शिक्षण संस्थानों में हमारी प्राथमिकता राष्ट्रगीत एवं वर्दी है, बुनियादी ढाँचा, शिक्षकों की कमी और छात्रों की उपस्थिति नहीं

शिक्षा किसी भी राष्ट्र के विकास की आधारशिला होती है। एक आदर्श शिक्षण संस्थान वह होता है जहाँ ज्ञान, नैतिक मूल्य, अनुशासन और देशभक्ति का संगम हो। हाल के वर्षों में शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक नई बहस ने जन्म लिया है। यह बहस प्राथमिकताओं की है।

कुछ नीति-निर्माताओं और विचारकों का मानना है कि शिक्षण संस्थानों में सबसे पहली प्राथमिकता राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान और निर्धारित वर्दी (यूनिफॉर्म) को मिलनी चाहिए, क्योंकि ये तत्व छात्रों में अनुशासन, समानता और राष्ट्रवाद की भावना का संचार करते हैं।

वहीं दूसरी ओर, एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि बुनियादी ढाँचा , शिक्षकों की पर्याप्त संख्या और छात्रों की नियमित उपस्थिति ही शिक्षा की वास्तविक नींव हैं।


यदि हम इस विमर्श को गहराई से समझें, तो यह सवाल खड़ा होता है कि क्या केवल बाहरी अनुशासन और प्रतीकों (वर्दी और राष्ट्रगीत) के बल पर एक खोखली व्यवस्था को आदर्श बनाया जा सकता है? क्या बुनियादी सुविधाओं और योग्य शिक्षकों के बिना एक छात्र का सर्वांगीण विकास संभव है?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि राष्ट्रगीत और विद्यालय की वर्दी का अपना एक विशेष मनोवैज्ञानिक और सामाजिक महत्व है।

समानता की भावना: वर्दी (यूनिफॉर्म) अमीर और गरीब के बीच की खाई को पाटती है। जब सभी छात्र एक जैसी पोशाक पहनकर कक्षा में बैठते हैं, तो उनके भीतर से आर्थिक ऊंच-नीच का भेद खत्म हो जाता है। यह सामूहिक पहचान और समरसता को बढ़ावा देती है।

राष्ट्रवाद और संस्कार: सुबह की प्रार्थना में राष्ट्रगीत का गायन छात्रों में अपने देश के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और गौरव की भावना भरता है। यह उन्हें याद दिलाता है कि वे केवल एक छात्र नहीं हैं, बल्कि इस देश के भविष्य के नागरिक हैं।

अनुशासन:वर्दी और राष्ट्रगीत मिलकर एक संस्थागत अनुशासन का निर्माण करते हैं, जो छात्रों के चरित्र निर्माण में सहायक होता है। परंतु, क्या ये प्रतीक अपने आप में पूर्ण हैं? क्या एक भूखा, बिना छत के बैठे या बिना शिक्षक के पढ़ रहा छात्र केवल राष्ट्रगीत गाकर एक कुशल इंजीनियर, डॉक्टर या वैज्ञानिक बन सकता है?

जब हम प्राथमिकताओं की सूची में बुनियादी ढांचे को पीछे धकेल देते हैं, तो हम शिक्षा की पूरी इमारत को कमजोर कर देते हैं। एक सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण के बिना शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।

मूलभूत सुविधाओं का अभाव: आज भी देश के कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के स्कूलों में पीने का साफ पानी, छात्र-छात्राओं के लिए अलग और स्वच्छ शौचालय, तथा बैठने के लिए बेंच-डेस्क तक उपलब्ध नहीं हैं।
डिजिटल युग की चुनौतियाँ: आज की शिक्षा ब्लैकबोर्ड से आगे बढ़कर स्मार्ट क्लास और कंप्यूटर लैब तक पहुँच चुकी है। यदि स्कूलों में बिजली, इंटरनेट और कंप्यूटर जैसी बुनियादी चीजें ही नहीं होंगी, तो हमारे छात्र वैश्विक स्तर पर कैसे प्रतिस्पर्धा करेंगे?

