दोहा वार्ता का बड़ा अपडेट: 120 अरब डॉलर की महा-डील, जानें दुनिया के किन देशों की तिजोरियों में बंद है ईरान का पैसा?

जुबिली स्पेशल डेस्क
दुबई/दोहा। मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में इस वक्त एक नया और बेहद संवेदनशील मोड़ आ गया है। परमाणु कार्यक्रम को लेकर दशकों से आमने-सामने खड़े अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर ‘बैकचैनल डिप्लोमेसी’ तेज हो गई है। इस बार मामला केवल यूरेनियम संवर्धन का नहीं, बल्कि दुनिया के अलग-अलग देशों में फ्रीज (जब्त) पड़े ईरान के करीब 120 अरब डॉलर (लगभग ₹10 लाख करोड़) का है।
इस जब्त रकम को वापस पाने के लिए ईरान ने अब तक का सबसे बड़ा दांव खेला है। कतर की राजधानी दोहा में इस वक्त एक बेहद गोपनीय और हाई-लेवल मीटिंग चल रही है, जहां कतर इस पूरे सौदे में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा रहा है।
24 अरब डॉलर की पहली किस्त पर नजर, दोहा में ‘सीक्रेट’ मंथन
आर्थिक प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान की पहली प्राथमिकता दुनिया के अलग-अलग बैंकों से 24 अरब डॉलर के पहले स्लॉट को क्लियर कराने की है। अमेरिकी पाबंदियों के कारण ईरान का पैसा चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, कतर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में फंसा हुआ है।
चूंकि ईरान सीधे अमेरिका से डील नहीं कर सकता, इसलिए कतर के माध्यम से यह पैसा ईरान तक पहुंचाने का रूट तैयार किया जा रहा है। कतर ही वह देश है जिसके जरिए दोनों देशों के बीच कूटनीतिक कड़ियों को जोड़ा जा रहा है।
किस देश में फंसा है ईरान का कितना पैसा?
- दक्षिण कोरिया: करीब 6 अरब डॉलर (तेल की बिक्री का पैसा, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण सियोल ने रोक रखा है)।
- कतर: 2023 में बाइडेन प्रशासन द्वारा 5 कैदियों की रिहाई के बदले तय किए गए 6 अरब डॉलर, जो फिलहाल कतर के पास ही होल्ड पर हैं।
- ब्रिटेन और तुर्की: इन देशों के पास भी ईरान की बड़ी संपत्ति जब्त है, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई का ब्रिटेन स्थित एक आलीशान बंगला भी शामिल है।
- अंतरराष्ट्रीय बैंक: ईरान का सबसे बड़ा हिस्सा ग्लोबल बैंकों में फ्रीज है, जिसे ईरान अमेरिकी दादागिरी का नतीजा बताता है।
क्या है नया ‘इंटरिम फॉर्मूला’ और शर्तें?
सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान एक अंतरिम (Interim) समझौते की तरफ बढ़ रहे हैं। यदि यह डील फाइनल होती है, तो मिडिल ईस्ट की तस्वीर बदल जाएगी। शर्तों के तहत
- ईरान की प्रतिबद्धता: ईरान दुनिया के सबसे संवेदनशील तेल व्यापार मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को पूरी तरह खुला रखेगा। वह अपने किसी भी पड़ोसी देश पर हमला नहीं करेगा और यूरेनियम संवर्धन को कम करने के लिए अमेरिकी विकल्पों पर बात करेगा।
- अमेरिका का वादा: अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान या लेबनान पर कोई सैन्य कार्रवाई नहीं करेंगे। साथ ही, आर्थिक प्रतिबंधों में बड़ी ढील दी जाएगी।
ट्रंप की चेतावनी बनाम ईरान का ‘राहत’ कार्ड इस संभावित समझौते के बीच अमेरिका में राजनीतिक घमासान भी शुरू हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सौदे का कड़ा विरोध करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा- “जब तक ईरान न्यूक्लियर डस्ट (परमाणु कचरे) को पूरी तरह खत्म नहीं करता, तब तक उसे एक भी डॉलर नहीं मिलेगा।” दूसरी तरफ, ईरान इस पैसे को ‘राहत और बचाव अभियान’ (Humanitarian Aid) के नाम पर रिलीज कराने की कोशिश में जुटा है ताकि अमेरिकी विपक्ष के तीखे हमलों से बाइडेन प्रशासन को बचाया जा सके।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
यह पहली बार नहीं है जब पैसे के बदले परमाणु डील की जा रही है। इससे पहले 2015 में ओबामा प्रशासन ने परमाणु समझौते (JCPOA) के बाद ईरान के 50 अरब डॉलर अनफ्रीज किए थे। लेकिन 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आते ही इस समझौते को रद्दी की टोकरी में डाल दिया था। अब देखना यह है कि क्या दोहा में चल रही यह महा-बैठक ईरान की अर्थव्यवस्था को संजीवनी दे पाएगी, या ट्रंप का विरोध एक बार फिर इस डील पर पानी फेर देगा।


