TMC में बड़ा सियासी संकट! 3 मुस्लिम सांसद भी छोड़ सकते हैं ममता बनर्जी का साथ

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress (टीएमसी) के लिए राजनीतिक संकट लगातार गहराता नजर आ रहा है। पार्टी के भीतर बगावत की खबरों के बीच अब दावा किया जा रहा है कि लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा तक असंतोष फैल चुका है। सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी से अलग हुए 20 में से 19 लोकसभा सांसदों ने 18 मई को लोकसभा स्पीकर को अलग संसदीय गुट बनाने का प्रस्ताव भेजा था।

सूत्रों के अनुसार बागी सांसदों के समूह में तीन मुस्लिम सांसद भी शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें Yusuf Pathan (बहरामपुर), Khalilur Rahaman (जंगीपुर) और Abu Taher Khan (मुर्शिदाबाद) के नाम सामने आए हैं।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ये सांसद भविष्य में नई राजनीतिक दिशा अपना सकते हैं, हालांकि इस संबंध में संबंधित नेताओं की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

बताया जा रहा है कि लोकसभा स्पीकर को भेजे गए पत्र में कई प्रमुख सांसदों के नाम शामिल हैं। इनमें Kakoli Ghosh Dastidar, Shatabdi Roy, Bapi Haldar, Sharmila Sarkar, Prasun Banerjee, Rachna Banerjee, Sayoni Ghosh, Deepak Adhikari, June Malia समेत कई अन्य सांसदों के नाम शामिल होने का दावा किया जा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, पत्र भेजे जाने के समय काकोली घोष दस्तीदार पार्टी की चीफ व्हिप थीं। बाद में टीएमसी ने लोकसभा स्पीकर को नया पत्र भेजकर Kalyan Banerjee को नया चीफ व्हिप नियुक्त किए जाने की जानकारी दी।

इससे पहले राज्यसभा में भी टीएमसी को कई बड़े झटके लग चुके हैं।

  • Sukhendu Sekhar Ray ने राज्यसभा और पार्टी दोनों से इस्तीफा दिया।
  • Sushmita Dev ने भी संसद और पार्टी छोड़ने का फैसला किया।
  • Prakash Chik Baraik ने राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा सौंप दिया।

इन इस्तीफों के बाद पार्टी नेतृत्व पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार पश्चिम बंगाल विधानसभा में भी टीएमसी के कई विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं। बागी गुट का नेतृत्व Ritabrata Banerjee कर रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि बड़ी संख्या में विधायक अलग गुट के साथ खड़े हैं और विधानसभा में नई राजनीतिक स्थिति बन रही है।

Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली टीएमसी पिछले 15 वर्षों से पश्चिम बंगाल की सत्ता में है। लेकिन हालिया घटनाक्रमों ने पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और संगठनात्मक चुनौतियों को उजागर कर दिया है। यदि सांसदों और विधायकों की नाराजगी जारी रहती है, तो इसका असर पार्टी की राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय राजनीति पर पड़ सकता है।

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