Saturday - 4 February 2023 - 9:47 PM

बीजेपी की नाक की सावल बनी पूर्वांचल की ये सीटें

न्‍यूज डेस्‍क 

उत्तर प्रदेश में अंतिम चरण के मतदान 19 मई को होंगे। इस दौरान वाराणसी समेत पूर्वांचल की की 13 लोकसभा सीटों पर मतदान होंगे। इन सीटों में पांच सीटें ऐसी हैं जो वाराणसी से सटी हुई हैं। ऐसे में बीजेपी उम्मीदवार मोदी मैजिक के सहारे चुनाव जीतने की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो वहीं गठबंधन प्रत्याशी जातीय गणित के सहारे मोदी मौजिक को चुनौती देने की कोशिश में लगे हैं।

इन सीटों पर जीत के लिए बीजेपी ने ठीक वैसे ही रणनीति बनाई है जैसे 2017 विधानसभा चुनाव के दौरान बनाई थी। पीएम मोदी इस बार भी अपने चुनाव प्रचार का अंत वाराणसी से ही करेंगे। माना जा रहा है कि मोदी इस दौरान दो से तीन दिन अपने संसदीय क्षेत्र में रहेंगे। इसका लाभ उन्‍हें पूरे पूर्वांचल में मिलेगा।

देश की सबसे हाई प्रोफाइल सीट वाराणसी में बीजेपी की तरफ से पीएम नरेंद्र मोदी उम्‍मीदवार हैं। वाराणसी की तो यहां कांग्रेस के अजय राय हो या गठबंधन की शालिनी यादव दोनों में कोई भी पीएम मोदी को चुनौती देता नजर नहीं आ रहा है। लेकिन बाकि सीटों पर हालात ऐसे नहीं हैं। वाराणसी लोकसभा सीट से सटे होने कारण चंदौली, मिर्जापुर जैसी सीटें बीजेपी के लिए नाक का सवाल बन गई हैं। पीएम मोदी पर वाराणसी समेत इन सीटों पर जीत दिलाने की भी जिम्‍मेदारी है।

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गाजीपुर

गाजीपुर संसदीय क्षेत्र वाराणसी के बाद इस सीट की सबसे हाईप्रोफाइल सीट है। गठबंधन को उम्मीद है कि यहां दलित, यादव और मुस्लिम गठजोड़ मोदी के इस कद्दावर मंत्री का रास्ता रोक देगा। 2014 का चुनाव मनोज सिन्हा 30 हजार से कुछ ज्यादा वोटों से ही जीत पाए थे, लेकिन इस चुनाव में यहां का वोट गणित बदला हुआ है। बात करें जाति गणित की तो बीजेपी का पंरपारगत कुशवाहा वोट बैंक इस बार बीजेपी के साथ वापस लौट रहा है। साथ ही 40 हजार करोड़ से ज्यादा की विकास योजनाओं के सहारे मनोज सिन्हा यादव और दलितों के साथ-साथ मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं। गठबंधन के उम्मीदवार अफजाल अंसारी को पास जातीय गणित और मोदी विरोध को छोड़ दे तो दूसरा कोई मुद्दा नहीं है।

कांग्रेस के टिकट पर अजीत कुशवाहा के उतरने से भाजपा के लिए थोड़ी राहत हो सकती है। इस सीट पर डेढ़ लाख से अधिक बिंद, करीब पौने दो लाख राजपूत और लगभग एक लाख वैश्य भी हार-जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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चंदौली

यूपी की चंदौली लोकसभा सीट पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेन्द्र पांडे का सीधा मुकाबला गठबंधन के प्रत्‍याशी और सपा नेता संजय चौहान से है। चौहान जहां दलित-यादव-मुस्लिम गठजोड़ के साथ अपनी जाति के सहारे पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं बीजेपी उम्मीदवार महेन्द्र पांडे मोदी लहर के सहारे अपनी सीट बचाने में लगे हैं। कांग्रेस की ओर से चंदौली लोकसभा सीट से बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या कुशवाहा चुनाव मैदान में है। इससे यहां कांटे का मुकाबला होने की संभावना है।

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बलिया

कभी पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर की सीट रही बलिया में इस बार मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है। बीजेपी ने यहां वर्तमान सांसद भरत सिंह का टिकट काटकर विरेन्द्र सिंह मस्त को मैदान में उतारा है। तो गठबंधन ने नीरज शेखर को दरकिनार कर सनातन पांडे को टिकट दिया है। दोनों दलों में एक-एक नेता नाराज हैं। सनातन पांडे जहां दलित-यादव व मुस्लिम गठजोड़ के साथ बीजेपी के पंरपारगत ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश में हैं। वहीं, विरेन्द्र सिंह मस्त मोदी मौजिक के सहारे हैं, बीजेपी इस सीट पर यादव को छोड़ बाकि ओबीसी और सवर्ण मतदाताओं को एक साथ लाने की कोशिश में लगी है।

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मिर्जापुर

मिर्जापुर लोकसभा सीट से पहले दो चुनावों को छोड़ दे तो कोई भी सांसद लगातार दो बार चुनाव नहीं जीता है। ऐसे में अपना दल की नेता और केन्द्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल के सामने अपना किला बचाए रखने की कड़ी चुनौती है। इस क्षेत्र से कभी देश की राजनीति में वाराणसी की पहचान समझे जाने वाले कमलापति त्रिपाठी के परिवार की तीसरी पीढ़ी के नेता ललितेश पति त्रिपाठी कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में ललितेश को डेढ़ लाख से ज्यादा वोट मिले थे और वो सपा को पछाड़कर तीसरे नंबर पर थे. ऐसे में कांग्रेस को लड़ाई से बाहर नहीं माना जा सकता। इस हालात में ब्राह्मण वोटर किधर जाएगा इस सीट का भविष्य इस बात पर निर्भर है। ओबीसी वोटों के अधिकता वाली इस सीट पर सपा ने रामचरित निषाद को मैदान में उतारा है।

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राबर्टसगंज

राबर्टगंज सुरक्षित सीट पर इस बार मुकाबला सपा-अपना दल के बीच है। बीजेपी ने जहां ये सीट अपने सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) के लिए छोड़ी है। तो गठबंधन में ये सीट सपा के पाले में गई है। अपना दल के टिकट पर पकौड़ी लाल कौल तो सपा ने भाई लाल कौल को मैदान में उतारा है। इस सीट पर भी गठबंधन की जीत तभी संभव है जब दलित वोटर एक साथ गठबंधन के पक्ष में मतदान करें।

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