लोक-कल्याणकारी योजनाएं बनाम शैक्षिक निवेश: युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक अनिवार्य संतुलन

भारत वर्तमान में एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर जहाँ हम विश्व की एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी जनसांख्यिकीय लाभांश का पूरा लाभ उठाने की चुनौती हमारे सामने है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति की आधारशिला उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है।

भारत में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6% खर्च करने का संकल्प कोई नया नहीं है; यह 1964 के कोठारी आयोग से लेकर 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति तक एक निरंतर मांग रही है। हालांकि, कड़वी सच्चाई यह है कि आज भी हमारा वास्तविक खर्च जीडी पी के 3% के आसपास ही टिका हुआ है। इस विफलता का एक बड़ा कारण सरकार द्वारा लोकलुभावन या ‘मुफ्त’ योजनाओं पर बढ़ता भारी खर्च है, जो दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे के विकास को बाधित कर रहा है।

  1. मुफ्तखोरी की राजनीति और शिक्षा का संकट

    भारत में ‘रेवड़ी संस्कृति’ या “ मुफ्त संस्कृति “, “ फ्रीबीज संस्कृति ‘ हाल के वर्षों में एक गंभीर बहस का विषय बन गई है। चुनाव जीतने के लिए मुफ्त बिजली, पानी, नकद हस्तांतरण और अन्य लोकलुभावन वादे किए जाते हैं। यद्यपि सामाजिक न्याय के लिए गरीबों की सहायता आवश्यक है, लेकिन जब यह व्यय विकास के प्राथमिक क्षेत्रों जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट को कम करने लगता है, तो यह देश के भविष्य के साथ समझौता होता है।

    शिक्षा पर निवेश को अक्सर ‘उपभोग’ मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह ‘पूंजी निर्माण’ है। जब हम शिक्षा पर खर्च कम करते हैं, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे होते हैं जो कुशल नहीं है, और अंततः वे भविष्य में भी सरकारी सहायता पर ही निर्भर बने रहते हैं। यह एक अंतहीन दुष्चक्र पैदा करता है।
  2. जी डी पी का 6%: एक सपना या हकीकत?

    कोठारी आयोग ने स्पष्ट किया था कि भारत को वैश्विक मानकों तक पहुँचने के लिए शिक्षा पर अपनी आय का कम से कम 6% खर्च करना चाहिए। विकसित देशों या चीन जैसे प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारत का खर्च काफी कम है। वर्तमान में शिक्षा का बजट मुख्य रूप से शिक्षकों के वेतन और प्रशासनिक खर्चों में ही निकल जाता है। अनुसंधान , नवाचार, आधुनिक प्रयोगशालाओं और डिजिटल साक्षरता के लिए बहुत कम धनराशि बचती है।

    जब तक हम 6% (या प्रस्तावित 6.4%) के आंकड़े को नहीं छूते, तब तक सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता निजी स्कूलों के मुकाबले कमतर बनी रहेगी, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई और गहरी होती जाएगी।
  3. सुधार के लिए रणनीतिक सुझाव : इस वित्तीय संकट और गुणवत्ता की कमी को दूर करने के लिए हमें लीक से हटकर सोचने की आवश्यकता है।

    क. ‘मुफ्त’ योजनाओं का युक्तिकरण


    मुफ्त योजनाओं को पूरी तरह बंद करना संभव या उचित नहीं हो सकता, लेकिन उनका लक्षित होना अनिवार्य है। ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ के माध्यम से केवल उन लोगों को सब्सिडी मिलनी चाहिए जो गरीबी रेखा के नीचे हैं। मध्यम वर्ग और संपन्न वर्ग को मिलने वाली गैर-जरूरी मुफ्त सुविधाओं को काटकर उस धन को शिक्षा के बुनियादी ढांचे में झोंकना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि एक बार मुफ्त बिजली देने से बेहतर है कि बच्चे को ऐसी शिक्षा दी जाए कि वह अपनी बिजली का बिल भरने में खुद सक्षम हो सके।

    ख. ‘परिणाम-आधारित’ वित्तपोषण

    अभी तक हमारी सरकारें केवल इस पर ध्यान देती रही हैं कि कितने स्कूल खुले या कितने शिक्षकों की भर्ती हुई। अब समय ‘लर्निंग आउटकम्स’ पर ध्यान देने का है। बजट का आवंटन इस आधार पर होना चाहिए कि छात्रों के सीखने के स्तर में कितना सुधार हुआ। यदि कोई संस्थान बेहतर परिणाम दे रहा है, तो उसे अधिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

