Thursday - 21 November 2019 - 7:21 AM

सुप्रीम कोर्ट ने कैसे सभी को दुलराया, चुनौतीपूर्ण फैसले की शानदार मिसाल

केपी सिंह

संवेदनशील और जटिल अयोध्या विवाद पर संतुलित फैसला सुनाना देश के उच्चतम न्यायालय के लिए उसके इतिहास में सबसे बड़ी चुनौती के रूप में था। उच्चतम न्यायालय ने उसे बखूबी निभाया। उसने सभी पक्षों को सहलाने की कामयाब कोशिश की है। भले ही कुछ लोग इस फैसले से सहमत न हों लेकिन यह माना जाना चाहिए कि ऐसे लोगों के सामने उनके अस्तित्व का प्रश्न है जिसकी वजह से खिन्न और अप्रसन्न होने का दिखावा करना उनकी मजबूरी है। विवाद के इस घनघोर जिन्न को हमेशा के लिए दफन करना जरूरी था और सुप्रीम कोर्ट के फैसले में इस जिम्मेदारी को जिस कीमियांगीरी के साथ पूरा किया गया है उससे बेहतर कुछ हो नही सकता था।

रिटायरमेंट के 8 दिन पहले सुनाया फैसला

उच्चतम न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस तरुण गोगोई ने 17 नवंबर को होने जा रहे अपने रिटायरमेंट के 8 दिन पहले शनिवार को यह फैसला सुनाते हुए अयोध्या की पूरी विवादित 2.77 एकड़ जमीन रामजन्म भूमि न्यास को सौपने की घोषणा करके जहां हिंदुओं की आस्था को तृप्त कर दिया। वहीं उन्होंने विवादित स्थान पर बाबर द्वारा मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के थ्योरी को लेकर कहा कि इस बारे में एएसआई कोई प्रमाण नही दे सकी है।

फैसले में दिखाई गजब की सूझबूझ

उच्चतम न्यायालय ने फैसला लिखने में गजब की सूझबूझ दिखाई। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाये जाने की थ्योरी को दरकिनार करके उच्चतम न्यायालय ने दोनों कौमों के बीच बिगाड़ के एक बड़े आधार को खत्म कर दिया तो इस बात को भी मान्यता प्रदान कर दी कि विवादित स्थल को हिंदू सदियों से रामजन्म भूमि को स्थान मानते हैं इसीलिए वहां प्राचीन काल से मंदिर निर्मित था। बाबरी मस्जिद जहां बनी वहां नीचे यही मंदिर दफन पाया गया।

आस्था पर नही, कानून के हिसाब से दर्ज किया गया फैसला

जस्टिस गोगोई ने इस बात पर बल दिया कि इन तथ्यों के बावजूद यह याद रखा जाना चाहिए कि न्यायालय ने किसी की आस्था और विश्वास के लिए फैसला नही बनाया, उसका फैसला कानून की कसौटियों के अनुरूप है। इसके लिए उन्होंने हवाला दिया कि एएसआई को विवादित स्थल पर खुदाई में कोई इस्लामिक अवशेष नही मिला। वहां पहली बार नमाज पढ़े जाने का साक्ष्य 1856 में मिलता है जो अत्यंत परवर्ती है। हिंदू उस स्थान पर पहले भी पूजा करते थे और इसके बाद भी पूजा करते रहे और अपने इस अधिकार के लिए लड़ते रहे।

बाबरी मस्जिद गिराने को कहा गलत

इस तरह उन्होंने इस स्थान पर हिंदुओं के दावे को स्वीकृत करना पूरी तरह तार्किक सिद्ध किया लेकिन 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को गिराने के कृत्य को गैरकानूनी बताने से भी आला अदालत नही चूकी। फैसले के कुछ और उल्लेखनीय पहलुओं में यह भी शामिल है कि उच्चतम न्यायालय ने रामलला की ओर से जन्म भूमि स्थान को ही न्यायिक व्यक्ति के रूप में स्वीकार करने का आग्रह ठुकरा दिया जो कि एक गलत नजीर स्थापित करना होता। इसी बजाय रामलला को न्यायिक व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जो पहले से प्रचलित न्यायिक सिद्धांत के अनुरूप है।

