Saturday - 8 May 2021 - 1:02 AM

डंके की चोट पर : बेबस चीत्कार में बदल गए काका हाथरसी के ठहाके

शबाहत हुसैन विजेता

हाथरस जिसे काका हाथरसी के ठहाकों से पहचाना जाता था. आज गैंगरेप से बदनाम हो रहा है. आज पुलिस की ज्यादती से पहचाना जा रहा है. कोई हाथरस का नाम भी लेता है तो पुलिस से घिरी एक चिता उभरती है. एक ऐसी चिता जिसे आधी रात को पेट्रोल और थिनर से जलाया जा रहा है. एक ऐसी चिता जिसके पास परिवार की चीत्कार नहीं पुलिस अधिकारियों की घुड़कियाँ सुनाई देती हैं.

हाथरस की उम्र अभी ढाई दशक की भी नहीं है. सिर्फ 23 साल पहले हाथरस पैदा हुआ था. जिस लड़की की मौत से हाथरस चर्चा में आया वह तो सिर्फ 19 साल की ही थी. हाथरस को पहली पहचान हास्य के सशक्त हस्ताक्षर काका हाथरसी ने दी थी. हालांकि काका ने 1995 में ही अपनी आँखें मूँद ली थीं. काका जब हाथरस को देश और दुनिया में मशहूर कर रहे थे तब हाथरस जिला नहीं था. काका के जाने के दो साल के बाद आगरा, मथुरा और अलीगढ़ के हिस्से जोड़कर हाथरस बनाया गया था.

मायावती मुख्यमंत्री बनीं तो गौतम बुद्ध की माँ महामाया के नाम पर इसका नाम महामाया नगर रख दिया. सरकार बदली तो यह फिर से हाथरस बन गया. हाथरस हाथ और रस से मिलकर बना है. यह रस काका से जुड़ता है तो हास्य की सरिता बहाता है, अन्दर तक गुदगुदी पैदा करता है और जब गौतम बुद्ध की माँ से जुड़ता है तो शान्ति और करुणा का भाव पैदा करता है.

सिर्फ 23 साल की उम्र में हाथरस जिस रास्ते की तरफ बढ़ गया उसमें दर्द है, आंसू हैं, बदनामी है, न छूटने वाले दाग हैं, कलंकित होते रिश्ते हैं.

हाथरस सिर्फ गैंगरेप से बदनाम नहीं हुआ है. हाथरस सिर्फ एक लड़की के कत्ल से नहीं दहल गया है. गैंगरेप तो पूरे देश में हो रहे हैं. कत्ल की वारदात तो हर थोड़ी देर में हो जाती है. पुलिस की लापरवाही हर जगह है. शायद ही कोई शहर बचा हो जहाँ पीड़ित का मुकदमा फ़ौरन लिख जाता हो. शायद ही कोई जगह हो जहाँ कमज़ोर को आसानी से इन्साफ मिल जाता हो.

हाथरस बदनाम हुआ है पुलिस के असंवेदनशील रवैये से. हाथरस बदनाम हुआ है लचर प्रशासनिक व्यवस्था से. हाथरस बदनाम हुआ जुर्म को छुपाने के तरीके से. हाथरस बदनाम हुआ जुर्म के सबूत मिटाने से. हाथरस बदनाम हुआ है खाकी की ताकत को आम आदमी पर थोपने से. हाथरस बदनाम हुआ है पीड़ित परिवार को नज़रबंद करने से.

19 साल की लड़की पर जिस तरह से ज़ुल्म ढाए गए उसके खुलासे ने लोगों को आक्रोशित किया है. लड़की ने अस्पताल के बिस्तर पर 14 दिन ज़िन्दगी के साथ संघर्ष किया. दिल्ली गैगरेप का शिकार निर्भया ने तो हिन्दुस्तान से लेकर सिंगापुर तक के अस्पतालों में ज़िन्दगी की टूटती साँसों से संघर्ष किया था लेकिन हार वह भी गई और हार यह भी गई.

उस निर्भया और इस निर्भया में फर्क तलाश करें तो ज़ुल्म उस पर भी कम नहीं हुआ था. चलती बस में उसकी अस्मत तार-तार की गई थी. उसके शरीर में लोहे के राड डाले गए थे. कई घंटे तक ज़ुल्म के बाद उसे चलती बस से सड़क पर फेंक दिया गया था.