    ग. शिक्षा उपकर की पारदर्शिता

    आम नागरिक अपनी आय और सेवाओं पर ‘शिक्षा उपकर’ देता है। कैग की कई रिपोर्टों में यह खुलासा हुआ है कि इस उपकर का हजारों करोड़ रुपया या तो खर्च नहीं होता या फिर किसी और योजना में लगा दिया जाता है। सरकार को एक पृथक ‘शिक्षा कोष’ बनाना चाहिए जिसका ऑडिट सार्वजनिक हो। इस पैसे का उपयोग केवल उच्च शिक्षा के शोध और प्राथमिक स्कूलों के डिजिटल कायाकल्प के लिए होना चाहिए।

    घ. सार्वजनिक-निजी भागीदारी का विस्तार

    सरकार अकेले इस विशाल जनसंख्या को शिक्षित नहीं कर सकती। ‘कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ को शिक्षा से जोड़ना एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है। बड़ी कंपनियों को ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों को गोद लेने के लिए टैक्स छूट दी जानी चाहिए। वे न केवल पैसा लाएंगे, बल्कि प्रबंधन की दक्षता भी लाएंगे।

    च. शिक्षा परिषद की स्थापना

    जी एस टी की सफलता ने दिखाया है कि केंद्र और राज्य मिलकर काम कर सकते हैं। चूंकि शिक्षा समवर्ती सूची में है, इसलिए राज्यों की भागीदारी के बिना 6% का लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। एक राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन होना चाहिए जो राज्यों को उनके शिक्षा बजट बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करे और फंड के वितरण को पारदर्शी बनाए।
  4. तकनीकी नवाचार और संसाधनों का एकीकरण

    बजट की कमी को दूर करने का एक और तरीका कुशल प्रबंधन है। भारत में हजारों ऐसे स्कूल हैं जहाँ छात्रों की संख्या 10 से भी कम है, लेकिन वहां शिक्षक और भवन का खर्च पूरा होता है।
    स्कूल एकीकरण : 5-10 छोटे स्कूलों को मिलाकर एक बड़ा ‘हब स्कूल’ बनाया जाए, जहाँ बस सेवा के माध्यम से बच्चों को लाया जाए। इससे संसाधनों (लैब, लाइब्रेरी, खेल के मैदान) का बेहतर उपयोग होगा।
    डिजिटल शिक्षा: जहाँ विशेषज्ञ शिक्षक नहीं पहुँच सकते, वहां स्मार्ट क्लास और ए आई आधारित शिक्षण के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जा सकती है। इससे प्रति छात्र शिक्षण लागत में कमी आएगी।|
  5. निष्कर्ष: भविष्य की ओर

    शिक्षा में निवेश का फल मिलने में 15-20 साल लगते हैं, जबकि मुफ्त बिजली या अनाज का लाभ तुरंत (और अगले चुनाव में) दिखता है। यही कारण है कि राजनेता शिक्षा पर दीर्घकालिक निवेश करने से कतराते हैं। लेकिन एक राष्ट्र के रूप में हमें यह समझना होगा कि “ सस्ती राजनीति, महंगी शिक्षा”का मॉडल हमें कभी विकसित भारत नहीं बना पाएगा।

    यदि हम जी डी पी का 6.4% शिक्षा पर खर्च करने में विफल रहते हैं, तो हम न केवल अपनी भावी पीढ़ी के साथ अन्याय कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी प्रासंगिकता भी खो रहे हैं। समय आ गया है कि शिक्षा को चुनावी घोषणापत्रों के ‘मुफ्त वादों’ से ऊपर उठाकर एक राष्ट्रीय मिशन’ बनाया जाए।
    “शिक्षा पर किया गया निवेश, सबसे अच्छा ब्याज देता है।”भारत को अब केवल साक्षर नहीं, बल्कि शिक्षित और कुशल बनने की दिशा में ठोस वित्तीय कदम उठाने होंगे।

(लेखक प्रख्यात शिक्षाविद और पूर्व कुलपति कानपुर तथा गोरखपुर विश्वविद्यालय रहे हैं )

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