सुरक्षा का प्रश्न : जर्जर भवन, टपकती छतें और असुरक्षित परिसर छात्रों के जीवन को खतरे में डालते हैं। ऐसे माहौल में केवल वर्दी पहनकर बैठना किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता।

भारतीय संस्कृति में गुरु को गोविंद (भगवान) से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। शिक्षण संस्थान की आत्मा उसके शिक्षक होते हैं, न कि उसकी दीवारें या नियम।
यदि स्कूलों में शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, तो राष्ट्रगीत के बाद की अवधियाँ खाली चली जाएँगी।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का संकट : देश के कई प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में ‘एकल शिक्षक’की व्यवस्था है, जहाँ एक ही शिक्षक पाँच कक्षाओं के बच्चों को एक साथ संभालता है। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता का गिरना निश्चित है।

भविष्य के साथ खिलवाड़: विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों के शिक्षकों की कमी के कारण छात्र ट्यूशन या कोचिंग पर निर्भर होने के लिए मजबूर हैं, जिसे हर परिवार वहन नहीं कर सकता।

मूल्यांकन का अभाव: जब शिक्षक ही नहीं होंगे, तो छात्रों की कॉपियाँ कौन जाँचेगा, उनकी समस्याओं का समाधान कौन करेगा और उन्हें सही राह कौन दिखाएगा?

यदि किसी स्कूल में भव्य रूप से राष्ट्रगीत गाया जाता है और सभी नियमों का पालन होता है, लेकिन कक्षाएं छात्रों से खाली हैं, तो उस संस्थान का औचित्य ही समाप्त हो जाता है।

स्कूल छोड़ने की दर : बुनियादी सुविधाओं की कमी और शिक्षकों की अनुपलब्धता के कारण ही छात्र, विशेषकर लड़कियाँ, बीच में ही स्कूल छोड़ देती हैं।

अनिवार्य उपस्थिति की अनिवार्यता: जब तक छात्र नियमित रूप से स्कूल नहीं आएंगे, तब तक वे ज्ञान और कौशल अर्जित नहीं कर पाएंगे। छात्रों की उपस्थिति ही यह तय करती है कि सरकार द्वारा शिक्षा पर खर्च किया जा रहा बजट सही जगह लग रहा है या नहीं।

प्राथमिकताओं का अंतर्विरोध: क्या प्रतीक, वास्तविकता का विकल्प हो सकते हैं?
यदि कोई व्यवस्था यह कहती है कि हमारी प्राथमिकता केवल राष्ट्रगीत और वर्दी है, न कि बुनियादी ढाँचा, शिक्षक और उपस्थिति, तो वह व्यवस्था साध्य और साधन के भ्रम में जी रही है।

वर्दी और राष्ट्रगीत साधन हैं—अनुशासन और संस्कार सिखाने के। लेकिन ज्ञान, रोजगार, तार्किक सोच और एक बेहतर जीवन साध्य’ (लक्ष्य) हैं, जो केवल योग्य शिक्षकों, बुनियादी ढांचे और नियमित अध्ययन से ही प्राप्त किए जा सकते हैं।

यदि एक छात्र फटी हुई छत के नीचे, बिना किताबों और बिना शिक्षक के केवल वर्दी पहनकर राष्ट्रगीत गा रहा है, तो यह देशभक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि शिक्षा की लाचारी है। सच्ची देशभक्ति तब होगी जब हम अपने देश के बच्चों को एक ऐसा माहौल दें जहाँ वे गर्व से पढ़ सकें, नवाचार कर सकें और देश का नाम रोशन कर सकें।
एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है ।


शिक्षा व्यवस्था में किसी एक पक्ष को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता। हमें एक संतुलित मॉडल की आवश्यकता है

“शिक्षण संस्थानों में हमारी प्राथमिकता राष्ट्रगीत एवं वर्दी है, बुनियादी ढाँचा, शिक्षकों की कमी और छात्रों की उपस्थिति नहीं”—यह विचार आंशिक रूप से अनुशासन पर तो जोर देता है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर पूरी तरह विफल साबित होता है।

प्रतीक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे भूखे पेट और खाली दिमाग की जगह नहीं ले सकते। एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण केवल नारे लगाने या एक जैसे कपड़े पहनने से नहीं होता, बल्कि नागरिकों को शिक्षित, सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने से होता है। इसलिए, सरकारों और नीति-निर्माताओं को अपनी प्राथमिकताओं को पुनर्गठित करना होगा। हमें राष्ट्रगीत और वर्दी के सम्मान को बनाए रखते हुए, युद्ध स्तर पर स्कूलों के बुनियादी ढांचे को सुधारना होगा, शिक्षकों की कमी को दूर करना होगा और छात्रों की शत-प्रतिशत उपस्थिति सुनिश्चित करनी होगी। तभी हमारा देश वास्तव में एक ‘ज्ञान महाशक्ति’ बन पाएगा।

(लेखक प्रख्यात शिक्षाविद और पूर्व कुलपति कानपुर तथा गोरखपुर विश्वविद्यालय रहे हैं )

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