अमेरिका/इज़राइल–ईरान संघर्ष में ईरान की विजय


डॉ.दिनेश चंद्र श्रीवास्तव
28 फरवरी 2026 को प्रारम्भ हुआ अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच का संघर्ष 18 जून 2026 को अमेरिका और ईरान के बीच हुए एक समझौते के साथ समाप्त हुआ। भारी जनहानि तथा व्यापक आर्थिक और भौतिक क्षति के बाद युद्ध का अंत वार्ता के माध्यम से हुआ। सामान्यतः युद्ध में विजय का अर्थ यह माना जाता है कि विजेता पक्ष पराजित पक्ष को वार्ता की मेज़ पर आने के लिए विवश करे तथा उससे ऐसे समझौते की शर्तें स्वीकार कराए जो विजेता के आर्थिक और सामरिक हितों के अनुकूल हों।
संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल ने ईरान को सैन्य और आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर समझते हुए उसके विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ किया था, किंतु युद्ध के परिणामों ने इस आकलन को गलत सिद्ध किया। वार्ता के पश्चात हुए समझौते की शर्तों से यह प्रतीत होता है कि ईरान ने कई महत्वपूर्ण रियायतें प्राप्त कीं। समझौते के प्रमुख चौदह बिंदु निम्नलिखित हैं—
- लेबनान सहित सभी मोर्चों पर संघर्ष की समाप्ति।
- एक-दूसरे की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता तथा आंतरिक मामलों के सम्मान की प्रतिबद्धता।
- अंतिम समझौते के लिए वार्ता करने हेतु 60 दिनों की अवधि, जिसे आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकेगा।
- अमेरिका द्वारा 30 दिनों के भीतर पूर्ण नाकेबंदी समाप्त करना तथा ईरान के निकटवर्ती क्षेत्रों से अपनी सैन्य उपस्थिति हटाना।
- ईरान द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों को बिना किसी शुल्क के सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराना।
- अमेरिका तथा क्षेत्रीय साझेदारों द्वारा ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए 300 अरब अमेरिकी डॉलर का पैकेज प्रदान करना।
- ईरान पर लगाए गए सभी आर्थिक प्रतिबंधों की समाप्ति, जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों तथा अमेरिका द्वारा एकतरफा लगाए गए प्रतिबंध भी शामिल हैं।
- ईरान द्वारा परमाणु हथियार प्राप्त न करने की प्रतिबद्धता तथा उसके संवर्धित यूरेनियम के संबंध में उपयुक्त व्यवस्था करना।
- संवर्धित यूरेनियम के प्रश्न का समाधान होने तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति को यथावत बनाए रखना।
- अमेरिका द्वारा नए प्रतिबंध न लगाने तथा ईरान को तेल, पेट्रोलियम उत्पादों और उनसे संबंधित सेवाओं, जैसे बैंकिंग और परिवहन, के निर्यात हेतु आवश्यक छूट प्रदान करना।
- अमेरिका द्वारा ईरान की जमी हुई अथवा प्रतिबंधित निधियों को मुक्त करना।
- समझौता ज्ञापन (एमओयू) तथा भविष्य के समझौते के क्रियान्वयन और अनुपालन की निगरानी के लिए एक तंत्र की स्थापना।
- एमओयू के हस्ताक्षर और उसके कार्यान्वयन के बाद अंतिम समझौते के लिए आगे की वार्ताएँ।
- अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक बाध्यकारी प्रस्ताव द्वारा अनुमोदित किया जाना।
इन चौदह बिंदुओं में केवल आठवाँ बिंदु ऐसा प्रतीत होता है जो ईरान के विरुद्ध जाता है, क्योंकि इसके अंतर्गत उसे परमाणु हथियारों से संबंधित क्षमता विकसित न करने की प्रतिबद्धता व्यक्त करनी है। हालांकि, ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह परमाणु हथियार प्राप्त करने का इच्छुक नहीं है। इसके अतिरिक्त कुछ बिंदु केवल समझौते के कार्यान्वयन और निगरानी की व्यवस्था से संबंधित हैं, जबकि अधिकांश प्रावधान या तो यथास्थिति बनाए रखते हैं अथवा ईरान के पक्ष में दिखाई देते हैं।
पूरे संघर्ष के दौरान ईरान ने अमेरिका के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं किया। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रायः वही पक्ष विजयी माना जाता है जो वार्ता की मेज़ पर अधिक लाभ प्राप्त करता है। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो समझौते की शर्तें यह संकेत देती हैं कि ईरान इस संघर्ष से अपेक्षाकृत अधिक लाभप्रद स्थिति में उभरकर सामने आया। अतः यह तर्क दिया जा सकता है कि अमेरिका की सैन्य शक्ति के सामने ईरान ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामरिक सफलता प्राप्त की।
(लेखक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं)



