जापान के पूर्व मंत्री ने भारत सरकार के रुख़ को बताया ‘लापरवाह’, जानिए क्या है पूरा मामला

नई दिल्ली: भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह निर्माण में देरी नहीं, बल्कि जापान के एक पूर्व मंत्री का बयान है। जापान के पूर्व उप अर्थव्यवस्था, व्यापार एवं उद्योग मंत्री हिदेकी माकिहारा (Hideki Makihara) ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (बुलेट ट्रेन) परियोजना में देरी के लिए भारतीय पक्ष को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि परियोजना से जुड़ी बैठकों में भारतीय अधिकारियों की कार्यशैली लापरवाह रही और भारत ने अपने कई वादे पूरे नहीं किए।

माकिहारा के इस बयान ने भारत में राजनीतिक बहस छेड़ दी। विपक्ष ने इसे मोदी सरकार की विफलता बताते हुए सरकार पर निशाना साधा। हालांकि, भारत सरकार ने इन आरोपों को तथ्यों से अलग बताते हुए स्पष्ट किया कि भारत और जापान के बीच परियोजना पर सहयोग पहले की तरह मजबूत है और काम तय समय के अनुसार आगे बढ़ रहा है।

15 जुलाई को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर किए गए अपने पोस्ट में हिदेकी माकिहारा ने लिखा कि वह अपने कार्यकाल के दौरान इस परियोजना से सीधे जुड़े रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि अंतरराष्ट्रीय बैठकों और वार्ताओं में भारतीय पक्ष की कार्यशैली बेहद लापरवाह दिखाई दी।

उन्होंने आरोप लगाया कि भारतीय पक्ष अक्सर किए गए वादों से पीछे हट जाता था और हर बार अपने हितों को प्राथमिकता देता था। माकिहारा ने यहां तक कहा कि उन्हें “100 प्रतिशत यकीन” है कि परियोजना के आगे नहीं बढ़ पाने की पूरी जिम्मेदारी भारतीय पक्ष की है।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उस समय परियोजना के प्रभारी भारतीय मंत्री का रवैया सहयोगात्मक नहीं था, जिससे दोनों देशों के बीच समन्वय प्रभावित हुआ।

माकिहारा की पोस्ट एक लेख से जुड़ी थी, जिसे भारत में कार्यरत जापानी इंजीनियर इसाओ त्सुजिमुरा ने लिखा था।

लेख में दावा किया गया कि भारत परियोजना के पहले चरण में जापान की शिंकानसेन प्रणाली के बजाय यूरोपीय मूल की सिग्नलिंग तकनीक और स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन का इस्तेमाल करना चाहता है।

त्सुजिमुरा का कहना था कि यदि ऐसा होता है तो जापान की शिंकानसेन तकनीक के साथ तकनीकी तालमेल में दिक्कतें आ सकती हैं और परियोजना अपने मूल उद्देश्य से भटक सकती है। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि इससे भारत की शिंकानसेन परियोजना अधूरी रह सकती है।

पूर्व जापानी मंत्री के आरोपों पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को आयोजित साप्ताहिक प्रेस वार्ता में प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि यह किसी एक व्यक्ति की व्यक्तिगत राय है और इसका वास्तविक तथ्यों से कोई मेल नहीं है।

जायसवाल ने कहा कि भारत और जापान के बीच इस परियोजना को लेकर लगातार सकारात्मक बातचीत हो रही है और दोनों देश मिलकर इसे जल्द पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उन्होंने बताया कि परियोजना का निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है और योजना के मुताबिक इसका पहला चरण वर्ष 2027 में शुरू किया जाएगा।

विदेश मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि जापान की नई पीढ़ी की E10 हाई-स्पीड ट्रेन अभी विकास के चरण में है और उसके 2030 के शुरुआती वर्षों से पहले उपलब्ध होने की संभावना नहीं है।

इसी कारण भारत और जापान ने सहमति बनाई है कि परियोजना के शुरुआती संचालन की शुरुआत भारतीय हाई-स्पीड ट्रेन से की जाएगी। बाद में आवश्यकता के अनुसार जापानी ट्रेनें शामिल की जाएंगी।

सरकार ने यह भी कहा कि परियोजना के लिए जिन सिग्नलिंग उपकरणों का ऑर्डर दिया गया है, वे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हैं और इस संबंध में जापान की ओर से कोई वैकल्पिक प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ है।

जापानी पूर्व मंत्री के बयान के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर हमला बोला।

कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद पवन खेड़ा ने कहा कि यह बेहद शर्मनाक है कि भारत की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक को इस तरह संभाला गया कि अब विदेशी अधिकारी भी सरकार की कार्यशैली की आलोचना कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सरकार की अक्षमता के कारण भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित हो रही है।

मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना है। इसका उद्देश्य महाराष्ट्र और गुजरात के बीच तेज, सुरक्षित और आधुनिक रेल सेवा उपलब्ध कराना है।

इस परियोजना की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं—

  • कुल लंबाई 508 किलोमीटर
  • अधिकतम गति 320 किलोमीटर प्रति घंटा
  • कुल 10 स्टेशन
  • मुंबई, ठाणे, विरार, बोइसर, वापी, बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वडोदरा, आनंद और अहमदाबाद जैसे प्रमुख शहरों को जोड़ेगी।
  • परियोजना की लगभग 81 प्रतिशत वित्तीय सहायता जापान कम ब्याज वाले ऋण के रूप में दे रहा है।
  • इसमें जापान की प्रसिद्ध शिंकानसेन तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

जब भारत और जापान ने वर्ष 2015 में इस परियोजना पर समझौता किया था, तब इसे सात वर्षों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। शुरुआत में इसकी अनुमानित लागत लगभग 97,600 करोड़ रुपये थी और इसे 2023 तक पूरा किया जाना था।

हालांकि, भूमि अधिग्रहण में देरी, पर्यावरणीय मंजूरियां, तकनीकी प्रक्रियाएं और निर्माण लागत बढ़ने जैसे कारणों से परियोजना निर्धारित समयसीमा से पीछे चली गई।

अब सरकार का लक्ष्य है कि सूरत से बिलिमोरा के बीच पहला चरण 15 अगस्त 2027 तक चालू कर दिया जाए।

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना केवल एक परिवहन परियोजना नहीं, बल्कि भारत और जापान की रणनीतिक साझेदारी का भी महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग लगातार बढ़ा है। पिछले एक वर्ष में भारत और जापान के बीच करीब 120 कारोबारी समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं, जिनसे भारत में 10 अरब डॉलर से अधिक के जापानी निवेश का रास्ता खुला है।

जापान भारत को द्विपक्षीय आधार पर सबसे अधिक विकास सहायता देने वाले देशों में शामिल है और मेट्रो रेल, बुलेट ट्रेन तथा अन्य आधारभूत ढांचा परियोजनाओं में उसकी बड़ी भूमिका रही है।

पूर्व जापानी मंत्री के बयान से राजनीतिक बहस जरूर तेज हो गई है, लेकिन भारत सरकार का कहना है कि परियोजना तय योजना के अनुसार आगे बढ़ रही है। सरकार का दावा है कि निर्माण कार्य में तेजी आई है और 2027 तक पहले चरण का संचालन शुरू करने की तैयारी जारी है। वहीं, यह मामला भारत-जापान सहयोग और बुलेट ट्रेन परियोजना की प्रगति को लेकर नई चर्चाओं का विषय बन गया है।

Related Articles

Back to top button