क्या अमेरिका-ईरान समझौते का सबसे बड़ा झटका अरब देशों को लगा है?

अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) ने पश्चिम एशिया की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। दोनों देशों के बीच वर्षों से चले आ रहे तनाव के बाद यह समझौता फिलहाल सैन्य टकराव को कम करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। हालांकि बातचीत अभी शुरुआती दौर में है और अंतिम समझौते तक पहुंचने में समय लग सकता है।

इसके बावजूद इस घटनाक्रम ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अमेरिका और ईरान के रिश्ते सामान्य होने की दिशा में बढ़ते हैं तो इसका सबसे ज्यादा असर किस देश या क्षेत्र पर पड़ेगा।

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत और बहरीन जैसे खाड़ी देशों की सबसे बड़ी चिंता ईरान की बढ़ती क्षेत्रीय ताकत है।

जानकारों का मानना है कि यदि अमेरिका ईरान के साथ समझौते के तहत कुछ रियायतें देता है तो तेहरान का प्रभाव पहले से अधिक मजबूत हो सकता है। यही कारण है कि खाड़ी देश इस समझौते पर करीब से नजर बनाए हुए हैं।

समझौते को लेकर सबसे अधिक चर्चा इस बात की है कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।

युद्ध के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमता ने क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित किया था। ऐसे में खाड़ी देशों को आशंका है कि यदि मिसाइल कार्यक्रम बिना किसी ठोस नियंत्रण के जारी रहता है तो भविष्य में सुरक्षा चुनौतियां बनी रह सकती हैं।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान से पूरी तरह मिसाइल कार्यक्रम खत्म करने की मांग किसी भी समझौते को मुश्किल बना सकती है।

युद्ध के दौरान अमेरिकी प्रशासन लगातार ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने की बात करता रहा। लेकिन हाल के बयानों में अमेरिकी नेतृत्व का रुख पहले की तुलना में कुछ नरम दिखाई दिया है।

इस बदलाव को कई विश्लेषक बातचीत को आगे बढ़ाने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं।

कई रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम में इजरायल की स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं दिखाई दे रही है।

उनके अनुसार लंबे संघर्ष के दौरान इजरायल को सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर काफी संसाधन लगाने पड़े। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि को भी चुनौती मिली।

हालांकि दूसरी राय रखने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि इजरायल अब भी अमेरिका का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बना हुआ है और उसकी सुरक्षा प्राथमिकताओं में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।

हालिया संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया कि खाड़ी देशों के ऊर्जा प्रतिष्ठान और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे अब भी मिसाइल और ड्रोन हमलों के प्रति संवेदनशील हैं।

इसी कारण अब ये देश अपनी वायु सुरक्षा प्रणाली मजबूत करने, आधुनिक इंटरसेप्टर मिसाइल खरीदने और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।

साथ ही वे ईरान के साथ संवाद बनाए रखने की रणनीति भी अपना रहे हैं ताकि भविष्य में सीधे टकराव की स्थिति से बचा जा सके।

300 अरब डॉलर के पुनर्निर्माण फंड पर भी चर्चा

समझौते से जुड़ी चर्चाओं में ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए लगभग 300 अरब डॉलर के संभावित फंड का भी उल्लेख किया जा रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा फंड अस्तित्व में आता है तो उसके वित्तपोषण में खाड़ी देशों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

हालांकि यह भी माना जा रहा है कि कोई भी आर्थिक सहयोग सख्त शर्तों और व्यावसायिक आधार पर ही दिया जाएगा।

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज़ जलडमरूमध्य इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम रणनीतिक बिंदु बना हुआ है।

दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है।

ईरान लंबे समय से इस जलमार्ग को अपनी रणनीतिक ताकत के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। वहीं अमेरिका और खाड़ी देश चाहते हैं कि यहां अंतरराष्ट्रीय समुद्री आवाजाही बिना किसी बाधा के जारी रहे।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में स्थायी शांति के लिए केवल अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पर्याप्त नहीं होगा।

उनके अनुसार खाड़ी देशों, तुर्की, मिस्र, पाकिस्तान और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों को साथ लेकर एक व्यापक सुरक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे भविष्य में किसी बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका कम हो सके।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा करता है। इसके अलावा लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं।

ऐसे में अमेरिका-ईरान संबंधों में किसी भी तरह का बदलाव भारत के ऊर्जा आयात, व्यापार और क्षेत्रीय रणनीति पर भी असर डाल सकता है। यही वजह है कि नई दिल्ली पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है।

अमेरिका और ईरान के बीच हुआ समझौता फिलहाल पश्चिम एशिया में तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि अभी कई मुद्दों पर अंतिम सहमति बनना बाकी है। ईरान का मिसाइल कार्यक्रम, होर्मुज़ जलडमरूमध्य की सुरक्षा, खाड़ी देशों की चिंताएं और इजरायल की भूमिका आने वाले समय में इस समझौते की सफलता तय करेंगे। फिलहाल इतना साफ है कि मिडिल ईस्ट की कूटनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां हर देश अपने रणनीतिक हितों को नए सिरे से परिभाषित करने में जुटा है।

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