Thursday - 6 May 2021 - 5:55 PM

क्या कह रहे जिला पंचायत चुनाव के नतीजे

यशोदा श्रीवास्तव

 पांच प्रदेशों के बाद यूपी के त्रिस्तरीय पंचायत के भी चुनाव परिणाम आ गये। सत्ता रूढ़ बीजेपी की कोशिश थी कि तमाम दुश्वारियों के बीच एक बार फिर यह सिद्ध किया जाय कि यूपी में गांव गांव शहर शहर बीजेपी की बम बम है।

बीजेपी अपने इस दिखावे की लोकप्रियता में फेल रही ठीक उसी तरह जैसे पूर्व में नगर निकाय के चुनाव में प्रदेश भर के नगर निगमों पर कब्जा कर यूपी भर के नगरीय निकाय तक अपनी लोकप्रियता का ढिंढोरा पीटा था,जो सच नहीं था।

नगर पंचायत के 70 फीसद सीटों पर निर्दलीय समेत गैर भाजपा दलों के लोग काबिज होने में सफलता पाई थी।

जिलापंचायत चुनाव परिणाम की शुरुआत यदि हम रामनगरी अयोध्या से करें तो बीजेपी के लिए यह बिल्कुल ही शुभ नहीं है जहां सपा के मुकाबले बीजेपी को महज छह सीटें मिली।

अयोद्धया ही नहीं प्रदेश के अधिकांश जिले ऐसे हैं जहां बीजेपी जिला पंचायत के चुनाव में खासा शिकस्त खाती दिखी। हां हरदोई सहित महज 6-7 जिलों में ऐसा दिखा जहां बीजेपी अन्य दलों की अपेक्षा बढ़त में है।

इस बार के जिला पंचायत के चुनाव में सभी राजनीतिक दलों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था।कांग्रेस ने भी! लेकिन कांग्रेस गांव की सरकार में अभी भी बहुत हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं रहती।

यूपी में अपने गड्डमड्ड संगठन के बूते यदि इस चुनाव में उसका परफॉर्मेंस देखा जाय तो बहुत कुछ खोने जैसा नहीं दिखा। हर जिले में इसके भी दो चार सदस्य जीते ही हैं।

दरअसल लंबे समय के बाद भारी बजट और पावर के साथ1991में सक्रिय जिला पंचायतों की मलाई का स्वाद सपा ने चखा। मुलायम सिंह की सरकार के इस कार्यकाल में जिलापंचायतों के अध्यक्ष ज्यादातर मनोनीत हुए थे जिसपर पार्टी के नेताओं की ताजपोशी की गई थी।

इसके बाद कभी सपा,कभी बसपा तो कभी भाजपा ने भी जिलापंचायतों की मलाई का स्वाद चखा। इस चुनाव में दरअसल यह तीनों पार्टियां इसी के दृष्टिगत चुनाव मैदान में उतरी थी और पूरे दमखम से चुनाव लड़ी।

भारी अंतर्विरोध के बावजूद बीजेपी के विधायक और सांसदों ने भी अपने दल के प्रत्याशियों को चुनाव जितवाने में पूरी ताकत झोंक दी थी। कहना न होगा कि राम मंदिर निर्माण भी इस चुनाव में बीजेपी का मुद्दा रहा। सरकारी योजनाएं जो चुनावी लाभ के लिए नहीं होती,उसका भी भरपूर झुनझुनी बजाया गया।

किसानों को दी जाने वाली 2000 रूपये की सम्मान राशि को इस तरह मनमोहक अंदाज में बताया गया मानो इतने पैसे से इसके लाभार्थी दोचार बीघा खेत खरीद लिए हों,बेटे बेटी की पढ़ाई लिखाई, शादी विवाह सब संपन्न कर लिए हों।

आवास,हैंडपंप, शौचालय तथा रेवड़ियों की तरह पशुविहीन लोगों को 50 हजार रूपए की लागत से बनाकर समर्पित किए गए गौशालयों के नाम पर भी वोट मांगे गए लेकिन इनमें से एक भी बहुत कारगर सिद्ध नहीं हुआ।

देखा जाय तो अपेक्षाकृत इसका नुकसान ही हुआ क्योंकि इन सरकारी योजनाओं के आवंटन में अपने लोगों के उपकृत करने की होड़ में जरूरतमंदों की जमकर अनदेखी हुई।

