Sunday - 15 December 2019 - 12:27 AM

संस्कृत को खतरा फिरोज खान से नहीं “पाखंडियों” से

राजीव ओझा

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में संस्कृत विभाग में एक मुस्लिम प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर बेवजह का विवाद खड़ा हो गया है। यहाँ हिन्दू आचरण की बात करने वालों की आँखों पर अज्ञानता की पट्टी बंधी है। नियुक्ति को लेकर गतिरोध जारी है और बीएचयू प्रशासन ने चुप्पी साध राखी है। यह भी कह सकते हैं की विवाद

नहीं नेतागिरी हो रही है। जो छात्र इसका विरोध कर रहें हैं लगता है उन्हें संस्कृत और संस्कृति के बारे में नहीं पता है। यह भी नहीं पता है कि भाषा, धर्म के आधार पर नहीं तय होती और न बोली जाती है।

सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर समाज दो खेमो में बंटा हुआ दिखा रहा है। ट्विटर पर यह मुद्दा ट्रेंड कर रहा है। सोशल मीडिया मंच पर जो तर्क या फिर कुतर्क दिए जा रहें हैं उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सोशल मीडिया के अधिकांश ज्ञानी वास्तव में अज्ञानी हैं। जिन्हें फ़िरोज़ खान से संस्कृत समझने और पढने में दिक्कत है उन्हें वास्तव में इस देश की संस्कृति की समझन नहीं है।

संस्कृत विद्याधर्म संकाय हो या संस्कृत भाषा पढ़ने का विभाग, जो संस्कृत का विद्वान है उसे हिन्दू समाज और धर्म के आचरण का भी उतना ही ज्ञान होता है जितना भाषा का। महामना की आड़ में जो लोग धर्म के अनुरूप आचरण की बात कर रहे, वह वास्तव में राजनीति कर रहे। संस्कृत के नाम पर एक विद्वान मुस्लिम प्रोफ़ेसर का विरोध करने वाले वास्तव में पाखंडी हैं।

अयोध्या में राम जन्मभूमि के पक्ष में एएसआई के केके मोहम्मद अगर संस्कृत के विद्वान न होते तो क्या खुदाई में निकले अवशेषों पर लिखीं इबारत को साक्ष्य के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से रख पाते? विरोध करने वाले छात्रों को न तो फ़िरोज़ खान के परिवार के बारे में पूरी जानकारी है न ही उनकी पिछली पीढ़ियों के आचरण के बारे में पता है।

फिरोज खान के पिता रमजान खान एक गोसेवक हैं, तिलक से उन्हें कोई परहेज नहीं और शानदार भजन गायक हैं। फिरोज खान के दादा भी भजन गाते थे। फिरोज खान के अन्य तीन भाई भी संस्कृत के अच्छे ज्ञाता हैं। ऐसे परिवार से आए फिरोज खान की काबिलियत पर अब सवाल उठाये जा रहे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में पिछले चार साल से ऋषि शर्मा छात्रों को उर्दू पढ़ा रहे हैं। इन चार सालों में किसी ने ऋषि शर्मा का न तो विरोध किया और न ही किसी तरह का सवाल खड़ा हुआ।

कहा जाता है की मुस्लिम समाज में शिक्षा, तालीम की बजाय धर्म पर अधिक फोकस रहता है। इसी कारण मुसलमान समाज की मुख्य धारा में नहीं आ पाते और पिछड़ जाते हैं। अब जब कोई मुसलमान शिक्षा और अपनी काबिलियत के बूते आगे बढ़ना चाहता है तो कुछ पाखंडी या राजनीति करने वाले उसकी टांग खींचने लगते हैं। प्रोफेसर फिरोज खान का पूरा परिवार संस्कृत और संस्कृति का वाहक है। जिस फिरोज खान के परिवार की तीन पीढ़ियाँ हिन्दू समाज के बीच रह कर ही पली बढी हों जिसके परिवार में हिन्दू संस्कार रचे बसे हों, उसके लिए कहा जा रहा कि वह संस्कृत धर्म विज्ञान नहीं पढ़ा सकता। इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है।

संस्कृत के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर फिरोज खान नहीं, भाषा के नाम पर राजनीति करने वाले छात्र बीएचयू और महामना के उद्देश्यों और संस्कृत जैसी समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा को असली नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन्हें केके मोहम्मद, केरल में संस्कृत में पीएचडी करने वाली पहली महिला स्कॉलर डॉ खदीजा और डॉ अब्दुल रहमान जैसे संस्कृत के विद्वान की काबिलियत नजर नहीं आती, इन्हें नजर आता है सिर्फ धर्म। शिक्षा के मंदिर में हिन्दू-मुस्लिम करने वाले इन दकियानूसों से ही संस्कृत और धर्म आचरण, दोनों को खतरा है डॉ फिरोज खान जैसे स्कॉलर से नहीं। क्या फर्क पड़ता है कि हमे हिन्दू पढ़ा रहा है या मुसलमान| पढ़ा कैसा कैसा रहा है, इससे जरूर फर्क पड़ सकता है। किसी विद्वान की जाति और धर्म देखना सिर्फ मूर्खता है।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, लेख उनके निजी विचार हैं)

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