Thursday - 2 February 2023 - 9:22 PM

‘पिछले साल खाई थी, इस साल हमें कुएं में ढकेल दिया’

जुबिली न्यूज डेस्क

‘पिछले साल खाई थी। इस साल तो उन्होंने हमें कुएं में ढकेल दिया है। इससे भी बुरा यह है कि सरकार को कोई फिक्र नहीं है। साल 2016-17 से एसएपी में मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल (सामान्य के लिए 305 से 315 और जल्द तैयार होने वाली नस्लों के लिए 315 से 325 रुपये) बढ़ोतरी करने के बावजूद वे मिलों को इन कीमतों पर भी दाम देने के लिए मजबूर नहीं कर रहे हैं।’

यह कहना है गन्ना किसान जितेंद्र सिंह हुड्डा का। शामली जिले के हुड्डा तहसील के खीरी बैरागी गांव में आठ एकड़ में गन्ने की उपज करते हैं। वह सरकार की उपेक्षा से परेशान हैं। वह कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। पहला चीनी मिल उनके बकाये का भुगतान नहीं कर रही और दूसरे उन्हें सही रेट नहीं मिल रहा है।

हुड्डा जैसे तमाम गन्ना किसान इन समस्याओं से जूझ रहे हैं। वह सरकार से सहयोग न मिलने की वजह से दुखी हैं। हालांकि राज्य सरकार हमेशा दावा करती है कि वह गन्ना किसानों के साथ है।

वर्ष 2020-21 के लिए गन्ने की पेराई शुरू हो गई है। इस समय किसान कई समस्याओं से दो-चार हो रहे हैं। मिलों ने उनके पिछले बकाये का भुगतान किया नहीं है और अब फसल उनको मिलो को पहुंचानी है।

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किसानों ने पिछले साल चीनी मिलों को जो गन्ने बेचे थे, उसमें से अभी भी 8400 करोड़ रुपये बाकी हैं। किसान बकाये के लिए मिलों का चक्कर लगा रहे हैं पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। हुड्डा जैसे तमाम गन्ना किसानों का एक ही दर्द है कि सरकार उनके घाव पर मरहम नहीं लगा रही।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019-20 (अक्टूबर-सितंबर) में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों ने रिकॉर्ड 1,119.02 लाख टन गन्ने की पेराई की थी, जिसकी कुल कीमत 35,898.15 करोड़ रुपये थी।

यह कीमत राज्य सरकार की सलाह से तय मूल्य (एसएपी) पर आधारित थी, जो 315-325 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई थी। हालांकि, पिछले चीनी उत्पादन वर्ष के अंत 30 सितंबर तक उन्होंने किसानों को केवल 27,451.05 करोड़ रुपये चुकाया था।

इसका मतलब है कि दशहरा के बाद इस महीने के अंत से 2020-21 का चीनी उत्पादन वर्ष शुरू होने पहले तक गन्ना किसानों का अभी भी 8,447.10 करोड़ रुपये बाकी है।

मालूम हो कि पिछला चीनी उत्पादन वर्ष भी गन्ना किसानों के बकाये से ही शुरु हुआ था। हां अलबत्ता वह इस साल जितना नहीं था।

यूपी की चीनी मिलों ने वर्ष 2018-19 में 1031.67 करोड़ रुपये के गन्ने की पेराई की थी। इसकी कुल कीमत 33,048.06 करोड़ रुपये थी। हालांकि सितंबर के अंत तक मिलों ने किसानों को 28,106.23 करोड़ चुका दिए थे। इसके बादग किसानों के 4,941.83 करोड़ रुपये बकाया थे।

साल 2019-20 के लिए 315-325 रुपये प्रति क्विंटल की योगी सरकार द्वारा तय एसएपी केंद्र सरकार द्वारा 275 रुपये प्रति क्विंटल के उचित और पारिश्रमिक मूल्य (एफआरपी) से अधिक था। यह 10 फीसदी आधारभूत चीनी-से-गन्ना वसूली अनुपात से जुड़ा हुआ था।

पिछले साल उत्तर प्रदेश का औसत चीनी रिकवरी 11.3 फीसदी थी और इसके अनुसार एफआरपी 310.75 प्रति क्विंटल होता। इस हिसाब से देखा जाए तो गन्ना किसानों को दी गई कुल कीमत (27,451.05 करोड़) को 2019.20 में पेराई किए गए गन्ने की मात्रा (1,118.02 क्विंटल) से करें तो औसत मूल्य 245.5 प्रति क्विंटल आता है।

बहराइच के गन्ना किसान अनूप सिंह कहते हैं, आप एसएपी को भूल जाइए। हमें तो केंद्र सरकार द्वारा तय एफआरपी ही नहीं मिल रही है। चीनी मिलों को गन्ना डिलिवरी के 14 दिनों के अंदर पैसे का भुगतान करना होता है, जबकि गन्ने की पेराई मई अंत में ही खत्म हो गई थी।’ 