प्रदेश में कुल3051जिलापंचायतों के सदस्य पद के चुनाव हुए। वेशक बीजेपी सपा बसपा व अन्य से आगे है लेकिन 75 में से 6-7 जिलों को छोड़कर कहीं भी अपने दम पर जिलापंचायत अध्यक्ष तय करने की स्थिति में नहीं है।

सपा ने इस चुनाव में जातीय समीकरण पर ध्यान देकर उम्मीदवार तय किए जिसमें कि वह पारंगत है।सपा को अपने इस परंपरागत फार्मूले का भरपूर लाभ मिला।

बीजेपी की तमाम जगह सपा के उम्मीदवारों के नाम को घसीटकर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश भी नाकाम हुई। देखा जाय तो तमाम सीटों पर बीजेपी को इसका सीधा नुकसान हुआ।

तमाम जगहों पर संगठन,सांसद और विधायकों में उम्मीदवार को लेकर गजब की मतभिन्नता दिखी,जिससे भी बीजेपी का नुकसान हुआ।उदाहरण के लिए सिद्धार्थ नगर जिले के पंचायत चुनाव के परिदृश्य को देखा जा सकता है।

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यहां कई सीटों पर पार्टी के अलग और सांसद विधायकों के अपने उम्मीदवार मैदान में देखे गए।जिले के एक वार्ड से पूर्व जिलाध्यक्ष वृजबिहारी मिश्र की पुत्रवधू उस एक अचर्चित चेहरे से चुनाव हार गईं जिसने सांसद जगदंबिका पाल का पोस्टर लगाकर चुनाव लड़ा,वहीं इसी जिले में योगी सेवक,हिंदू युवा वाहिनी के युवा नेता व पूर्व जिलापंचायत सदस्य अजय सिंह की मां संतोष सिंह वोटों के ध्रुवीकरण के चक्कर में कांग्रेस की मुस्लिम महिला से चुनाव हार गई।

पहले ये बीजेपी की उम्मीदवार थीं,बाद में पार्टी ने इन्हें बदलकर दूसरा उम्मीदवार तय कर दिया। बीच चुनाव में यूपी के कई सीटों पर इसतरह हुए फेरबदल का नुकसान भी पार्टी को उठाना पड़ा।

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जिला पंचयत चुनाव में शिकस्त होता देख बीजेपी के स्थानीय नेता जोरजबरदस्ती का फार्मूला भी अपनाने से बाज नहीं आए।महराजगंज जिले में निर्वाचित सपा समर्थित उम्मीदवार अमरनाथ साहनी को जीत के बाद भी प्रमाण पत्र देने में काफी बिलंब किया गया। स्थानीय बीजेपी नेताओं के दबाव में अधिकारी भी थे।

जिलापंचायत सदस्य के 3051सीटों पर हुए चुनाव पर नजर डालें तो बीजेपी और सपा से कड़े मुकाबले के बीच निर्दलीयों की बढ़त शानदार रही। इसमें सभी दलों के बागी उम्मीदवार शामिल है।इनकी संख्या करीब 700 के करीब है और अनुपात के हिसाब से देखें तो हर जिले में ये 8 से 10 की संख्या में हैं। अमूमन 30 से 45 सदस्यों वाले जिलापंचायत सदन में ये निर्दलीय सदस्य जिला पंचायत अध्यक्षों के चयन में निर्णायक भूमिका निर्वहन करेंगे।

अब बारी है जिला पंचायत अध्यक्षों के चयन की। बताने की जरूरत नहीं कि मलाईदार यह अध्यक्ष पद खरीदफरोख्त के जरिए ही हासिल हो पाता है। एक एक सदस्यों की बोली दस से पचास लाख तक में लगती है।

उम्मीद थी कि इस बार यदि बीजेपी के दावे के मुताबिक जिलापंचायतों के चुनाव में इनका बेहतर प्रदर्शन रहा तो इस पद की खरीदफरोख्त पर थोड़ा विराम लगेगा लेकिन चुनाव परिणाम के बाद इस उम्मीद पर ही विराम लग गया।

जिला पंचायत का यह चुनाव परिणाम 2021के विधानसभा चुनाव पर क्य असर डालता है, इस पर फिर कभी लेकिन अभी तो इतना ही कि बीजेपी के लिए यह चुनाव यदि लिटमस टेस्ट था तो निस्संदेह उसके लिए खतरे की घंटी है।

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