिज होने का आधार नहीं बनता।

अदालत यह भी देखती है कि पत्नी की आय उसकी जरूरतों और जीवन-यापन के लिए पर्याप्त है या नहीं। यदि पत्नी की कमाई बहुत कम है और पति की आय उससे काफी अधिक है, तो अदालत पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दे सकती है, ताकि दोनों के जीवन स्तर में अत्यधिक असमानता न रहे।

भारतीय अदालतें गुजारा भत्ता तय करते समय कई पहलुओं पर विचार करती हैं, जैसे—

  • पति और पत्नी की आय।
  • दोनों की आर्थिक स्थिति।
  • जीवन-यापन का स्तर।
  • बच्चों की जिम्मेदारी।
  • संपत्ति और अन्य आय के स्रोत।
  • मामले की विशेष परिस्थितियां।

यानी, हर मामले में फैसला अलग-अलग तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाता है।

ध्यान दें: यह सामान्य कानूनी जानकारी है। किसी विशेष मामले में अंतिम निर्णय संबंधित अदालत उपलब्ध तथ्यों, साक्ष्यों और लागू कानूनों के आधार पर ही देती है।

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