वहीं जानकार इसके लिए मुख्य रूप से निर्यात सब्सिडी और चीनी बफर ले जाने की लागत का भुगतान न करने को मौजूदा बकाए को जिम्मेदार ठहराया।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने पिछले साल सितंबर में 2019-20 के दौरान चीनी निर्यात पर किए गए विपणन, परिवहन, पोर्ट-हैंडलिंग और अन्य खर्चों के लिए 10.448 रुपये प्रति किलोग्राम की एकमुश्त सहायता की घोषणा की थी।

इससे पहले जुलाई में इसने मिलों को 40 क्विंटल बफर स्टॉक के निर्माण को मंजूरी दी, जिसके लिए एक वर्ष के लिए संपूर्ण ब्याज, भंडारण और बीमा शुल्क की प्रतिपूर्ति की जाएगी।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश उद्योग के एक सूत्र के हवाले से लिखा है कि ‘इन दोनों खातों पर केंद्र पर चीनी मिलों का लगभग 3,000 करोड़ रुपये बकाया है। इसके अलावा 900 करोड़ रुपये यूपी पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड पर बाकी हैं। ये कुल मिलाकर 8,400 करोड़ रुपये की बकाया राशि का लगभग आधा हिस्सा हैं।’

उसने इस ओर भी इशारा किया कि गन्ने का अधिकतर बकाया कुछ कंपनियों पर ही है। बजाज हिंदुस्तान लिमिटेड की 14 फैक्टरियों पर अकेले 2,637.76 करोड़ रुपये बकाया हैं, जो कि 2019-20 में उसके द्वारा खरीदे गए गन्ने की एसएपी की कीमत 5,339.17 करोड़ रुपये का 49.4 फीसदी है।

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इसके अलावा सिम्भावली शुगर्स पर (कुल कीमत का 64.01 फीसदी), यूके मोदी ग्रुप (62.56 फीसदी), गोबिंद शुगर (55.58 फीसदी) और अपर दोआब शुगर (46.42 फीसदी) बकाया हैं।

वहीं दूसरी तरफ बलरामपुर चीनी, त्रिवेणी इंजीनियरिंग, धामपुर शुगर, डीसीएम श्रीराम, केके बिड़ला ग्रुप, द्वारकाधीश शुगर, डालमिया भारत, द्वारकाधीश शुगर, डालमिया भारत और तिकौला शुगर मिलों ने अपने 85 फीसदी या उससे अधिक का भुगतान कर दिया है और बाकी अगले कुछ महीनों में करने वाले हैं।

नहीं बढ़े गन्ने के दाम

पिछले दो साल से अत्यधिक चीनी उत्पादन और भरे हुए भंडारों का हवाला देकर एक तरफ चीनी मिल किसानों का भुगतान टालती रही हैं, तो दूसरी तरफ सरकार ने भी गन्ने के दाम नहीं बढ़ाए।

केन्द्र सरकार ने वर्ष 2019-20 के लिए जुलाई में गन्ने का एफआरपी (उचित एवं लाभकारी मूल्य) 10 फीसदी की आधार रिकवरी के लिए 275 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया था। वर्ष 2018-19 में भी केन्द्र सरकार का एफआरपी इतना ही था परन्तु आधार रिकवरी दर 9.5 फीसदी थी। इस साल आधार रिकवरी दर बढ़ाने और महंगाई दर के प्रभाव से गन्ने का वास्तविक मूल्य घट गया है।

यही हाल उत्तर प्रदेश में भी रहा जहां एसएपी (राज्य परामर्शित मूल्य) पिछले दो सालों से 315-325 रुपए प्रति क्विंटल के स्तर पर ही है। परन्तु अब गन्ना और चीनी दोनों के उत्पादन की स्थिति देश और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बदल गई है जिसके कारण गन्ना मूल्य बढ़ाया जाना चाहिए। किसान लंबे समय से रेट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।

पिछले साल त्तर प्रदेश सरकार ने 2019-20 के गन्ना मूल्य निर्धारण के लिए सभी हितधारकों से विचार विमर्श किया था। इस बैठक में उत्तर प्रदेश चीनी मिल्स एसोसिएशन ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति, चीनी के अत्यधिक उत्पादन और भंडार का डर दिखाकर इस साल भी गन्ने का रेट ना बढ़ाने की मांग रखी थी।

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जबकि वास्तविकता यह है कि चीनी मिलें चीनी के सह-उत्पादों जैसे शीरा, खोई (बगास), प्रैसम? आदि से भी अच्छी कमाई करती हैं। इसके अलावा सह-उत्पादों से एथनॉल, बायो-फर्टीलाइजर, प्लाईवुड, बिजली व अन्य उत्पाद बनाकर भी बेचती हैं।

गन्ना (नियंत्रण) आदेश के अनुसार चीनी मिलों को 14 दिनों के अंदर गन्ना भुगतान कर देना चाहिए। भुगतान में विलम्ब होने पर 15 फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय होता है। परन्तु चीनी मिलें साल-साल भर गन्ना भुगतान नहीं करतीं और किसानों की इस पूंजी का बिना ब्याज दिए इस्तेमाल करती हैं। इस तरह मिलें बैंकों के ब्याज की बचत भी करती हैं। पिछले दो सालों में सरकार ने चीनी मिलों को अनेक प्रोत्साहन पैकेज भी दिए हैं इसके बावजूद भी मिलों ने गन्ने का समय पर भुगतान नहीं किया।

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