आखिर क्यों यूरोप में बरस रहा गर्मी का कहर? जानिए हीटवेव के पीछे की पूरी वैज्ञानिक वजह

यूरोप इस समय पिछले कई वर्षों की सबसे भीषण हीटवेव का सामना कर रहा है। स्पेन, फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, ग्रीस और बाल्कन क्षेत्र के कई हिस्सों में तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है। कई देशों में रेड अलर्ट जारी किया गया है, जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं और स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दबाव बढ़ता जा रहा है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह केवल एक सामान्य गर्मी नहीं है, बल्कि कई प्राकृतिक और मानवजनित कारणों के एक साथ सक्रिय होने का परिणाम है। आइए जानते हैं कि आखिर यूरोप में इतनी भीषण गर्मी क्यों पड़ रही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बार यूरोप में भीषण गर्मी की सबसे बड़ी वजह हीट डोम (Heat Dome) है। यह एक ऐसी मौसमीय स्थिति होती है, जिसमें किसी क्षेत्र के ऊपर उच्च वायुदाब (High Pressure System) लंबे समय तक बना रहता है।

इस उच्च दबाव की वजह से गर्म हवा पृथ्वी की सतह के पास फंस जाती है और ऊपर नहीं उठ पाती। साथ ही बादल बनने की संभावना भी कम हो जाती है। परिणामस्वरूप सूरज की किरणें लगातार जमीन को गर्म करती रहती हैं और तापमान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाता है।

यूरोप के दक्षिणी हिस्सों में अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान से आने वाली बेहद गर्म और शुष्क हवाएं भी तापमान बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, दक्षिणी हवाओं के कारण सहारा की गर्म हवा भूमध्यसागर पार करके स्पेन, इटली, फ्रांस, पुर्तगाल और ग्रीस तक पहुंच रही है। इससे इन देशों में सामान्य से कई डिग्री अधिक तापमान दर्ज किया जा रहा है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण दुनिया भर में हीटवेव की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं।

औद्योगिक क्रांति के बाद से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा लगातार बढ़ी है। ये गैसें पृथ्वी से निकलने वाली गर्मी को वातावरण में रोककर रखती हैं, जिससे वैश्विक औसत तापमान बढ़ता है।

इसी वजह से यूरोप में पहले जहां 20–30 वर्षों में एक बार अत्यधिक गर्मी पड़ती थी, अब ऐसी घटनाएं कुछ ही वर्षों के अंतराल पर देखने को मिल रही हैं।

कई यूरोपीय देशों में इस साल सामान्य से कम बारिश हुई है। लगातार सूखे के कारण मिट्टी में नमी बेहद कम हो गई है।

जब जमीन में पर्याप्त नमी होती है, तो सूर्य की ऊर्जा का एक हिस्सा पानी को वाष्पित करने में खर्च होता है। लेकिन सूखी जमीन में ऐसा नहीं होता। ऐसे में पूरी ऊर्जा जमीन को गर्म करने में लगती है, जिससे तापमान तेजी से बढ़ जाता है।

भूमध्यसागर (Mediterranean Sea) और आसपास के समुद्री क्षेत्रों का तापमान भी सामान्य से अधिक दर्ज किया गया है।

गर्म समुद्र आसपास की हवा को भी गर्म कर देता है, जिससे तटीय इलाकों में भी राहत नहीं मिलती। रात के समय भी तापमान अधिक बना रहता है, जिससे लोगों को पर्याप्त ठंडक नहीं मिल पाती।

यूरोप के बड़े शहरों में कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें और कम हरियाली गर्मी को लंबे समय तक अपने अंदर बनाए रखती हैं।

इसे Urban Heat Island Effect कहा जाता है। दिनभर गर्मी सोखने के बाद ये संरचनाएं रात में भी गर्मी छोड़ती रहती हैं। यही कारण है कि शहरों में रात का तापमान भी काफी ऊंचा रहता है।

भीषण गर्मी और कम नमी के कारण यूरोप के कई हिस्सों में जंगलों में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं।

जंगलों में लगी आग से निकलने वाला धुआं और गर्मी स्थानीय मौसम को और अधिक प्रभावित करती है। इसके अलावा लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र को नुकसान पहुंचने से पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ता है।

गर्मी बढ़ने के साथ एयर कंडीशनर और कूलिंग सिस्टम का उपयोग तेजी से बढ़ जाता है, जिससे बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाती है।

दूसरी ओर, पानी की खपत भी बढ़ती है। कई देशों में जलाशयों का स्तर पहले से कम होने के कारण पानी की कमी की आशंका बढ़ गई है। कुछ क्षेत्रों में पानी के सीमित उपयोग की सलाह भी दी गई है।

अत्यधिक गर्मी का सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों पर पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार ऊंचे तापमान से हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, लो ब्लड प्रेशर, सांस संबंधी समस्याएं और हृदय रोग का खतरा बढ़ जाता है। कई देशों के अस्पतालों में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ी है।

जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी नहीं लाई गई, तो यूरोप ही नहीं बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में इस तरह की भीषण हीटवेव अधिक सामान्य हो सकती हैं।

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु संबंधी रिपोर्टों के अनुसार, वैश्विक तापमान में हर छोटी बढ़ोतरी अत्यधिक गर्मी, सूखा, जंगलों में आग और चरम मौसम की घटनाओं का जोखिम बढ़ाती है। इसी कारण यूरोपीय देश स्वच्छ ऊर्जा, कार्बन उत्सर्जन में कमी, हरित बुनियादी ढांचे और जलवायु अनुकूलन योजनाओं पर तेजी से काम कर रहे हैं।

यूरोप में पड़ रही भीषण गर्मी केवल एक मौसमी घटना नहीं है। इसके पीछे हीट डोम, सहारा से आने वाली गर्म हवाएं, कम बारिश, समुद्र का बढ़ता तापमान, शहरीकरण और सबसे बढ़कर जलवायु परिवर्तन जैसे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में ऐसी विनाशकारी हीटवेव और अधिक बार तथा अधिक तीव्र रूप में देखने को मिल सकती हैं।

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