मध्यस्थों को सराहा

इसी तरह उसने समझौते के जरिये मामले को निपटाने में सहयोग देने वाली मध्यस्थता समिति के प्रयासों को भी नही भुलाया। इसमें शामिल रहे जस्टिस कलीफुल्ला, श्रीराम पंचू और श्री श्री रविशंकर को जस्टिस गोगोई ने सराहा और कहा कि वे काफी हद तक समझौते के करीब पहुंच गये थे।

1045 पन्नों के फैसले का 45 मिनट में सुनाया सार संक्षेप

अयोध्या विवाद की सुनवाई करने वाली संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश जस्टिस गोगोई के अलावा जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल थे। 40 दिन तक इस पीठ ने सुनवाई की। पीठ ने 1045 पन्नों में फैसला लिखा। जिसमें हर नुक्ते का जबाव देने की कोशिश की गई। आज जस्टिस गोगोई ने 45 मिनट में इसका सार संक्षेप सुना दिया।

माहौल दुरुस्त बनाये रखने की कवायद रही सराहनीय

जजों के रुख से भाजपा और संघ ने पहले ही मुकदमें की परिणति को भांप लिया था। लेकिन जब राम जन्म भूमि मंदिर निर्माण आंदोलन चल रहा था तब उन्होंने कितनी भी आक्रमकता दिखाई हो पर अब जबकि वे ही सरकार में हैं तो उन्होंने इसके अनुरूप पूरा बड़प्पन और गरिमा दिखाते हुए इस बात का ख्याल रखा कि कोई पक्ष इससे आहत न हो। कई दिन पहले से इसके लिए माहौल बनाने की मशक्कत की गई।

जिलों-जिलों में प्रशासन के माध्यम से पीस कमेटी की बैठकें बुलाकर लोगों को समझाया गया। भाजपा के बयानवीर नेताओं पर लगाम लगाई गई और हिदायत जारी की गई कि अयोध्या के फैसले पर भाजपा का कोई नेता और कार्यकर्ता खुशी और जश्न मनाने का काम नही करेगा और साथ ही बयान देने में पूरा संयम बरतेगा। इस तैयारी का काफी लाभ मिला और फैसले के समय तनावपूर्ण माहौल की हर आशंका विफल हो गई।

संघ प्रमुख के बयान में झलकी आश्वस्ति

इस बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बहुत ही शानदार प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह फैसला न किसी की हार है न किसी की जीत है। उनसे पूंछा गया कि क्या अब संघ मथुरा और काशी के लिए भी आंदोलन करेगा। उनका जबाव था कि संघ मनुष्य निर्माण का काम करता है और वही करता रहेगा। उसका काम आंदोलन करना नही है। राम मंदिर आंदोलन में उसके शामिल होने के पीछे कुछ ऐतिहासिक कारण थे इसे अपवाद माना जाना चाहिए।

संघ प्रमुख इसके पहले मंच से माब लिचिंग में शामिल पाये जाने पर स्वयं सेवकों को संघ से बाहर करने की चेतावनी दे चुके हैं। संघ का यह रवैया स्वागत के योग्य है। जिम्मेदारी मिलने के बाद बड़प्पन आ जाना अच्छे संस्कार की निशानी है। संघ का वर्तमान में समन्वयवादी दृष्टिकोण इसका उदाहरण है। उम्मीद है कि हिंदुत्व के नाम पर जो अराजक संगठन संघ से जुड़ने की कोशिश करते रहते हैं संघ अब उनसे अपना दामन बचाये रखने के लिए सतर्कता दिखायेगा।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, लेख उनके निजी विचार हैं)

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