ईरान में उमड़ेगी करोड़ों की भीड़! अयातुल्ला खामेनेई की आखिरी रस्में आज से शुरू; जानें इस्लाम में कैसे तय होता है जिंदगी का ‘आखिरी सफर’

ईरान के मरहूम रहबर-ए-आला (सुप्रीम लीडर) आयतुल्ला अली खामेनेई की सुपुर्द-ए-खाक की रस्में आज से शुरू हो रही हैं। तेहरान से लेकर मशहद तक कई दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक और मजहबी सफर पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं। ईरानी हुकूमत के मुताबिक, तेहरान में आखिरी दीदार के बाद 9 जुलाई को उन्हें मशहद में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।

इस बड़े वाकिये के बीच, बहुत से लोगों के जेहन में यह जिज्ञासा है कि आखिर ‘सुपुर्द-ए-खाक’ क्या होता है और इस्लाम में अंतिम विदाई की पूरी प्रक्रिया क्या है? आइए जानते हैं इसके नियम और परंपराएं।

‘सुपुर्द-ए-खाक’ फारसी और उर्दू का एक बेहद मुकद्दस लफ्ज है, जिसका सीधा मतलब होता है— ‘मिट्टी के हवाले करना’। इस्लाम में किसी शख्स के इंतकाल (निधन) के बाद उसके पार्थिव शरीर को पूरे अदब और एहतराम के साथ दफन करने की रस्म को सुपुर्द-ए-खाक कहा जाता है। इसे महज एक रस्म नहीं, बल्कि हर मुसलमान के लिए एक जरूरी मजहबी फर्ज (फर्ज-ए-किफाया) माना गया है।

इस्लाम के मुताबिक, इंसान के दुनिया से जाने के बाद उसके शरीर को बेहद पवित्रता के साथ विदा किया जाता है। इसके मुख्य चार चरण होते हैं:

इंतकाल के बाद सबसे पहले मरहूम के जिस्म को शरीअत के मुताबिक साफ पानी से नहलाया और पाक किया जाता है। इस अमल को ‘गुस्ल’ कहते हैं। इसका मकसद यह होता है कि इंसान अपने पैदा करने वाले (अल्लाह) के हुजूर में पूरी तरह पाक-साफ होकर पेश हो।

गुस्ल के बाद शरीर को बिना सिले, सादे सफेद सूती कपड़े में लपेटा जाता है, जिसे ‘कफन’ कहा जाता है। इस्लाम में अमीर और गरीब दोनों के लिए एक जैसा ही सादा कफन होता है। इसमें किसी भी तरह की सजावट या दिखावे की सख्त मनाही है।

कफन पहनाने के बाद शव को किसी खुली जगह, मैदान या ईदगाह में रखा जाता है, जहां समाज के लोग इकट्ठा होकर ‘जनाजे की नमाज’ पढ़ते हैं। यह नमाज आम दिनों की नमाजों से बिल्कुल अलग होती है, क्योंकि इसमें ‘रुकू’ और ‘सज्दा’ नहीं होता। इसमें खड़े होकर मरहूम के गुनाहों की माफी (मगफिरत) और जन्नत में ऊंचे मुकाम के लिए सामूहिक दुआ की जाती है।

नमाज के बाद शव को कब्रिस्तान ले जाया जाता है। इस्लाम में नियम है कि मौत के बाद जितनी जल्दी हो सके, दफन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। कब्र में शव को दाहिनी करवट (Right Side) पर इस तरह लिटाया जाता है कि उसका चेहरा मक्का शरीफ (किबला) की तरफ रहे। इसके बाद वहां मौजूद लोग तीन-तीन मुट्ठी मिट्टी कब्र में डालते हैं।

  • क्या रात के वक्त दफन किया जा सकता है? जी हां, इस्लामी तालीमात के मुताबिक अगर बहुत जरूरी हो तो रात के वक्त भी सुपुर्द-ए-खाक किया जा सकता है। हालांकि, बेहतर इंतजाम और आसानी के लिए दिन के वक्त दफन करना ज्यादा मुफीद माना जाता है।
  • कब्र के भीतर कौन उतर सकता है? नियमों के मुताबिक, शव को कब्र में उतारने के लिए मरहूम के बेटे, भाई, पिता या अन्य करीबी रिश्तेदार (जिन्हें महरम कहा जाता है) ही उतरते हैं। अगर करीबी न हों, तो कब्रिस्तान के अनुभवी लोग यह जिम्मेदारी निभाते हैं।
  • कब्र पर फूल चढ़ाने की क्या रिवायत है? इस्लाम की बुनियादी रस्मों में कब्र पर फूल या चादर चढ़ाना शामिल नहीं है। हालांकि, दुनिया के कई देशों और स्थानीय संस्कृतियों में लोग सम्मान और मोहब्बत के तौर पर कब्र पर गुलाब की पंखुड़ियां बिखेरते हैं, जिसे स्थानीय परंपरा (रिवायत) माना जाता है।
  • कब्र पर जाने का क्या नियम है? इस्लाम में कब्रिस्तान जाने या अपने प्रियजनों की कब्र पर दुआ करने के लिए कोई खास दिन या तारीख तय नहीं है। कोई भी शख्स अपनी सहूलियत के हिसाब से कभी भी कब्रिस्तान जाकर मरहूम के लिए ‘दुआ-ए-मगफिरत’ कर सकता है।

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