अंतरिक्ष: भारत की स्काईरूट एयरोस्पेस ने रचा इतिहास, निजी क्षेत्र में तीसरी वैश्विक ताकत बना भारत

ओम दत्त

18 जुलाई 2026 को भारतीय स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट ने अपनी पहली उड़ान में सफलता हासिल की, जिससे भारत निजी कक्षीय प्रक्षेपण क्षमता वाला दुनिया का तीसरा देश बन गया, वहीं NASA ने अपनी पुरानी स्विफ्ट वेधशाला को बचाने के लिए एक अनूठा बचाव मिशन पूरा किया।
स्काईरूट एयरोस्पेस, जो भारत की अग्रणी निजी अंतरिक्ष कंपनियों में से एक है, ने अपने विक्रम-1 रॉकेट का पहला प्रक्षेपण सफलतापूर्वक पूरा किया।
इस उपलब्धि के साथ भारत अब अमेरिका और न्यूजीलैंड के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा देश बन गया है जहाँ किसी निजी कंपनी ने कक्षा में उपग्रह पहुंचाने की क्षमता हासिल की है।
इसी दौरान, NASA और Katalyst Space Technologies ने मिलकर 3 जुलाई को “स्विफ्ट रेस्क्यू मिशन” लॉन्च किया, जिसका मकसद NASA की नील गेह्रेल्स स्विफ्ट वेधशाला को ऊंची कक्षा में पहुंचाकर उसे बचाना था, क्योंकि यह वेधशाला धीरे-धीरे पृथ्वी के वायुमंडल में गिरने की ओर बढ़ रही थी।
NASA अपने LOXSAT मिशन को भी लॉन्च करने की योजना बना रहा है, जो क्रायोजेनिक तरल प्रबंधन तकनीक का प्रदर्शन करेगा — यह तकनीक भविष्य में चंद्रमा और मंगल मिशनों के लिए अहम होगी। इसके अतिरिक्त, NASA ने भविष्य के चंद्र और मंगल अन्वेषण के लिए 41 नई अंतरिक्ष तकनीकों का चयन किया है।
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर NASA अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन रूस के सोयुज़ MS-29 यान से 14 जुलाई को पहुंचे, और इस समय स्टेशन पर NASA, रोसकॉसमॉस और ESA के दस अंतरिक्ष यात्री मौजूद हैं। दूर अंतरिक्ष में, चीन के तियानवेन-2 यान ने निकट-पृथ्वी क्षुद्रग्रह कामोआलेवा पर पहुंचकर नमूना संग्रह शुरू किया, जबकि जापान के हायाबुसा-2 यान ने क्षुद्रग्रह तोरिफुने के करीब से उड़ान भरी।
स्काईरूट की यह उपलब्धि भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है। यह दर्शाता है कि भारत अब सिर्फ सरकारी अंतरिक्ष एजेंसी (ISRO) पर निर्भर नहीं, बल्कि निजी कंपनियां भी वैश्विक स्तर की अंतरिक्ष तकनीक विकसित करने में सक्षम हैं — जो आने वाले वर्षों में लागत घटाने, नवाचार तेज़ करने और वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण बाज़ार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद करेगा। NASA का स्विफ्ट बचाव मिशन दिखाता है कि पुराने, महंगे अंतरिक्ष उपकरणों को नष्ट होने देने के बजाय उन्हें बचाने की नई तकनीकें विकसित हो रही हैं, जो भविष्य में अंतरिक्ष मलबे और लागत प्रबंधन के लिए मॉडल बन सकती हैं।
देश में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के विकास से रोज़गार के नए अवसर बनेंगे, खासकर इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्रों में। सस्ते और स्थानीय प्रक्षेपण विकल्प उपलब्ध होने से भारत की उपग्रह-आधारित सेवाएं — जैसे मौसम पूर्वानुमान, संचार, और कृषि निगरानी — और सस्ती व बेहतर हो सकती हैं। दीर्घकाल में, यह भारत को वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर सकता है।
अंतरिक्ष उद्योग विश्लेषकों ने स्काईरूट की उपलब्धि को भारत के “स्पेसएक्स पल” के रूप में वर्णित किया है, जो दर्शाता है कि निजी निवेश और सरकारी समर्थन का संयोजन तेज़ी से नवाचार ला सकता है। NASA के वैज्ञानिकों ने स्विफ्ट बचाव मिशन को “अंतरिक्ष संपत्तियों के जीवनकाल को बढ़ाने वाला अभूतपूर्व प्रयास” बताया है।
आने वाले महीनों में स्काईरूट और अन्य भारतीय निजी अंतरिक्ष कंपनियां और प्रक्षेपण करने की योजना बना सकती हैं, जिससे भारत की वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण बाज़ार हिस्सेदारी बढ़ सकती है। तियानवेन-2 और हायाबुसा-2 जैसे मिशनों से आने वाले क्षुद्रग्रह डेटा से सौरमंडल की उत्पत्ति को समझने में नई जानकारी मिल सकती है।

