मिडिल ईस्ट में महायुद्ध के बीच ईरान का पाकिस्तान को फोन, USA की ‘नीयत’ पर उठाए गंभीर सवाल

इस्लामाबाद/तेहरान। मिडिल ईस्ट में मचे युद्ध के कोहराम के बीच अब कूटनीतिक मोर्चे पर भी बड़ी हलचल शुरू हो गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष इशाक डार से फोन पर लंबी चर्चा की, जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर अमेरिका की मंशा और साख पर सवाल उठाए। अराघची ने दो टूक शब्दों में कहा कि वॉशिंगटन का ‘भरोसा तोड़ने का इतिहास’ बातचीत की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है।
ईरान का आरोप: “कूटनीति नहीं, धमकी दे रहा है अमेरिका”
ईरानी विदेश मंत्री ने पाकिस्तान के साथ बातचीत में उन कड़वे अनुभवों को साझा किया, जो पिछले एक साल में ईरान ने झेले हैं। उन्होंने विशेष रूप से मार्च और जून 2025 की घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि जब पर्दे के पीछे बातचीत जारी थी, ठीक उसी समय अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की थी।
अराघची के संबोधन के मुख्य बिंदु
- अस्पष्ट मांगें: अमेरिका अपनी मांगों को बार-बार बदल रहा है, जो कूटनीति की गंभीरता को कम करता है।
- सीजफायर का उल्लंघन: हालिया घटनाओं ने साबित किया है कि अमेरिका शांति समझौतों का सम्मान नहीं कर रहा है।
- बंदरगाहों पर खतरा: ईरान के तटीय इलाकों और व्यापारिक जहाजों को दी जा रही धमकियां अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ हैं।
एक्शन में पाकिस्तान: शहबाज शरीफ का ‘शांति मिशन’
ईरानी विदेश मंत्री की इशाक डार से बातचीत के साथ ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से फोन पर संपर्क साधा। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की वार्ता की सुगबुगाहट तेज है।
शांति के लिए गोलबंदी: शहबाज शरीफ ने राष्ट्रपति पेजेशकियान को विश्वास में लेते हुए बताया कि पाकिस्तान इस मुद्दे पर सऊदी अरब, कतर और तुर्किए के शीर्ष नेतृत्व के साथ निरंतर संपर्क में है। पाकिस्तान की कोशिश है कि क्षेत्र में मुस्लिम देशों का एक साझा मंच तैयार किया जाए, जो स्थायी शांति के लिए अमेरिका और ईरान के बीच एक मजबूत सेतु का काम कर सके।
विशेषज्ञों की राय: क्या सफल होगी दूसरे दौर की बातचीत?
कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि ईरान ने पाकिस्तान के जरिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संदेश दिया है कि वह बातचीत के खिलाफ नहीं है, लेकिन अमेरिका की ‘दोहरी नीति’ समझौते की संभावनाओं को खत्म कर रही है। ईरान अब क्षेत्रीय शक्तियों (सऊदी अरब, तुर्किए) को गवाह बनाकर अपनी शर्तों पर आगे बढ़ना चाहता है।
मिडिल ईस्ट की जंग अब केवल मिसाइलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें अब ‘ईमानदारी और नियत’ की लड़ाई भी जुड़ गई है। पाकिस्तान की मध्यस्थता और ईरान के कड़े तेवर ने अमेरिका पर दबाव बढ़ा दिया है।


