Saturday - 23 November 2019 - 7:44 AM

छात्रों को चोंगा पहनाकर नकल रोकने का पागलपन

सुरेंद्र दुबे

परीक्षाओं में नकल नहीं होनी चाहिए। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। पर नकल रोकने के नाम पर क्या हम छात्रों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार कर सकते हैं। क्या छात्रों को गत्ते का चोंगा पहनाकर नकल रोकने की बहिशियाना हरकत की इजाजत दी जा सकती है। उत्तर होगा-कदापि नहीं। पर ऐसा हो रहा है तो ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। कर्नाटक की भगत प्री यूनिवर्सिटी में नकल रोकने का एक मामला प्रकाश में आया है जहां छात्रों को कार्टन का चोंगा पहनाया गया, ताकि छात्र इधर-उधर देखकर नकल करने की कोशिश न कर सके। एक नजर में वायरल तस्वीर देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी फिल्म का कोई मजाकू सीन है। पर यह फिल्म नहीं हकीकत है। जिसकी तह में जाने से कई चौकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।

वायरल फोटो देखकर यह पता नहीं चल पा रहा है कि छात्रों को सांस लेने की सुविधा प्रदान करने के लिए कार्टन में कहीं छेद किया गया है कि नहीं। यह नकल रोकने का उपक्रम कम और बहिशियाना ढंग से छात्रों के धैर्य की परीक्षा लेने का मामला ज्यादा दिखता है। छात्र कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते हैं, अब अगर उन्हें इस ढंग से मुंह ढक कर परीक्षा देने को मजबूर किया जा रहा है तो ऐसा लगता है जैसे कॉलेज का प्रबंधन या तो पगला गया है या फिर उसने गुस्से में आकर छात्रों को सजा देने का काम किया है।

अब तस्वीर वायरल होने के बाद कॉलेज प्रबंधन शर्मिंदा होने के बजाए ये सफाई दे रहा है कि बिहार में भी एक कॉलेज ने नकल रोकने के लिए इसी तरह का तरीका इस्तेमाल किया था और इसकी सोशल मीडिया पर खूब तारीफ हुई थी। उसने भी एक नया प्रयोग किया है। हालांकि कर्नाटक के शिक्षामंत्री एस सुरेश कुमार ने इस पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ट्वीट कर इसे अस्वीकार्य बताया है। उन्होंने कहा कि किसी को भी छात्रों के साथ जानवरों जैसा बर्ताव करने का अधिकार नहीं है। इस मामले की जांच की जायेगी।

हम लोगों ने अपने बचपन में देखा होगा कि मरकहा बैल या घोड़े आदि को नियंत्रित करने के लिए उनके मुंह में कपड़ा बांध दिया जाता था और आंखों में पट्टी। इससे ये जानवर बगैर इधर-उधर मुंह मारे सीधे अपने काम में लगे रहते थे। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीर को देखकर लगता है कि किसी इंसान टाइप जानवर ने पुरानी यादों से प्रेरणा लेकर इन छात्रों को बैल व घोड़ों के स्तर पर ला खड़ा किया है। मानवाधिकार का ढिढ़ोरा पीटने वाली कोई भी संस्था अभी तक इस घटना के विरोध में आंदोलित नहीं हुई है।

जबकि कायदे से अब तक इस कॉलेज में पुलिस का छापा पड़ जाना चाहिए था और घटना के लिए दोषी लोगों की चोंगा पहनाकर परेड शुरु हो जानी चाहिए थी। आखिर हम अपनी भविष्य की पीढ़ी को किस बात की सजा दे रहे हैं।

लगता है इस कॉलेज के लोगों ने अभी से अपने छात्रों को मुंह छिपाकर काम करने की ट्रेनिंग देने का बीड़ा उठा लिया है। मुंह छिपाने का काम तो अपराधी करते हैं। कभी समाज के डर से अपराधी स्वयं मुंह छुपाता है तो कभी पुलिस अपराधी का मुंह छुपाकर उसे अदालत में पेश करती है। यहां दोनों में से कोई भी कारण मौजूद नहीं है। नकल हर कीमत पर रोकी जानी चाहिए परंतु इसके लिए छात्रों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार करने की इजाजत कोई भी सभ्य समाज नहीं दे सकता है।

नकल रोकने के लिए छात्रों को जेल भेजे जाने तक के घटिया प्रयोग किए जा चुके हैं। किसी ने इस बात पर विचार नहीं किया कि परीक्षा व्यवस्था ही ऐसी क्यों न बना दी जाए जहां नकल करने वाले का फेल होना निश्चित हो जाए। अगर सारी परीक्षाएं आब्जेक्टिव प्रश्नावली के तहत कर दी जाए तो फिर नकल करके कोई पास नहीं हो पायेगा। इस व्यवस्था को अपनाने के बजाए छात्रों को जानवरों की तरह चोंगा पहनाकर परीक्षाएं कराने वाले प्रबंधन का दिमागी परीक्षण कराया जाना चाहिए।

(लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं, लेख उनके निजी विचार हैं)

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