Saturday - 30 May 2020 - 1:27 AM

कोरोना संकट खत्म होने के बाद क्या प्रवासी कामगार फिर शहर लौटेंगे ?

  • तालाबंदी के बाद से प्रवासी मजदूरों का अपने घर लौटने का जारी है सिलसिला
  • घोर अनियमितताओं की वजह से घर को लौटने को मजबूर हुए प्रवासी मजदूर
  •  कोरोना संक्रमण से ज्यादा दो जून की रोटी की फिक्र है मजदूरों को

न्यूज डेस्क

केंद्र सरकार के तमाम पैकजों के ऐलान के बाद भी प्रवासी मजदूरों का पलायन नहीं रुक रहा है। हर दिन सैकड़ों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने गांव पहुंच रहे हैं। अभी भी राज्यों की सीमाओं और सड़कों पर हजारों प्रवासी मजदूर अपने गांवों जाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।
देश के बड़े-बड़े औद्योगिक शहरों से मजदूरों के पलायन के बाद सरकारों से लेकर फैक्ट्री के मालिकों के सामने सवाल खड़ा हो गया है कि कोरोना संकट के बाद ये मजदूर वापस आयेंगे या नहीं? अनिश्चितताओं के इस दौर में न तो सरकारों को भरोसा है कि ये मजदूर शहर लौटेंगे और न ही फैक्ट्री मालिकों को। अब बड़ा सवाल कि ये नहीं आयेंगे तो क्या होगा?

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हजारों की संख्या में पहुंच रहे मजदूरों को लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों की भी चिंताएं अब बढऩे लगी हैं क्योंकि क्वारंटीन की समायवधि खत्म होने के बाद राज्य सरकारों को इनके लिए रोजगार की व्यवस्था करनी होगी।

भविष्य में रोजगार को लेकर ख़ुद मजदूर भी चिंता में हैं। फिलहाल अभी के हालात में उनके लिए अभी सबसे बड़ी मुश्किल जीवन और जीविका के बीच के चुनाव की है।

25 मार्च को देशव्यापी तालाबंदी के बाद से खबरों में कोरोना वायरस से ज्यादा म दर-दर भटक रहे प्रवासी मजदूर हैं। रेलवे ट्रैक से लेकर सड़कों पर मजदूर भूखे-प्यासे दर-दर भटकने को मजबूर हैं। पलायन कर रहे मजदूरों की तादात कई करोड़ है।

खुद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दिनों ऐलान किया था कि सरकार आठ करोड़ प्रवासी मज़दूरों के लिए अगले दो महीने तक खाने का इंतजाम कर रही है। इसके लिए 3500 करोड़ रुपये की राशि का एलान किया। उनके मुताबिक राज्य सरकारों से मिले आंकड़ों के आधार पर हमारे यहां 8 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं।

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ये पहला मौका है जब सरकार ने खुद प्रवासी मजदूरों का आंकड़ा दिया है। इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिन राज्यों में बड़े-बड़े उद्योग धंधे हैं, वे सरकारें कितनी चिंतित होंगी। राज्य सरकारें ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार को भी इसका डर है। चिंता इस बात की है कि अगर मजदूर वापस ना आए तो अर्थव्यवस्था का क्या होगा? डर इस बात का है कि अर्थव्यव्स्था पटरी पर नहीं लौटी तो राज्यों और देश का क्या होगा?

ये मौजूं सवाल सभी के जेहन में हैं जिन्हें देश की अर्थव्यवस्था की चिंता है। कुछ दिनों ही पहले कर्नाटक सरकार ने एक दिन बीच में मजदूरों को ले जाने वाली श्रमिक ट्रेन भी रोक दी थी। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मीडिया से बातचीत में अपनी चिंता जाहिर की थी।

अब चूंकि तालाबंदी का चौथा चरण शुरु हो चुका है और इसमें कई तरह की ढील भी दी गई है तो चिंता बढऩा स्वाभाविक है। ऐसे में अब जब फैक्ट्रियों को खोलने की बात की जा रही है तो यहां काम करने के लिए मजदूर कहां से आएंगे? ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारों ने इन मजदूरों को रोकने की कोशिश नहीं की, कोशिश की लेकिन ये मजदूर सुनने को तैयार नहीं हुए। अब सवाल यह भी है कि इन्हें आखिर सरकारों पर भरोसा क्यों नहीं है।

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किन राज्यों से आते हैं प्रवासी मजदूर

‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार से देश के दूसरे राज्यों में सबसे ज्यादा जाते हैं। फिर नंबर आता है मध्य प्रदेश, ओडिशा और झारखंड का। जिन राज्यों में ये काम की तलाश में जाते हैं उनमें से सबसे आगे है दिल्ली-एनसीआर और महाराष्ट्र। इसके बाद नंबर आता है गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब का।