इस निर्भया की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई थी. गर्दन की हड्डी को नुक्सान पहुंचाया गया था. ज़बान काटने की कोशिश की गई थी. जालिमों ने उसके सामने ज़िन्दगी के रास्ते ही बंद कर दिए थे. बहस चल रही है कि रेप हुआ था कि नहीं हुआ था. रेप की बात हालांकि उसके मृत्यु पूर्व बयान में है लेकिन अगर मान भी लें कि रेप नहीं हुआ था तो रीढ़ की हड्डी टूट जाने के बाद अगर वह बच भी जाती तो क्या वह कभी मुस्कुराने के लायक हो पाती. क्या वह इस लायक रह जाती कि अपने भरोसे घर से निकलकर कहीं जा सके.

रेप दरअसल एक मर्ज़ बनकर उभरा है. जिस तरह से कैंसर की बीमारी बढ़ी है उसी तरह रेप की मानसिकता भी बढ़ी है. रेप की सज़ा का क़ानून है. फांसी का भी प्राविधान है लेकिन क्योंकि अदालतों में जज कम हैं. मुकदमों की फाइलें ज्यादा हैं. अदालतों में तारीख पर तारीख की परम्परा है.

पुलिस ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रही है. अपराधियों के खिलाफ सबूत पुख्ता नहीं बनाती और अपराधी छूट जाता है. रेप के खिलाफ जो आवाजें उठती हैं उनके खिलाफ पुलिस बर्बर हो जाती है. जिस महिला वकील सीमा कुशवाहा ने निर्भया के दोषियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाया उसे भी हाथरस में प्रशासन की जली कटी सुननी पड़ी. लखनऊ में जिन महिलाओं ने रेप के खिलाफ शान्ति मार्च किया उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.

हाथरस का मामला तो सेंसेक्स की तरह अचानक से उछल गया था. पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था. हाथरस काण्ड ने यूपी सरकार को सांसत में डाल दिया था. मगर सरकार समझी कि 25 लाख मुआवज़े और एक अदद नौकरी से सब कुछ शांत हो जाएगा.

दिल्ली से पीड़िता की लाश आती. घर वाले उसे अपने घर ले जाते. भीड़ जुटती, घर वाले लाश से लिपटकर रोते, रो-रोकर सरकार को बुरा-भला कहते. उसका अंतिम संस्कार करते. पुलिस अपराधियों को कोर्ट में पेश कर उनका रिमांड लेती. प्रशासनिक अफसर लड़की के घर वालों को इन्साफ का भरोसा दिलाते. हाथरस की तरफ जा रहे नेताओं को रोका-टोका नहीं जाता तो शायद मामला इतना तूल नहीं पकड़ता.

हाथरस में रेप के बाद पुलिस और प्रशासन की गल्तियों के बाद शुरू हुई सियासत ने हालात बद से बदतर कर दिए. लड़की तो मर गई है. रात के अँधेरे में उसकी चिता भी जल गई है. घर वालों ने अस्थियाँ भी चुन ली हैं. यह अस्थियाँ नदी में प्रवाहित हो जायेंगी. रोने की आवाजें धीरे-धीरे शांत हो जायेंगी. पुलिस भी हट जायेगी.

वक्त के साथ सब रुटीन हो जायेगा लेकिन हाथरस आती प्रियंका गांधी का शाना पकड़कर झिंझोड़ता पुलिसकर्मी, महिला पत्रकार को जीप में ठूंसकर ले जाती पुलिस और वकील सीमा से चीख-चीखकर बात करता एडीएम इस बात का संकेत है कि महिला सम्मान के कितने भी दावे कर लिए जाएं लेकिन यह अब तक संस्कार का हिस्सा नहीं बन पाया है.

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प्रियंका गांधी, सीमा कुशवाहा और महिला पत्रकार इन अभद्र अफसरों से निबट लेने में सक्षम हैं मगर आम लड़कियां इस मशीनरी में कैसे खुद को फिट रख पाएंगी. हालात न संभले तो दिल्ली, हैदराबाद, हाथरस, बलरामपुर, आजमगढ़, लखनऊ फेहरिस्त लम्बी होती जायेगी. आंसू बढ़ते जाएंगे. लड़कियों को मुआवज़े की नहीं सुरक्षा दे सकने लायक व्यवस्था की ज़रूरत है.

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