सूरत बुलडोजर कार्रवाई पर गुजरात हाईकोर्ट सख्त, बेघर परिवारों के पुनर्वास का दिया आदेश

गुजरात के सूरत जिले के नासिरनगर इलाके में 100 से अधिक कच्चे मकानों को तोड़े जाने के मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत नगर निगम (SMC) को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि यदि मकानों को अवैध तरीके से तोड़ा गया है तो बेघर हुए परिवारों के रहने की व्यवस्था करना नगर निगम की जिम्मेदारी है।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि प्रभावित परिवारों को या तो उसी स्थान पर आवास उपलब्ध कराया जाए या फिर किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर पुनर्वास किया जाए।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला अवैध तोड़फोड़ का प्रतीत होता है। ऐसे में विस्थापित लोगों को बिना आश्रय के नहीं छोड़ा जा सकता।

अदालत ने सूरत नगर आयुक्त को अगली सुनवाई से पहले पुनर्वास का विस्तृत प्रस्ताव पेश करने का भी निर्देश दिया है।

30 मई को सूरत के नासिरनगर क्षेत्र में पुलिस और नगर निगम अधिकारियों की मौजूदगी में 100 से अधिक कच्चे मकानों पर बुलडोजर चलाया गया था। इस कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में परिवार बेघर हो गए।

भीषण गर्मी के बाद अब लगातार हो रही बारिश ने प्रभावित लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। कुछ परिवार अब भी अस्थायी टेंट में रह रहे हैं, जबकि कई लोग किराये के मकानों या नगर निगम के सामुदायिक हॉल में शरण लेने को मजबूर हैं।

स्थानीय निवासी मोहम्मद इरफान ने बताया कि वह पिछले 45 वर्षों से नासिरनगर में रह रहे थे। उनके अनुसार, मकान टूटने के बाद परिवार बेघर हो गया, रोजगार छिन गया और बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई।

वहीं सहीम अहमद शेख ने कहा कि उनका नौ सदस्यीय परिवार अब अलग-अलग जगह रहने को मजबूर है। उन्होंने कहा कि बच्चों की पढ़ाई और रोजी-रोटी दोनों पर गंभीर असर पड़ा है।

शबनम बानो ने बताया कि परिवार ने कई दिन खुले आसमान के नीचे गुजारे। फिलहाल सामुदायिक हॉल में रहने की व्यवस्था की गई है, लेकिन वहां भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।

मामले में विवाद बढ़ने के बाद सूरत नगर निगम ने एक उप नगर आयुक्त की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी। समिति ने 30 जून को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसके बाद नगर निगम के पांच अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया।

रिपोर्ट में सामने आया कि कथित तौर पर नगर आयुक्त की जानकारी के बिना यह कार्रवाई की गई थी।

तोड़फोड़ के बाद सूरत नगर निगम ने दावा किया कि उसने मकान गिराने का कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं किया था। निगम के मुताबिक अधिकारी केवल सड़क निर्माण के लिए सीमांकन करने पहुंचे थे।

सूरत पुलिस ने भी इस कार्रवाई से खुद को अलग बताया। हालांकि प्रभावित 26 लोगों ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दायर कर न्याय की मांग की।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि बिना किसी आधिकारिक आदेश के मकान तोड़े गए थे तो प्रभावित लोगों की शिकायतों पर कार्रवाई करना पुलिस की जिम्मेदारी थी।

गुजरात हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 9 जुलाई को तय की है। अदालत ने सूरत नगर आयुक्त से विस्तृत हलफनामा दाखिल करने के साथ-साथ गुजरात सरकार से भी इस मामले में अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि बेघर हुए परिवारों के पुनर्वास को लेकर प्रशासन क्या प्रस्ताव अदालत के सामने रखता है।

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