रेल मंत्रालय और राज्यों के आंकड़ों के मुताबिक 15 लाख से अधिक मजदूर अपने गांव लौट चुके हैं। मतलब 20 फीसदी के आसपास लोग वापस लौट चुके हैं और तकरीबन इतनी ही संख्या में मजदूर अलग-अलग जगहों पर फंसे हैं। ऐसे में शहरों में इनका काम कौन करेगा और यही है राज्य सरकारों और केन्द्र सरकार का डर।

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दिल्ली, महाराष्ट्र और पंजाब की बढ़ी मुश्किलें

सड़कों पर चल रहे मजदूर दूसरे राज्यों में सबसे ज्यादा खेतों में या फिर निर्माण कार्यों में मजदूरी करते हैं। वहां काम ना मिला तो फिर घरों और सोसाइटी में मेड और सुरक्षा गार्ड को तौर पर काम करते हैं। इसके आलावा एक बड़ा वर्ग कारखानों में भी काम करता है।
मजदूरों के पलायन से पंजाब में किसानों को मजदूर नहीं मिल रहा है। यहां खेतों की बुआई का काम शुरु होने वाला है। ऐसे में आने वाले दिनों में बड़ा संकट खेती पर आने वाला है जिसका सीधा असर अनाज की पैदावार पर पड़ेगा।

एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में दिल्ली में ऐसे मजदूरों की संख्या तकरीबन 25-27 फीसदी के आस-पास है, जबकि दिल्ली की आबादी करीब 2 करोड़ है। इसमें से तकरीबन 50 लाख लोग मजदूरी के काम में लगे हैं। इनमें से आधे यानी 25 लाख लोग भी चले गए गए तो दिल्ली का क्या होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

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मजदूर फिर जायेंगे शहर ?

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हर दिन सैकड़ों मजदूर पहुंच रहे हैं। मीडिया से बातचीत में अधिकांश मजूदरों ने यही कहा कि अभी हाल-फिलहाल कुछ महीनों तक शहर जाने का इनका कोई इरादा नहीं है। ये अपने ही गांव और आस-पास के शहरों और गांवों में रोजगार तलाशेंगे। नहीं मिला तब कुछ सोचेेंगे।

एक पखवारें तक हर पल जद्दोजहद करके गांव पहुंचे मजदूरों के चेहरे पर एक इत्मीनान है। अभी उन्हें न तो कोरोना का डर है और न अभी रोजगार की चिंता। अभी वह कुछ दिन अपने पैरों को आराम देना चाहते हैं।

दूसरे राज्यों से लौटने वालों में सिर्फ दिहाड़ी मजदूर ही नहीं है। बल्कि महीने के 30-40 हजार कमाने वाले लोग भी है, जो अपना कामधाम छोड़कर अपने घर लौट आए हैं। सीतापुर के अजय कुमार जो लुधियाना में एक फैक्ट्री में काम करते थे। उन्हें रोज दस घंटे से ज़्यादा काम करना पड़ता था। हर माह उनके हाथ में 35 हजार रुपए आते थे।

वह कहते हैं कि कोरोना संकट के बाद इन महानगरों में ग्रामीण लोगों और मजदूरों के साथ जो व्यवहार हुआ, उसने उनका दिल तोड़ दिया। अब अपना घर छोड़कर नहीं जाऊंगा। वहीं रमेश तिवारी, जो दिल्ली में एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे। तालाबंदी ने उनकी नौकरी ले ली तो अब उन्होंने गांव में ही कुछ रोजगार करने का निश्चय कर लिया है।

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क्या है इसका समाधान?

मजदूरों के पलायन से सरकारों की चिंता बढ़ गई है। जिन राज्यों से पलायन हुआ है उनकी भी चिंता बढ़ी है और जिन राज्यों में ये पहुंच रहे हैं उनकी भी। चिंतित हर कोई है, जबकि शहर छोड़ कर गांव में लौट रहे हैं ज्यादातर मजदूरों का एक ही जवाब है कि अभी कुछ महीने तो गांव में ही हैं। अभी वापस नहीं जा रहे हैं।

हालांकि इस हालात में भी कुछ सकारात्मक सोचने वाले लोगों का कहना है कि ये लोग लौटेंगे लेकिन इसके लिए सरकार को सकारात्मक तरीके से कोशिश करनी पड़ेगी।

समाजशास्त्री डॉ. अनुपम मिश्रा कहते हैं-सड़कों पर पैदल चल रहे भूखे-प्यासे मजदूरों से यह सवाल पूछेंगे तो उनका जवाब न ही होगा। लेकिन अगले ही पल आप उनसे एक हफ्ते का खाना दे कर पूछें कि अब आप वापस अपने गांव लौटोगें, तो उनका जवाब शायद बदल जाए। सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए अभी से काम शुरू करना चाहिए।

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