Saturday - 31 July 2021 - 11:58 PM

पृथ्वी की ओर आ रहा है सौर तूफान, प्रभावित हो सकते…

जुबिली न्यूज डेस्क

पृथ्वी की ओर एक भयंकर सौर तूफान 16 लाख किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ रहा है। यह तूफान सूरज की सतह से उठा है।

मौसम की वेबसाइट स्पेसवेदर.कॉम के अनुसार सूर्य के वायुमंडल से उत्पन्न सौर तूफान का धरती के चुंबकीय क्षेत्र के प्रभुत्व वाले अंतरिक्ष के क्षेत्र पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।

स्पेसवेदर.कॉम के अनुसार पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र पर सौर तूफान का गहरा असर पड़ सकता है। इससे रात में आसमान रौशनी से जगमगा उठेगा। यह नजारा उत्तर या दक्षिणी ध्रुव पर दिखेगा।

वहीं अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा का अनुमान है कि यह तूफान 16 लाख किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार चल रहा है और आगे इसकी रफ्तार और अधिक बढ़ सकती है।

नासा ने अपने बयान में कहा कि सौर तूफान से सैटेलाइट सिग्नल बाधित हो सकते हैं।

सौर तूफान का पृथ्वी पर प्रभाव

स्पेसवेदर.कॉम के अनुसार सौर तूफान के कारण धरती का बाहरी वातावरण को गर्म हो सकता है, जिसका सीधा असर उपग्रहों पर पड़ सकता है।

यह जीपीएस नेविगेशन, मोबाइल फोन सिग्नल और सैटेलाइट टीवी को प्रभावित कर सकता है। सौर तूफान के कारण बिजली लाइनों में करंट अधिक पैदा हो सकता है, जिससे ट्रांसफार्मर भी उड़ सकते हैं।

साल 1859 में सबसे पहला सौर तूफान रिकॉर्ड किया गया था। साल 1972 में एक बड़े तूफान ने अमेरिका के मध्य पश्चिमी राज्यों में टेलीफोन लाइनों को अस्त व्यस्त कर दिया था तो 1989 में इसी तरह के तूफान से बिजली की लाइनें खराब हो गईं और कनाडा के क्यूबेक इलाके में परेशानी हुई, लेकिन सूरज के तूफानों के धरती पर असर के बारे में वैज्ञानिकों को पिछली दशकों में ही पता चला है।

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कैसे आता है सौर तूफान

सूरज के केंद्र में हाइड्रोजन कणों के बीच न्यूक्लियर रिएक्शन होता है जिससे वे हीलियम बन जाते हैं और सूरज में रोशनी इसी तरह पैदा होती है।

सोलर मिनिमम में सूरज काफी स्थिर रहता है और उसकी सतह पर तूफान नहीं आते, लेकिन इसके उलट मैक्सिमम के दौरान सूरज की सतह पर काले दाग बन जाते हैं जिसकी वजह से उसके चुंबकीय क्षेत्रों में भारी बदलाव आता है। नतीजतन सौर तूफान पैदा होते हैं।

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सौर तूफान या फ्लेयर की जानकारी वर्ष 1859 से ही है। उस समय ब्रिटिश खगोलविज्ञानी रिचर्ड कैरिंगटन ने एक सौर तूफान की खोज की। माना जाता है कि उस समय सूरज से जो ऊर्जा निकली, वह हिरोशिमा के 10 अरब एटम बमों के फटने के बराबर थी। उस समय इससे अधिक फर्क नहीं पड़ा क्योंकि धरती पर इतनी टेलीफोन लाइनें नहीं थीं, लेकिन आज स्थिति अलग हो सकती है क्योंकि लंबे समय तक बिजली न होने से काफी दिक्कत आ सकती है।

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